PoliticsTOP STORIES

‘कैसा हराया!’ AIMIM की सहर शेख का पलटवार, विरोधियों पर तीखा हमला

मुंबई महानगरपालिका चुनाव के नतीजों के बाद मुंब्रा की राजनीति में जबरदस्त हलचल देखने को मिल रही है। AIMIM की युवा उम्मीदवार सहर शेख ने भारी मतों से जीत दर्ज कर न सिर्फ़ अपने विरोधियों को चौंकाया, बल्कि दशकों से चले आ रहे सियासी किलों को भी हिला दिया। जीत के बाद उनके मुंह से निकला एक वाक्य — “कैसा हराया!” — सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। कुछ लोगों ने इसे घमंड बताया, तो कुछ ने इसे आत्मविश्वास। ट्रोलिंग के बीच अब सहर शेख ने खुलकर जवाब दिया है और अपने विरोधियों पर तीखा पलटवार भी किया है।

सहर शेख ने साफ़ कहा कि उनकी यह प्रतिक्रिया जीत की खुशी और संघर्ष के अंत की स्वाभाविक अभिव्यक्ति थी। उन्होंने कहा,
“हमारे विरोधियों को पूरा यक़ीन था कि हम हार जाएंगे। उन्हें लगता था कि AIMIM का वजूद मुंब्रा में खत्म हो चुका है। लेकिन हमें अपनी मेहनत और अपने कैंपेन पर भरोसा था। हमने पूरी योजना के साथ चुनाव लड़ा और नतीजे उम्मीद के मुताबिक आए। जब ऐसा होता है तो खुशी ज़ाहिर होती है। अल्हम्दुलिल्लाह, ‘कैसा हराया’ मेरी उसी खुशी का इज़हार था।”

जितेंद्र आव्हाड पर सीधा आरोप

सहर शेख ने शरद पवार की पार्टी NCP (शरद पवार गुट) के विधायक जितेंद्र आव्हाड पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि आव्हाड ने उन्हें और उनके परिवार को नगर निगम चुनाव में टिकट देने का वादा किया था, लेकिन आख़िरी वक्त पर वह वादा तोड़ दिया गया।
सहर शेख के मुताबिक,
“जितेंद्र आव्हाड ने मेरे पिता से कई लोगों के सामने वादा किया था कि मुझे टिकट दिया जाएगा। आख़िरी दिन तक वह यही कहते रहे। लेकिन ऐन मौके पर उन्होंने शब्द फिरवला। ऐसे नेताओं को चुनौती देना ज़रूरी था। अगर मैं ऐसा न करती तो अल्लाह को क्या जवाब देती?”

उन्होंने दो टूक कहा,
“आव्हाड ने मेरी एक उम्मीदवारी काटी, और मैंने उनके चार नगरसेवक गिरा दिए।”

पारिवारिक पृष्ठभूमि और सियासी विश्वासघात

सहर शेख ने बताया कि उनके पिता शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की स्थापना के समय से ही मुंब्रा ब्लॉक अध्यक्ष रहे हैं। वर्षों तक पार्टी के लिए काम किया, लेकिन जब टिकट देने की बारी आई तो उन्हें नज़रअंदाज़ कर दिया गया।
उन्होंने कहा,
“मेरे पिता ने जितेंद्र आव्हाड को जिताने में पूरी ताक़त लगा दी थी। लेकिन उसी नेता ने हमें धोखा दिया। यह सिर्फ़ राजनीतिक फैसला नहीं, बल्कि भरोसे का कत्ल था।”

AIMIM का टिकट और ‘अल्लाह का इशारा’

सहर शेख ने बताया कि अगर पहले से साफ़ कर दिया जाता कि टिकट नहीं मिलेगा, तो उनके पास दूसरे राजनीतिक विकल्प मौजूद थे। अजित पवार की NCP ने भी उन्हें ऑफ़र दिया था, लेकिन भाजपा के साथ गठबंधन के कारण उन्होंने उसे ठुकरा दिया।
नामांकन के दिन का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा,
“जब कांग्रेस और AIMIM के लोग AB फॉर्म लेकर सामने खड़े थे, तब AIMIM की तरफ़ से ऑफ़र आया। मुझे लगा यह अल्लाह की तरफ़ से भेजा गया रास्ता है। मैंने उसी पल फैसला किया और AIMIM के टिकट पर चुनाव लड़ा — और जीती।”

रिकॉर्ड मतों से जीत, विरोधियों को झटका

मुंब्रा, जिसे जितेंद्र आव्हाड का गढ़ माना जाता रहा है, वहां सहर शेख ने करीब साढ़े पाँच हजार मतों के बड़े अंतर से जीत दर्ज की। उन्होंने दावा किया कि AIMIM के ‘पतंगा’ चुनाव चिन्ह ने सिर्फ़ मुंब्रा ही नहीं, बल्कि पूरे महाराष्ट्र की राजनीति को झकझोर दिया है।
उनका कहना है कि जिन सीटों पर AIMIM हारी, वहां हार का अंतर महज़ 200–300 वोटों का था।
“अगर मैं बाकी उम्मीदवारों के लिए ज़्यादा प्रचार कर पाती, तो पूरे मुंब्रा में AIMIM के नगरसेवक चुने जाते,” उन्होंने विश्वास के साथ कहा।

संघर्ष, बीमारी और हौसला

चुनाव प्रचार के दौरान सहर शेख के पिता को हल्का हार्ट अटैक भी आया। बावजूद इसके, उन्होंने हिम्मत नहीं हारी।
“उस मुश्किल वक्त में भी अल्लाह ने मुझे बुद्धि और ताक़त दी। अगर मैं स्वतंत्र उम्मीदवार होती, तब भी जीत सकती थी, लेकिन संघर्ष और बढ़ जाता। AIMIM का साथ मेरे लिए ताक़त बना,” उन्होंने कहा।

धर्मनिरपेक्षता पर स्पष्ट रुख

सहर शेख ने AIMIM को लेकर फैलाए जाने वाले भ्रम पर भी खुलकर बात की।
उन्होंने कहा,
“कोई भी पार्टी अपने आप में धर्मनिरपेक्ष या धर्मांध नहीं होती, यह आपके विचारों पर निर्भर करता है। हमारे विचार धर्मनिरपेक्ष हैं। AIMIM सिर्फ़ बोलने में नहीं, सोच में भी धर्मनिरपेक्ष है। हम सबको साथ लेकर चलेंगे।”

‘कैसा हराया’ पर अंतिम जवाब

वायरल वीडियो पर सफाई देते हुए सहर शेख ने कहा,
“वह कहना ज़रूरी था। विरोधियों में अहंकार था, उन्हें लगता था हम हार जाएंगे। उन्होंने मेरी एक सीट छीनी, मैंने उनकी चार सीटें छीनीं। वह शब्द दिल से निकला था।”

अंत में उन्होंने साफ़ किया कि आने वाले समय में उनका फोकस शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे बुनियादी मुद्दों पर रहेगा।
मुंब्रा की इस जीत ने यह संकेत दे दिया है कि सियासत में अब नए चेहरे, नई भाषा और नए तेवर उभर रहे हैं — और सहर शेख उनमें एक अहम नाम बन चुकी हैं।