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आई लव मुहम्मद प्रकरण: मोहब्बत सजा, नेतृत्व की चुप्पी और दोहरे मापदंड

मुस्लिम नाउ विशेष

‘आई लव मुहम्मद’—ये चंद अल्फ़ाज़ इन दिनों भारत में नफरत और राजनीतिक खेल का मैदान बन चुके हैं। मौलाना तौकीर रज़ा खान की गिरफ्तारी के बाद हालात एक अजीब मोड़ पर आ खड़े हुए हैं। एक तरफ सड़कों पर मोहब्बत का इज़हार करने वाले लोग हैं, जिनकी कुछ गलतियों को लेकर उन पर कार्रवाई की जा रही है—जो अगर कानूनन सही है, तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए। मगर दूसरी ओर, वही सत्ता और वही मीडिया अचानक नैतिकता के प्रवचन देने लगे हैं।

अब मुस्लिम समाज को आदर्श नागरिकता का पाठ पढ़ाने के लिए सामने आ गए हैं कुछ ऐसे “भाड़े के चिंतक”, “किताबी मुसलमान”, और “ठेकेदार विद्वान”, जो न तो ज़मीनी सच्चाई से वाक़िफ हैं और न ही इस कौम के दर्द को समझते हैं। इन लोगों की लेखनी में न आत्मा है, न संवेदना—सिर्फ एक एजेंडा है: मुसलमानों को कमज़ोर दिखाना, बांटना और नेतृत्व को बदनाम करना।

ये वही लोग हैं जो मंच से या कॉलम में ये कहकर वाहवाही लूटते हैं कि “पैगंबर मोहम्मद की मोहब्बत किसी एक मौलाना की बपौती नहीं है।” और साथ में यह उपदेश भी दे डालते हैं कि “आई लव मुहम्मद कहने वालों को मक्का चार्टर पढ़ना चाहिए!” बिल्कुल! पढ़ना चाहिए! लेकिन सवाल ये है कि मक्का चार्टर की बातें सिर्फ मुसलमानों को क्यों पढ़ाई जाती हैं? जब देशभर में मस्जिदों और दरगाहों पर हमले होते हैं, तब इन ‘चार्टर प्रेमियों’ की ज़बान सिल क्यों जाती है?

क्या ज्ञापन देना अपराध है? अगर कुछ लोगों ने कानून तोड़ा, तो उनके खिलाफ़ कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन क्या बिना किसी मुकम्मल जांच के घरों को गिरा देना, संपत्तियां उजाड़ देना, यही न्याय है? अगर वे अवैध थीं तो पहले कार्रवाई क्यों नहीं हुई? क्या सरकारें इंतज़ार कर रही थीं कि कोई प्रतिक्रिया हो और उसके बहाने पूरे समुदाय को सज़ा दी जा सके?

यह साफ तौर पर सत्ता का दुरुपयोग है। सत्ता में बैठा नेतृत्व अगर आज चुप है, तो कल यही चुप्पी उसके पतन का कारण भी बन सकती है। आप कहते हैं कि मुसलमान आपको वोट नहीं देते। तो सवाल ये है कि आपने दिया क्या है इस कौम को? न शिक्षा, न रोजगार, न सुरक्षा—बल्कि छात्रवृत्तियां बंद कर दीं, सरकारी नौकरियों में प्रतिनिधित्व घटा दिया, और उन मुसलमानों को कुर्सियों से हटा दिया जो कभी कुछ बोल सकते थे।

आपने कुछ ‘प्यादे मुसलमान’ खड़े कर दिए जो बस हां में हां मिलाते हैं, और कौम के खिलाफ़ नरेटिव को हवा देते हैं। जो आपके विरोध में बोलता है, उसे देशद्रोही बना कर जेल भेज दिया जाता है। क्या यही न्याय है? क्या यही लोकतंत्र है?

और मक्का चार्टर? वो तो एक शानदार दस्तावेज़ है जो इंसानियत, भाईचारे, न्याय और सहअस्तित्व की बात करता है। लेकिन उस चार्टर की बात करने वाले तब क्यों खामोश रहते हैं जब देश के एक हिस्से में मुसलमानों को उनके व्यापार, दुकानों, या घरों से केवल उनकी पहचान की वजह से निशाना बनाया जाता है? जब इंदौर में ‘पाकिस्तानी’ कहकर मुसलमान व्यापारियों को धमकाया जाता है, तब मक्का चार्टर की बातें कहां चली जाती हैं?

नेता का काम होता है—सिर्फ सत्ता चलाना नहीं, बल्कि इंसाफ़ करना। और जब इंसाफ़ नहीं होता, तो मोहब्बत का इज़हार भी गुनाह बना दिया जाता है। तब ‘आई लव मुहम्मद’ कहना एक आपराधिक बयान बन जाता है, और मोहब्बत के जवाब में सजा दी जाती है।

आज मुसलमानों को यह जानने की ज़रूरत है कि जो लोग आपको नैतिकता सिखा रहे हैं, वे खुद कितने नैतिक हैं। क्या वे हर धार्मिक समुदाय के लिए एक सा मापदंड अपनाते हैं? क्या वे सत्ता से सवाल पूछते हैं या सिर्फ मुसलमानों से?

देश सौहार्द से चलता है, साजिश से नहीं। और अगर किसी एक समुदाय को लगातार निशाना बनाया जाएगा, उसकी आवाज़ दबाई जाएगी, और उसकी मोहब्बत को नफरत में बदलने की कोशिश की जाएगी—तो इसका असर न सिर्फ उस समुदाय पर, बल्कि पूरे राष्ट्र के ताने-बाने पर पड़ेगा।

आज ज़रूरत इस बात की है कि सियासी नौटंकी बंद हो, भाड़े के विद्वानों की कलम रुकें, और नेतृत्व ज़मीन पर उतर कर इंसाफ़ करे। मुसलमानों को आपसी मतभेदों को किनारे रख कर, सही और गलत में फर्क करना होगा, और अपने असल रहनुमा की पहचान करनी होगी—जो किताबों से नहीं, जमीनी हकीकत से निकलते हैं।


निष्कर्ष:
“आई लव मुहम्मद” सिर्फ एक नारा नहीं है। यह एक मोहब्बत है, एक सलीका है, एक अंदाज़-ए-जिंदगी है। अगर सत्ता इसे गुनाह बना दे, और समाज इसे टकराव का जरिया बना दे, तो सबसे बड़ा सवाल यही उठता है: क्या आज इस मुल्क में मोहब्बत भी बगावत है?