लोकसभा से गायब: मुस्लिम महिलाएँ — एक संघर्ष, एक आवाज़
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मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नई दिल्ली
“Missing from the House: Muslim Women in the Lok Sabha” — रशीद किदवई और अंबर कुमार घोष की यह पुस्तक भारतीय लोकतंत्र के सबसे कम बताई गई और उपेक्षित पहलू को उजागर करती है: लोकसभा में मुस्लिम महिलाओं की उपस्थिति। यह पुस्तक उन चुनिंदा अठारह मुस्लिम महिलाओं की कहानी है, जिन्होंने भारतीय राजनीति की राजनीति और जटिलताओं के बीच अपनी पहचान बनाई, और लोकसभा में अपनी सीट सुरक्षित की।
भारतीय लोकतंत्र में जब हम समानता, समावेशन और विविधता की बात करते हैं, तो अक्सर यह आवाजें अनसुनी रह जाती हैं जो मुख्यधारा से बाहर हैं, विशेषकर उन मुस्लिम महिलाओं की जो बहुमत के शोर में दब जाती हैं। ये महिलाएँ अपनी दोहरी पहचान— एक महिला होने के नाते समाज में स्वीकृति प्राप्त करने की कठिनाई और दूसरी, मुस्लिम पहचान के चलते राजनीतिक और सामाजिक अड़चनों का सामना करती हैं। उनकी राजनीति, उनकी आवाज़ और उनके संघर्ष की उपेक्षा अक्सर होती रही है, लेकिन यह किताब उन अदृश्य कहानियों को सामने लाती है जिन्हें समाज ने कभी ध्यान से नहीं सुना।

अठारह मुस्लिम महिलाएँ और उनके संघर्ष
आज तक भारत में लोकसभा तक पहुँचने वाली मुस्लिम महिलाओं की संख्या महज अठारह रही है। यह आंकड़ा उस संसद के संदर्भ में है, जिसमें 543 सीटें हैं। अठारह महिला सांसदों के मुकाबले, जिनमें से कई पारंपरिक राजनीतिक परिवारों से आईं हैं, यह सवाल उठता है कि समाज और राजनीति में मुस्लिम महिलाओं की भागीदारी कितनी सीमित रही है। इस पर और भी हैरानी की बात यह है कि उन अठारह मुस्लिम महिलाओं में से किसी को भी ऐसा अवसर नहीं मिला कि वह पूरी तरह से अपनी पहचान और मुद्दों पर चर्चा कर सके। साथ ही, पाँच बार ऐसी स्थिति आई है जब लोकसभा में कोई मुस्लिम महिला सांसद ही नहीं थी।
भारत के दक्षिणी राज्यों — तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और केरल में कभी एक भी मुस्लिम महिला सांसद नहीं चुनी गई, जो भारतीय राजनीति की समावेशन की दावे पर सवाल खड़ा करता है। अगर हम भारतीय राजनीति की बारीकी से पड़ताल करें, तो यह पाया जाता है कि इन अठारह महिला सांसदों में से अधिकतर राजनीतिक परिवारों से थीं। यह स्थिति हमें बताती है कि राजनीति में महिलाओं के लिए प्रवेश का रास्ता अक्सर पारिवारिक वंशवाद से पक्का होता है, जिसमें टिकट मिलना और नेता बनना एक पारिवारिक सहमति और समर्थन पर निर्भर करता है।
मुस्लिम महिलाओं की अनदेखी, उनके संघर्षों की गाथा
पुस्तक यह स्पष्ट करती है कि मुस्लिम महिला सांसदों ने कभी खुद को सिर्फ़ “मुस्लिम मुद्दों” तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने महिलाओं के अधिकार, स्वास्थ्य, शिक्षा, महिला सशक्तिकरण और सामाजिक न्याय जैसे विषयों पर भी संसद में सक्रिय रूप से अपनी आवाज़ उठाई। बावजूद इसके, उन्हें अक्सर धर्म के संदर्भ में ही देखा गया, उनकी मंशा पर सवाल उठाए गए। वे न सिर्फ़ संसद में बहसों का हिस्सा बनतीं, बल्कि विभिन्न समितियों में भी सक्रिय भूमिका निभाती थीं। बावजूद इसके, उनकी उपलब्धियों को इतिहास के पन्नों में सीमित स्थान मिला है।
यह सच है कि इन महिला सांसदों पर कभी भी भ्रष्टाचार या किसी तरह की अनैतिक गतिविधियों का आरोप नहीं लगा। न ही उन्होंने कभी सार्वजनिक विवादों में भाग लिया या राजनीति के हाशिये पर खड़े होकर अपने कार्यों को अंजाम दिया। वे हमेशा जनता की आवाज़ बनीं और अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करती रहीं।

समानता की ओर एक कदम और
यह पुस्तक केवल एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि यह एक आईना है जो हमें हमारे लोकतंत्र की वास्तविक स्थिति दिखाता है। भारतीय लोकतंत्र का असली मापदंड यह नहीं हो सकता कि सिर्फ़ वोटों के जरिए चुनावी प्रक्रिया पूरी हो, बल्कि असली लोकतंत्र तो यह है कि हर पहचान, हर आवाज़ संसद की दहलीज़ तक पहुँचे। जब तक हम यह लक्ष्य हासिल नहीं कर लेते, तब तक “गायबियाँ” बनी रहेंगी।
यह किताब हमें यह भी याद दिलाती है कि केवल महिला आरक्षण से ही समस्या हल नहीं होने वाली। इसका समाधान राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी में भी निहित है। यह समय की मांग है कि राजनीतिक दल महिलाओं को न केवल आरक्षण दें, बल्कि उन्हें टिकट देने, नेतृत्व में शामिल करने और प्रशिक्षण देने में भी सक्रिय भूमिका निभाएँ। साथ ही, समाज, मीडिया और युवा स्तर पर महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को बढ़ावा देने की आवश्यकता है।
निष्कर्ष
इन अठारह मुस्लिम महिलाओं ने संसद तक अपनी यात्रा की, उन्होंने कई बाधाओं को तोड़ा और राजनीतिक रूप से अपनी छाप छोड़ी। वे न सिर्फ़ अपनी मुस्लिम पहचान से, बल्कि अपनी महिला पहचान से भी जूझते हुए लोकतंत्र में सक्रिय भागीदार बनीं। फिर भी, उनकी कहानियाँ और योगदान अक्सर पीछे रह जाते हैं। पुस्तक हमें यह समझाती है कि लोकतंत्र में वास्तविक समावेशन तभी संभव है जब हम उन सभी आवाज़ों को सुनें, जिन्हें अब तक दबाया गया है। “Missing from the House” हमें यह सिखाती है कि लोकतंत्र केवल वोटों की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह आवाज़ों की बुनियाद पर खड़ा है।

