केरल की नर्स को यमन में फांसी से राहत: भारत के ग्रैंड मुफ्ती शेख अबू बक्र अहमद की पहल ने बचाई जान
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मुस्लिम नाउ ब्यूरो,नई दिल्ली/दुबई
वो दौर जब भारत की विदेश नीति को मुस्लिम देशों में बड़ी पैठ का दावा किया जाता है, अब एक बार फिर कड़ी परीक्षा में है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को यूएई, सऊदी अरब जैसे कई इस्लामी देशों से सर्वोच्च नागरिक सम्मान मिले हैं, लेकिन जब ज़मीन पर भारतीय नागरिकों की सुरक्षा का सवाल आता है, तब इन देशों का समर्थन वैसा नहीं दिखता जैसा प्रचारित किया जाता है।
हाल ही में कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले, ऑपरेशन सिंदूर, और अब केरल की नर्स निमिषा प्रिया को यमन में फांसी की सज़ा के मामले ने भारत की सीमित कूटनीतिक पकड़ को उजागर किया है।
लेकिन इस बार एक अहम मोड़ तब आया, जब भारत के ग्रैंड मुफ्ती शेख अबू बक्र अहमद ने व्यक्तिगत हस्तक्षेप कर इस सज़ा को टलवाने में अहम भूमिका निभाई। यह सिर्फ एक मानवता की मिसाल नहीं, बल्कि उस देश के लिए भी संदेश है जहाँ सांस्कृतिक द्वेष और धार्मिक पहचान मिटाने की कोशिशें की जा रही हैं – कि एक मुस्लिम धर्मगुरु ने एक हिंदू महिला की जान बचाने में निर्णायक भूमिका निभाई।
🚨BREAKING NEWS🚨
— We Dravidians (@WeDravidians) July 15, 2025
Sentence Suspended
The death sentence of Nimisha Priya, an Indian nurse from Kerala who was convicted of murder in Yemen, has been temporarily suspended.
This development did not come through Indian government efforts —
but through direct negotiations… pic.twitter.com/F60jkMEuzD
कैसे हुआ हस्तक्षेप?
पुथुप्पल्ली के विधायक श्री चांडी ओमन ने बीते शुक्रवार शेख अबू बक्र अहमद से संपर्क कर यमन की जेल में फांसी की सज़ा झेल रही मलयाली नर्स निमिषा प्रिया के मामले में मदद की गुहार लगाई। विधायक का विश्वास इस पर था कि शेख अबू बक्र अहमद के यमन के सूफी विद्वानों से मजबूत रिश्ते हैं।
शेख अबू बक्र ने मानवीय जिम्मेदारी समझते हुए इस मुद्दे पर कदम उठाने का निर्णय लिया। उन्होंने यमन के प्रसिद्ध सूफी विद्वान हबीब उमर बिन हफीज से संपर्क साधा, जो यमन के समाज में अत्यधिक सम्मानित माने जाते हैं।
हबीब उमर ने इस अपील को गंभीरता से लिया और अपने प्रतिनिधि हबीब अब्दुर्रहमान अली मशहूर के नेतृत्व में एक आपात बैठक आयोजित की, जिसमें यमनी सरकार के वरिष्ठ अधिकारी, सना स्थित आपराधिक न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश, मृतक तलाल के भाई और कई आदिवासी नेता शामिल हुए।
बातचीत बनी जीवनरेखा
इस बैठक में मृतक तलाल के परिवार ने विचार-विमर्श के लिए समय मांगा और आगे बात करने का आश्वासन दिया। इसके बाद बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ – जो कि अब तक असंभव माना जा रहा था।
उसी दिन, यमन के एक वरिष्ठ न्यायाधीश मोहम्मद बिन अमीन, जो शूरा परिषद के सदस्य भी हैं, इस वार्ता में शामिल हुए। उन्होंने परिवार को सुलह और क्षमादान के विकल्प पर सोचने को राज़ी किया।
फांसी टली, उम्मीद कायम
इन प्रयासों के परिणामस्वरूप, यमन की अदालत ने 16 जुलाई 2025 को होने वाली फांसी को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया है। अदालत के निर्णय पर यमन के विशेष न्यायाधीश रिज़वान अहमद अल-वजरी और स्वारी मुदीन मुफ़द्दल ने हस्ताक्षर किए।
यह एक असाधारण सफलता है – खासकर तब जब भारत का यमन से सीमित राजनयिक जुड़ाव है। अब बातचीत और क्षमादान की कोशिशें तेज़ होंगी, जिससे निमिषा प्रिया की रिहाई की संभावनाएं भी बन सकती हैं।
एकता और इंसानियत की मिसाल
इस घटनाक्रम ने साबित किया कि धर्म, राजनीति और सीमाओं से ऊपर उठकर जब सच्ची नीयत और मानवता से प्रयास किए जाते हैं, तो चमत्कार संभव है।
प्रधानमंत्री कार्यालय को इस प्रगति की औपचारिक जानकारी दे दी गई है।
यह घटना सिर्फ एक नर्स की जान बचाने की कहानी नहीं, बल्कि यह भी संदेश है कि जब देश के भीतर नफ़रत का माहौल बन रहा हो, तब भी सच्चे धर्मगुरु इंसानियत का रास्ता दिखा सकते हैं – चाहे वे किसी भी धर्म के हों।
VIDEO | Grand Mufti of India, Kanthapuram AP Aboobacker Musliyar, on the Yemeni authorities' decision to postpone the execution of Kerala nurse Nimisha Priya, says, "I was informed by Yemeni authorities that Nimisha's execution is now postponed and I have also requested them to… pic.twitter.com/yvpMFWeVeg
— Press Trust of India (@PTI_News) July 15, 2025
लेखक की टिप्पणी:
इस कहानी में नायकता किसी सरकार या संस्था की नहीं, बल्कि एक व्यक्ति की है जिसने मानवीय भावना को प्राथमिकता दी। ऐसे समय में जब समाज विभाजित होता जा रहा है, यह घटना हमें याद दिलाती है कि इंसानियत ही सबसे बड़ा धर्म है।

