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पद्म सम्मान 2026: पाँच मुस्लिम हस्तियाँ, अनगिनत सवाल और बेमिसाल योगदान

मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नई दिल्ली

गणतंत्र दिवस 2026 की पूर्व संध्या पर घोषित 131 पद्म पुरस्कारों की सूची में इस वर्ष देश की विविधता और प्रतिभा की झलक तो दिखाई देती है, लेकिन यह सवाल भी उठता है कि क्या सभी वर्गों को उनकी जनसंख्या और योगदान के अनुपात में प्रतिनिधित्व मिला है? इस बार पद्म पुरस्कार पाने वालों में केवल पाँच मुस्लिम हस्तियों को शामिल किया गया है। यह संख्या न केवल जनसंख्या के अनुपात में कम है, बल्कि इसलिए भी चौंकाती है क्योंकि इनमें से 4 सम्मान एक ही क्षेत्र—कला—से जुड़े व्यक्तियों को मिले हैं।

हालाँकि यह असंतुलन चर्चा का विषय हो सकता है, लेकिन इससे इन पाँचों विभूतियों की उपलब्धियों का महत्व कम नहीं होता। ये सभी अपने-अपने क्षेत्रों में दशकों से उत्कृष्ट योगदान देते आ रहे हैं और भारतीय संस्कृति, कला और समाज को समृद्ध करने में उनकी भूमिका असंदिग्ध रही है। आइए, जानते हैं उन पाँच मुस्लिम शख्सियतों के बारे में जिन्हें वर्ष 2026 में पद्म सम्मान से नवाज़ा गया है।


लोक परंपरा के अंतिम स्तंभ: ग़फ़ूरुद्दीन मेवाती

राजस्थान के देवगढ़ ज़िले के मेवात क्षेत्र से आने वाले 62 वर्षीय ग़फ़ूरुद्दीन मेवाती जोगी का नाम इस वर्ष पद्म श्री पुरस्कार के लिए चयनित होना केवल एक व्यक्ति का सम्मान नहीं, बल्कि एक पूरी लोक परंपरा की राष्ट्रीय स्वीकृति है। कमान विधानसभा क्षेत्र के केठवाड़ा गांव के निवासी ग़फ़ूरुद्दीन विश्व प्रसिद्ध भीपांग वादक और मेवाती भाषा में महाभारत गाने वाले अंतिम उस्तादों में से एक हैं।

गांव की चौपालों से शुरू हुआ उनका सफर लंदन, पेरिस, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के प्रतिष्ठित मंचों तक पहुँचा। उन्होंने लगभग विलुप्त हो चुकी लोक विधा ‘भीपांग’ और ‘पांडन का कड़ा’ को जीवन भर साधा और जीवित रखा। उन्हें ‘पांडन का कड़ा’ का एकमात्र जीवित उस्ताद माना जाता है।

ग़फ़ूरुद्दीन ढाई हज़ार से अधिक दोहे कंठस्थ कर चुके हैं। महाभारत, महादेव का ब्यौला, ब्रज लोक गीत, श्रीकृष्ण भजन और फागुन के होली गीत—उनकी गायकी लोक और भक्ति की परंपराओं को एक सूत्र में पिरोती है। ब्रिटेन की महारानी एलिज़ाबेथ के जन्मदिन पर भीपांग की प्रस्तुति देना उनके जीवन का अविस्मरणीय क्षण रहा।

यह कला उन्हें विरासत में मिली। उनके पिता बुधू सिंह जोगी इस परंपरा के महान साधक थे। आज ग़फ़ूरुद्दीन अपने बेटे शाहरुख और पोतों दानिश व वंदल जोगी को यह विद्या सिखा रहे हैं, ताकि यह संस्कृति अगली पीढ़ी तक पहुँच सके। वे मानते हैं कि लोक कला आज भी गांव की मिट्टी में सांस लेती है और इसे संरक्षित करने के लिए सरकारी संस्थागत प्रयास ज़रूरी हैं।


ढोलक को नई पहचान देने वाले: मीर हाजीभाई कासिम

गुजरात के मीर हाजीभाई कासिम भाई को पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित किया जाना संगीत और सामाजिक सेवा—दोनों क्षेत्रों की जीत है। मीर हाजीभाई ने ढोलक जैसे पारंपरिक वाद्य यंत्र को ग़ज़ल, संतवाणी भजन और कव्वाली में प्रयोग कर उसे एक नई पहचान दी, बिना उसकी लोक आत्मा को खोए।

उन्होंने तीन पीढ़ियों के कलाकारों के साथ एक हज़ार से अधिक मंच कार्यक्रम किए और गायों के संरक्षण हेतु तीन हज़ार से अधिक आयोजन किए। उनका जीवन इस बात का उदाहरण है कि कला और सामाजिक सरोकार साथ-साथ कैसे चल सकते हैं। उनके योगदान ने लोक संगीत को आधुनिक मंचों तक पहुँचाया और सांस्कृतिक चेतना को मज़बूती दी।


असम की मिट्टी में कला रचने वाले: नूरुद्दीन अहमद

असम के प्रसिद्ध मूर्तिकार और कला निर्देशक नूरुद्दीन अहमद को भी इस वर्ष पद्म श्री से सम्मानित किया गया है। हाल ही में बोरदवा में उद्घाटित बतद्रवा सांस्कृतिक परियोजना में उनके कार्यों ने व्यापक प्रशंसा प्राप्त की। कठपुतली कला से लेकर रंगमंच और मूर्तिकला तक उनकी यात्रा नवाचार, संघर्ष और सृजन का प्रतीक है।

नूरुद्दीन अहमद का मानना है कि जनता का प्रेम ही कलाकार की असली पूंजी होता है। उन्होंने कहा कि यह सम्मान उन्हें और अधिक समर्पण के साथ काम करने की प्रेरणा देगा। वे असम के उन गिने-चुने कलाकारों में हैं जिन्होंने स्थानीय संस्कृति को राष्ट्रीय पहचान दिलाई।


पाँच दशकों का अभिनय शिखर: ममूटी

भारतीय सिनेमा के महानतम अभिनेताओं में शुमार ममूटी को वर्ष 2026 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया है। 1981 में फिल्म अहिंसा से केरल राज्य पुरस्कार जीतने वाले ममूटी ने पाँच दशकों में 400 से अधिक फिल्मों में अभिनय किया है।

मलयालम, तमिल, तेलुगु, कन्नड़, हिंदी और अंग्रेज़ी—हर भाषा में उनकी अभिनय क्षमता का लोहा माना गया। तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार, ग्यारह केरल राज्य पुरस्कार और अनेक फिल्मफेयर अवॉर्ड उनके नाम हैं। 1998 में उन्हें पद्म श्री और 2022 में केरल प्रभा पुरस्कार मिल चुका है।

ममूटी का कहना है कि मलयालम सिनेमा में काम करना गर्व की बात है क्योंकि यह उद्योग गुणवत्तापूर्ण सिनेमा प्रस्तुत करता है। सीएनएन ने भी उन्हें उन कलाकारों में शामिल किया है जिन्होंने भारतीय सिनेमा का चेहरा बदला।


निष्कर्ष

इन पाँच मुस्लिम शख्सियतों को मिला पद्म सम्मान भले ही संख्या में कम हो, लेकिन इनके योगदान का दायरा बेहद व्यापक है। ये कलाकार, साधक और समाजसेवी भारत की उस सांस्कृतिक आत्मा का प्रतिनिधित्व करते हैं जो विविधता में एकता का संदेश देती है। यह समय है कि देश की प्रतिभाओं को धर्म या संख्या से नहीं, बल्कि उनके समर्पण और योगदान से आंका जाए।