क्या ‘धुरंधर’ सुरक्षा चूकों को ढँकने की नई सिनेमाई रणनीति है?
मुस्लिम नाउ विशेष
अक्षय खन्ना और रणवीर सिंह अभिनीत फ़िल्म ‘धुरंधर’ मात्र एक सिनेमैटिक प्रस्तुति नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा सवालों का पिटारा है जो सीधे हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा, कूटनीति और सिनेमाई मंशा पर प्रश्नचिह्न लगाता है। यह सवाल उठाना लाज़मी है कि क्या देश की सुरक्षा चूकों के लिए जिम्मेदार व्यक्तियों को बार-बार नायक बनाकर पेश करने की यह एक और कड़ी है?
फ़िल्म की कहानी में भारत में नकली करेंसी सप्लाई करने के लिए कतर को ज़िम्मेदार ठहराने के पीछे क्या उद्देश्य हो सकता है? यह एक ख़तरनाक क़दम है, जो अरब देशों, विशेषकर कतर के साथ हमारे नाजुक कूटनीतिक संबंधों को गंभीर रूप से ख़राब कर सकता है। क्या अरब देशों में इस फ़िल्म पर लगा प्रतिबंध, इसमें दिखाए गए किसी विशेष संवाद का सीधा परिणाम है?
इससे भी अधिक परेशान करने वाली बात यह है कि फ़िल्म पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी और माफिया गैंग तक भारतीय करेंसी पहुँचाने के लिए देश के एक मंत्री को जिम्मेदार ठहराती है। यह सवाल मस्तिष्कों में गूँजता है: क्या जिस समय की कहानी फ़िल्म बताती है, उस समय की सरकार में ऐसे लोग शामिल थे जो वास्तव में आईएसआई और पाकिस्तान के अपराधियों के लिए काम कर रहे थे? यदि ऐसा था, तो इन घटनाओं के सबूत आज तक बाहर क्यों नहीं आए? फ़िल्म में सुरक्षा की जिस बागडोर को दिखाया गया है, उसे संभालने वाले लोग यदि आज भी महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारियों पर हैं, तो वे अब उस मंत्री को बेनकाब क्यों नहीं कर सकते, जबकि फ़िल्म के अनुसार, “उसका वक्त” आ चुका है?
दरअसल, आज के दौर में राष्ट्रवाद के नाम पर एक तरह की ‘अफीम’ चटाने का रिवाज चल पड़ा है, और ‘धुरंधर’ उसी श्रृंखला का एक हिस्सा है। चूँकि छोटे पर्दे पर यह राष्ट्रवादी फॉर्मूला हमेशा हिट होता है, फ़िल्म निर्माता इसी मंत्र का अनुसरण करते हैं। जबकि देश का सबसे बड़ा और प्रत्यक्ष दुश्मन चीन है, और हमारे पड़ोसी देशों को नुकसान पहुँचाने में उसकी परोक्ष या प्रत्यक्ष भूमिका के प्रमाण अक्सर मिलते रहे हैं, फिर भी हम चीन के ख़िलाफ़ सिनेमा नहीं बनाते। शायद इसलिए कि चीनी ख़ुफ़िया एजेंसी को उस तरह से हास्यास्पद नहीं दिखाया जा सकता, जिस तरह पाकिस्तान की एजेंसी को दिखाने का चलन है।
‘धुरंधर’ को एक बेवकूफाना फ़िल्म इसलिए भी कहा जा सकता है क्योंकि जहाँ एक ओर हमारा तेज-तर्रार एजेंट, भारत में दहशत फैलाने की पूरी योजना को अपनी आँखों के सामने बनते देखता है—यहाँ तक कि मुंबई के हमलावर को हथियार तक सप्लाई करता है—मगर देश को सही जानकारी देने में विफल रहता है। उसकी उपस्थिति में भारत की संसद पर हमला हो जाता है, लेकिन हमारा हीरो लियारी के रहमान डकैत को मारकर ख़ुद सरगना बन जाने को अपनी सबसे बड़ी सफलता मानकर संतुष्ट हो जाता है।
एक और गंभीर समस्या बलोचिस्तान को लेकर है। भारत जिस बलोचिस्तान को अपना मानता है और जिसके लोगों को अपना मानता है, उन्हीं बलोचों को फ़िल्म में भारत में आतंकवाद फैलाने के लिए हथियार सप्लायर के रूप में चित्रित किया गया है। यहाँ हथियार सप्लायर के मुँह से आईएसआई की ज़्यादतियों को दिखाने का क्या तर्क है, यह बिलकुल समझ से परे है।
हालाँकि, आप इस फ़िल्म को उस व्यापक प्रयास का हिस्सा मानकर नज़रअंदाज़ कर सकते हैं, जिसमें लेखों, पुस्तकों और फ़िल्मों के माध्यम से भारत की तमाम बड़ी सुरक्षा चूकों के जिम्मेदार लोगों को बार-बार हीरो बनाकर पेश करने की कोशिश की जाती रही है। हाँ, आपको फ़िल्म की सिनेमेटोग्राफी, और अक्षय खन्ना एवं रणवीर सिंह के अभिनय की दाद ज़रूर देनी चाहिए। बाकी, फ़िल्म में हिंसा, नारा-ए-तकबीर और कान फाड़ू संगीत के ज़रिए राष्ट्रवाद को उभारने की भरपूर कोशिश की गई है। इस फ़िल्म को भी उसी व्यक्ति ने बनाया है जो एक ख़ास व्यक्ति को बार-बार नायक बनाने की कोशिश करता रहा है।
फ़िल्म के अंतिम क्षणों में यह संवाद कि “यह नया भारत है, घर में घुसेगा भी और मारेगा,” राजनीतिक मंशा को स्पष्ट कर जाता है। यदि फ़िल्म में साहस होता, तो गलवान, उरी, पहलगाम, या दिल्ली बम ब्लास्ट जैसी सुरक्षा चूकों पर भी सवाल उठाया जाता। ख़ैर, जिसे खुश करना था, उसे फ़िल्म खुश करने में पूरी तरह सफल होती है, यह तो दर्शकों को मानना ही पड़ेगा।

