अयोध्या मस्जिद निर्माण पर गहराया रहस्य: NOC की अड़चनें, RTI का खुलासा और अनसुलझे सवाल
मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नई दिल्ली
अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण तेजी से हो रहा है, जिसकी भव्यता और प्रगति पर किसी को कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन, इससे लगभग 25 किलोमीटर दूर धन्नीपुर गांव में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर बनने वाली मस्जिद का निर्माण शुरू होने से पहले ही अधर में लटक गया है। अयोध्या विकास प्राधिकरण (एडीए) ने इस प्रोजेक्ट को यह कहते हुए खारिज कर दिया है कि संबंधित विभागों ने अभी तक अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) नहीं दिए हैं। यह एक ऐसा फैसला है जिसने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं: क्या कोई ऐसी ताकत है जो नहीं चाहती कि राम मंदिर के पास मस्जिद बने? या फिर यह एक प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा है जिसमें देरी स्वाभाविक है?
एक स्थानीय पत्रकार द्वारा सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम के तहत जानकारी मांगे जाने के बाद इस मामले से पर्दा हटा। यदि यह RTI नहीं डाली जाती, तो शायद यह रहस्य और भी लंबे समय तक छिपा रहता। पत्रकार ओम प्रकाश सिंह ने 16 सितंबर, 2025 को एक RTI दायर कर अयोध्या मस्जिद निर्माण की स्थिति के बारे में जानकारी मांगी। इसके जवाब में, अयोध्या विकास प्राधिकरण ने पत्र संख्या 3847 के माध्यम से बताया कि मस्जिद निर्माण के लिए प्रस्तुत योजना को खारिज कर दिया गया है।
अनापत्ति प्रमाण पत्रों की अड़चनें
एडीए के अनुसार, मस्जिद ट्रस्ट द्वारा 23 जून, 2021 को आवेदन प्रस्तुत किया गया था, लेकिन विभिन्न सरकारी विभागों से एनओसी प्राप्त नहीं हुए। इन विभागों में लोक निर्माण विभाग (PWD), प्रदूषण नियंत्रण, नागरिक उड्डयन, सिंचाई, राजस्व, नगर निगम और अग्निशमन सेवाएं शामिल हैं।
इन विभागों की ओर से कई साल गुजरने के बाद भी मंजूरी न मिलने का हवाला देकर, एडीए ने मस्जिद की योजना को खारिज कर दिया। यह आश्चर्यजनक है कि जब पास के राम मंदिर के निर्माण में ऐसी कोई अड़चन नहीं आई, तो मस्जिद के मामले में एक साथ इतने विभागों ने ‘नहीं’ क्यों कह दिया? मस्जिद ट्रस्ट के सचिव, अतहर हुसैन ने इस फैसले पर हैरानी जताते हुए कहा, “सुप्रीम कोर्ट ने मस्जिद के लिए जमीन का आवंटन किया था और उत्तर प्रदेश सरकार ने भूखंड आवंटित किया था। मुझे यह समझ नहीं आ रहा है कि सरकारी विभागों ने अनापत्ति क्यों नहीं दी और प्राधिकरण ने मस्जिद की योजना को क्यों खारिज कर दिया।”
अग्निशमन विभाग की आपत्ति और अन्य विभागों का मौन
अतहर हुसैन ने यह भी बताया कि स्थल निरीक्षण के दौरान, केवल अग्निशमन विभाग ने पहुंच मार्ग को लेकर एक आपत्ति दर्ज कराई थी। उनकी आपत्ति के अनुसार, प्रस्तावित मस्जिद और अस्पताल भवन के मानदंडों के अनुरूप पहुंच मार्ग कम से कम 12 मीटर चौड़ा होना चाहिए, जबकि स्थल पर सड़क केवल छह मीटर चौड़ी है और मस्जिद के मुख्य प्रवेश द्वार पर सिर्फ चार मीटर चौड़ी है। हालांकि, हुसैन ने स्पष्ट किया कि उन्हें अग्निशमन विभाग की आपत्ति के अलावा अन्य किसी भी विभाग की आपत्तियों के बारे में कोई जानकारी नहीं है।
यह एक महत्वपूर्ण बिंदु है। अगर सिर्फ एक विभाग ने ही विशिष्ट आपत्ति उठाई थी, तो बाकी विभागों ने कोई स्पष्टीकरण क्यों नहीं दिया? क्या वे सिर्फ एक-दूसरे की मंजूरी का इंतजार कर रहे थे? या फिर इस देरी के पीछे कोई और अनकहा कारण था? ये सवाल तब और भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं जब यह पता चलता है कि मस्जिद ट्रस्ट ने आवेदन और जांच शुल्क के रूप में 4,02,628 रुपये भी जमा करा दिए थे।
क्या 2026 के समारोहों से जुड़ा है मामला?
एक और आशंका यह भी जताई जा रही है कि चूंकि 2026 में राम मंदिर का निर्माण पूरा होगा और भव्य समारोह प्रस्तावित हैं, ऐसे में मस्जिद के निर्माण को किसी बहाने से तब तक रोक दिया जाए ताकि समारोह की भव्यता कम न हो। हालांकि, यह सब केवल काल्पनिक सवाल हैं जब तक कि इस मामले की गहन जांच न हो जाए। यह भी एक पक्ष की ओर से संदेह है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी अयोध्या में नई मस्जिद के निर्माण का कुछ लोग विरोध कर रहे थे और इस देरी के पीछे उन्हीं का हाथ हो सकता है।

एडीए का स्पष्टीकरण: स्वतः अस्वीकृति और ट्रस्ट की जिम्मेदारी
मस्जिद के लेआउट प्लान को खारिज करने की खबरों के बाद, अयोध्या विकास प्राधिकरण ने अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा है कि यह एक ‘स्वतः अस्वीकृति’ (auto-rejection) का मामला है। एडीए के अधिकारियों ने मंगलवार को कहा कि भवन योजना की स्वीकृति के लिए आवश्यक सभी दस्तावेजों के साथ अपना आवेदन फिर से प्रस्तुत करने की जिम्मेदारी मस्जिद ट्रस्ट की है।
अधिकारियों ने बताया कि अन्य सभी आवेदकों की तरह, मस्जिद ट्रस्ट को भी ऑनलाइन मानचित्र अनुमोदन पोर्टल पर अपने दस्तावेज डिजिटल रूप से जमा करने के लिए कहा गया था। एडीए ने आवेदन की जांच के बाद, जरूरी दस्तावेजों और एनओसी की मांग की थी, लेकिन ट्रस्ट द्वारा समय पर वे दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए गए। आवास विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि अनिवार्य दस्तावेजों, जिनमें भूमि स्वामित्व विलेख, वास्तुकार प्रमाण पत्र और म्यूटेशन पत्र शामिल हैं, के अलावा सशर्त दस्तावेजों का एक सेट भी मांगा जाता है, जिसमें संबंधित अधिकारियों जैसे रेलवे, सिंचाई, लोक निर्माण, हवाई अड्डा या अग्निशमन सेवाओं से एनओसी शामिल हो सकते हैं।
एडीए अधिकारी ने कहा, “आवेदक को डैशबोर्ड पर आवेदन की अस्वीकृति या लंबित होने का कारण और निर्धारित समय-सीमा दिखाई देगी। यदि लंबित दस्तावेज समय पर उपलब्ध नहीं कराए जाते हैं, तो आवेदन स्वतः अस्वीकृत हो जाता है। ट्रस्ट द्वारा अंतिम आवेदन 6 मई, 2023 को किया गया था और उनका आवेदन 12 अप्रैल, 2024 को स्वतः अस्वीकृत हो गया था। हमने पत्र भी जारी किए हैं और उसके बाद ट्रस्ट के पदाधिकारियों को इस मामले के बारे में लिखित रूप से सूचित किया है।”
अधिकारियों ने यह भी बताया कि नए आवेदन को 4 जुलाई को अधिसूचित संशोधित भवन निर्माण और भवन उपनियमों के अनुसार करना होगा।
ट्रस्ट और एडीए के बीच संवादहीनता
एडीए के इस स्पष्टीकरण से एक और सवाल उठता है: क्या मस्जिद ट्रस्ट और एडीए के बीच संवाद में कोई कमी थी? एक तरफ जहां एडीए दावा कर रहा है कि ट्रस्ट को कई बार सूचित किया गया था, वहीं ट्रस्ट के सचिव अतहर हुसैन कहते हैं कि उन्हें अग्निशमन विभाग के अलावा अन्य किसी आपत्ति की जानकारी नहीं थी। यह संवादहीनता इस पूरे मामले को और भी जटिल बना देती है।
अंत में, यह मामला सिर्फ एक मस्जिद के निर्माण की योजना का नहीं है, बल्कि यह देश के सबसे संवेदनशील मामलों में से एक पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद के घटनाक्रम को दर्शाता है। राम मंदिर के निर्माण की तुलना में मस्जिद के निर्माण में आई ये अड़चनें कई अनसुलझे सवालों को जन्म देती हैं, जिनके जवाब केवल जांच के बाद ही सामने आ सकते हैं। यह देखना बाकी है कि ट्रस्ट इस मुद्दे को कैसे सुलझाता है और क्या धन्नीपुर में मस्जिद का सपना सच हो पाएगा।

