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तीन दशक बाद क्या आरजेडी को नहीं रही मुस्लिम वोट की ज़रूरत?

मुस्लिम नाउ ब्यूरो, पटना

पिछले तीन दशकों से यह बात बार-बार साबित होती रही है कि बिहार की सत्ता तक पहुंचने के लिए राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) या कोई भी सेक्युलर पार्टी मुस्लिम वोट के बिना न तो सरकार बना सकती है और न ही सत्ता के करीब पहुँच सकती है। राज्य में मुस्लिम आबादी लगभग 25% है, और करीब 30 विधानसभा सीटें ऐसी हैं, जहां मुस्लिम वोट निर्णायक भूमिका निभाते हैं। यही वजह है कि हर चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) सहित लगभग सभी दल मुस्लिम मतदाताओं को लुभाने के लिए तरह-तरह के वादे और सपने दिखाते हैं।

लेकिन इस बार स्थिति कुछ अलग दिख रही है। चर्चा यह है कि आरजेडी अब मुस्लिम वोट बैंक को लेकर गंभीर नहीं है। इस चर्चा की वजह बनी हैं सीमा कुशवाहा, जो रोहतास (बिहार) से आरजेडी की महिला नेत्री हैं। उन्होंने हाल ही में अपने सोशल मीडिया हैंडल पर पार्टी के आगामी चुनावी घोषणा पत्र के 20 बिंदुओं को साझा किया, जिसमें कहीं भी मुसलमानों या अल्पसंख्यकों का कोई ज़िक्र नहीं किया गया।

घोषणा पत्र के कुछ प्रमुख वादे निम्नलिखित हैं:

  1. डोमिसाइल नीति लागू करेंगे
  2. 65% आरक्षण सुनिश्चित करेंगे
  3. युवाओं को नौकरी व रोजगार उपलब्ध कराएंगे
  4. युवा आयोग का गठन करेंगे
  5. परीक्षा फॉर्म मुफ्त में भरवाएंगे
  6. पेपर लीक पर सख्त रोक लगाएंगे
  7. महिलाओं के खाते में हर महीने ₹2500 देंगे
  8. सामाजिक पेंशन ₹1500 प्रति माह
  9. गैस सिलेंडर ₹500 में उपलब्ध कराएंगे
  10. 200 यूनिट मुफ्त बिजली देंगे
  11. ताड़ी को शराबबंदी से बाहर करेंगे
  12. ठम्ज्प् योजना लागू करेंगे (स्पष्ट नहीं है)
  13. महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करेंगे
  14. शिक्षा व्यवस्था में सुधार
  15. भ्रष्टाचार पर लगाम
  16. स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार
  17. नए निवेश लाएंगे
  18. उद्योग-धंधों का विस्तार करेंगे
  19. पलायन पर रोक लगाएंगे
  20. पर्यटन उद्योग को बढ़ावा देंगे

घोषणा पत्र के अंत में सीमा कुशवाहा ने लिखा:
“तेजस्वी जी जो कहते हैं, उसे पूरा करते हैं। जो वादा किया है, वह हर हाल में निभाया जाएगा।”

लेकिन मुस्लिम समुदाय के लोग इस घोषणा पत्र में खुद के लिए कोई ठोस योजना या वादा न देख कर चिंतित हैं। न तो मुसलमानों को लेकर कोई अलग नीति की घोषणा हुई है, न ही कोई सामाजिक, शैक्षणिक या आर्थिक कार्यक्रम का ज़िक्र है।

ऐसे में मुस्लिम समाज में यह बहस तेज हो गई है कि क्या अब आरजेडी को मुस्लिम समर्थन की ज़रूरत नहीं रही? क्या पार्टी अब पूरी तरह यादव-मुस्लिम (M-Y) समीकरण को छोड़कर किसी नए जातिगत समीकरण पर भरोसा कर रही है?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि आरजेडी इस मुद्दे को नजरअंदाज करती रही, तो मुस्लिम वोट बैंक में बिखराव संभव है, और इसका असर विधानसभा चुनावों के परिणाम पर भी पड़ सकता है।

इस बार का चुनाव माई समीकरण (मुस्लिम+यादव) के लिए निर्णायक हो सकता है – या शायद उसके अंत की शुरुआत।