ईरान में सख़्त कार्रवाई और इंटरनेट बंदी के बाद देशव्यापी विरोध प्रदर्शनों की रफ्तार धीमी, हालात काबू में
दुबई
ईरान की इस्लामिक सत्ता के खिलाफ भड़के देशव्यापी विरोध प्रदर्शन गुरुवार को धीरे-धीरे थमते हुए दिखाई दिए। एक सप्ताह से जारी सख़्त सरकारी कार्रवाई, व्यापक गिरफ्तारियों और लगभग पूर्ण इंटरनेट बंदी के बाद सड़कों पर आंदोलन की तीव्रता में स्पष्ट कमी दर्ज की गई है। हालांकि हालात फिलहाल शांत दिख रहे हैं, लेकिन देश के भीतर तनाव और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता अब भी बरकरार है।
ईरान में विरोध प्रदर्शनों की शुरुआत देश की बिगड़ती आर्थिक स्थिति, महंगाई, मुद्रा के तेज़ी से गिरते मूल्य और बेरोज़गारी के खिलाफ हुई थी। देखते ही देखते ये प्रदर्शन सरकार विरोधी आंदोलन में तब्दील हो गए, जिसने इस्लामिक गणराज्य की सत्ता को सीधी चुनौती दी। इसके जवाब में सरकार ने देश को बाहरी दुनिया से लगभग पूरी तरह काट दिया और सुरक्षा बलों को सख़्त कार्रवाई के निर्देश दिए।
मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और विपक्षी समूहों का दावा है कि इस दमनकारी अभियान में अब तक कम से कम 2,615 लोगों की मौत हो चुकी है। हालांकि, ईरानी सरकार ने इन आंकड़ों की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है। सरकार का कहना है कि सुरक्षा बल “अराजक तत्वों” और “आतंकवादी समूहों” के खिलाफ कार्रवाई कर रहे हैं, जो देश की स्थिरता को नुकसान पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं।
गुरुवार को राजधानी तेहरान सहित कई बड़े शहरों में हालात अपेक्षाकृत शांत नजर आए। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, पिछले कुछ दिनों की तुलना में सड़कों पर न तो रात के समय जलाए गए अलावों के निशान दिखाई दिए और न ही किसी तरह के मलबे या तोड़फोड़ के संकेत मिले। यह संकेत करता है कि या तो प्रदर्शनकारियों ने फिलहाल पीछे हटने का फैसला किया है या फिर सुरक्षा बलों की कड़ी निगरानी और दबाव के चलते आंदोलन को जारी रखना मुश्किल हो गया है।
इसी दौरान ईरानी सरकारी मीडिया ने लगातार नई गिरफ्तारियों की खबरें प्रसारित कीं। रिपोर्टों के अनुसार, सुरक्षा एजेंसियां उन लोगों को निशाना बना रही हैं, जिन्हें वे “आतंकवादी” करार दे रही हैं। इसके साथ ही, अधिकारी स्टारलिंक सैटेलाइट इंटरनेट डिश की तलाश में भी जुटे हैं। मौजूदा हालात में यही उपकरण वीडियो और तस्वीरें अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाने का लगभग एकमात्र जरिया बने हुए हैं, क्योंकि देश के भीतर इंटरनेट सेवाएं बुरी तरह बाधित हैं।
ईरान की न्यायपालिका से जुड़ी मिज़ान समाचार एजेंसी ने बुधवार को न्याय मंत्री अमीन हुसैन रहीमी के हवाले से कहा,
“आठ जनवरी से हमने एक पूर्ण युद्ध देखा है और तब से इसमें शामिल हर व्यक्ति अपराधी है।”
इस बयान को सरकार के कठोर रुख और आने वाले दिनों में और सख़्त कार्रवाई के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
इन आंतरिक हालात के बीच, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ईरान को लेकर गतिविधियां तेज़ हो गई हैं। अमेरिका ने उन ईरानी अधिकारियों पर नए प्रतिबंध लगाए हैं, जिन पर दिसंबर के अंत में हुए प्रदर्शनों को कुचलने का आरोप है। वॉशिंगटन का कहना है कि ये प्रतिबंध मानवाधिकार उल्लंघनों के लिए ज़िम्मेदार लोगों को जवाबदेह ठहराने की दिशा में उठाया गया कदम हैं।
वहीं, ग्रुप ऑफ सेवन (G-7) औद्योगिक लोकतांत्रिक देशों और यूरोपीय संघ ने भी संकेत दिए हैं कि वे ईरान की इस्लामिक सरकार पर दबाव बढ़ाने के लिए और प्रतिबंधों पर विचार कर सकते हैं। इन देशों का मानना है कि मौजूदा दमनकारी कार्रवाई न केवल मानवाधिकारों का उल्लंघन है, बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता के लिए भी गंभीर खतरा पैदा कर रही है।
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने अमेरिका के अनुरोध पर गुरुवार दोपहर ईरान पर एक आपात बैठक बुलाई। इस बैठक में ईरान के आंतरिक हालात, मानवाधिकार स्थिति और क्षेत्रीय सुरक्षा पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों पर चर्चा की गई।
हालांकि, क्षेत्र में तनाव को लेकर अमेरिका की संभावित जवाबी सैन्य कार्रवाई की आशंका बनी हुई है, लेकिन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया बयानों से कुछ हद तक तनाव कम होने के संकेत भी मिले हैं। ट्रंप ने संकेत दिया है कि वाशिंगटन फिलहाल स्थिति पर नज़र बनाए हुए है और आगे के कदम परिस्थितियों के अनुसार तय किए जाएंगे।
इस बीच, गुरुवार तड़के ईरान ने बिना किसी आधिकारिक स्पष्टीकरण के कई घंटों के लिए अपना हवाई क्षेत्र बंद कर दिया। इससे पहले भी इस्लामिक गणराज्य ऐसा कदम इज़राइल के साथ टकराव और जून में चले 12 दिनों के युद्ध के दौरान उठा चुका है। हवाई क्षेत्र बंद किए जाने को सुरक्षा चिंताओं और संभावित खतरों से जोड़कर देखा जा रहा है।
कुल मिलाकर, ईरान में फिलहाल विरोध प्रदर्शनों की तीव्रता में कमी आई है और सरकार ने स्थिति पर अस्थायी नियंत्रण स्थापित कर लिया है। हालांकि, गहराते आर्थिक संकट, जनता में असंतोष और अंतरराष्ट्रीय दबाव को देखते हुए यह शांति कितनी स्थायी होगी, इस पर अभी भी सवाल बने हुए हैं। आने वाले दिन तय करेंगे कि यह ठहराव किसी समाधान की ओर बढ़ता है या फिर एक नए और अधिक व्यापक संघर्ष की भूमिका बनता है।

