मुसलमानों पर ज़ुल्म पर खामोशी क्यों? इलियासी के बयान ने उठाए दोहरे मापदंडों के सवाल
मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नई दिल्ली
देश में इन दिनों मुसलमानों के भीतर ही ऐसे “ठेकेदार” उभर आए हैं, जिनकी ज़ुबान तब गूंगी हो जाती है जब मुसलमानों पर खुलेआम ज़ुल्म, नफ़रत और हमले होते हैं, लेकिन जैसे ही “सांप्रदायिक सौहार्द” या “धार्मिक भावनाओं” की आड़ में मुस्लिम विरोधी फैसलों को जायज़ ठहराने का मौका मिलता है, वे सबसे आगे खड़े नज़र आते हैं। ऐसे ही चेहरों में एक नाम बार-बार चर्चा में आता है—डॉ. इमाम उमर अहमद इलियासी।
हाल ही में उत्तराखंड के मसूरी में एक सूफी दरगाह पर कट्टरपंथी तत्वों द्वारा किए गए हमले ने देशभर में चिंता पैदा की। दरगाह में तोड़फोड़ हुई, सूफी संत की मजार पर अपमानजनक नारे लगाए गए और धार्मिक भावनाओं को गहरी ठेस पहुंचाई गई। यह हमला केवल एक धार्मिक स्थल पर नहीं, बल्कि भारत की साझा संस्कृति और सूफी परंपरा पर सीधा प्रहार था। लेकिन इस पूरी घटना पर वे तमाम चेहरे, जो खुद को “मुस्लिम प्रतिनिधि” कहने में नहीं थकते, खामोश बने रहे। न कोई बयान, न कोई विरोध, न कोई संवेदना।
इसके ठीक उलट, जब बात हिंदू धार्मिक स्थलों—खासतौर पर चारधाम में शामिल गंगोत्री, बद्रीनाथ और केदारनाथ—में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर प्रतिबंध की आई, तो डॉ. इलियासी तुरंत सामने आ गए। उन्होंने न केवल इस फैसले का बचाव किया, बल्कि इसे “धार्मिक मामला” बताते हुए मुसलमानों को इन स्थलों पर न जाने की नसीहत भी दे डाली।
#WATCH | Delhi: On the Gangotri Dham row, Dr Imam Umer Ahmed Ilyasi, Chief Imam, All India Imam Organisation, says, "This is a matter of religion, and religion has its importance… If the temple committee decides non-Hindus can't enter, no one should object. Each place has… pic.twitter.com/hCy5TNoj8Y
— ANI (@ANI) January 26, 2026
डॉ. इलियासी का कहना था कि हर धर्म के अपने नियम होते हैं और अगर मंदिर समिति तय करती है कि गैर-हिंदुओं को प्रवेश नहीं दिया जाएगा, तो इस पर किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। उन्होंने यहां तक कहा कि मुसलमानों को शायद गंगोत्री नहीं जाना चाहिए, क्योंकि इससे टकराव हो सकता है। उनके मुताबिक, मक्का और मदीना में गैर-मुसलमानों को प्रवेश की अनुमति नहीं है और इस पर कोई सवाल नहीं उठाता, इसलिए भारत में भी ऐसे फैसलों को राजनीति से दूर रखना चाहिए।
बात सुनने में संतुलित लग सकती है, लेकिन सवाल यह है कि यही संतुलन तब क्यों गायब हो जाता है जब मुसलमानों के धार्मिक स्थलों पर हमले होते हैं? क्या मसूरी की दरगाह पर हमला “धर्म का मामला” नहीं था? क्या सूफी संत की मजार पर गाली-गलौज “धार्मिक भावनाओं” का उल्लंघन नहीं था? और अगर था, तो फिर उस पर चुप्पी क्यों?
मुस्लिम समाज के भीतर यह सवाल अब खुलकर उठ रहा है। सोशल मीडिया पर जैसे ही डॉ. इलियासी का बयान सामने आया, उनकी जमकर आलोचना शुरू हो गई। कई लोगों ने उन्हें “सत्ता का प्रिय मौलवी” कहा, तो कुछ ने आरोप लगाया कि वे हमेशा बहुसंख्यक भावनाओं को खुश करने की कोशिश करते हैं, भले ही उसकी कीमत मुस्लिम सम्मान और सुरक्षा को चुकानी पड़े।
आलोचकों का कहना है कि मसला यह नहीं है कि मुसलमानों को किस धार्मिक स्थल पर जाना चाहिए या नहीं। यह एक व्यक्तिगत और आस्थागत फैसला हो सकता है। असली मुद्दा यह है कि जब मुसलमानों के मस्जिदों, दरगाहों और कब्रिस्तानों पर हमले होते हैं, तब ऐसे स्वयंभू नेता क्यों नहीं बोलते? क्यों “हर जगह के अपने नियम” का तर्क तब गायब हो जाता है?
सोशल मीडिया पर कई यूज़र्स ने यह भी याद दिलाया कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है, जहां संविधान सभी नागरिकों को समान अधिकार देता है। अगर किसी धार्मिक स्थल पर प्रवेश को लेकर नियम हैं, तो उस पर बहस हो सकती है, लेकिन उसे एकतरफा समर्थन देना और साथ ही मुस्लिम स्थलों पर हो रहे हमलों पर चुप रहना, दोहरे मापदंड का उदाहरण है।
कुछ लोगों ने यह भी कहा कि मक्का-मदीना की तुलना भारत के धार्मिक स्थलों से करना न केवल गलत है, बल्कि भ्रामक भी है। सऊदी अरब एक इस्लामी देश है, जबकि भारत एक बहुधार्मिक लोकतंत्र है। यहां नियम और अपेक्षाएं अलग हैं। ऐसे में इस तुलना के जरिए मंदिरों में प्रतिबंध को जायज़ ठहराना, दरअसल एक बड़े वैचारिक सवाल को दबाने जैसा है।
इलियासी के बयान के बाद यह साफ हो गया है कि मुस्लिम समाज अब ऐसे “ठेकेदारों” को पहचानने लगा है। जो लोग हर बार मुसलमानों से “संयम” और “परहेज” की अपेक्षा करते हैं, लेकिन मुसलमानों पर हो रहे अत्याचारों पर मौन साध लेते हैं, उनकी विश्वसनीयता तेजी से खत्म हो रही है।
BREAKING:
— Rahul Shivshankar (@RShivshankar) January 26, 2026
After Haridwar, Badrinath-Kedarnath Temple Committee (BKTC) announced that non-Hindus will be barred from entering Badrinath–Kedarnath Dham and other temples under its control. pic.twitter.com/jRYMKMmOYH
आज सवाल सिर्फ़ गंगोत्री या चारधाम का नहीं है। सवाल यह है कि क्या मुसलमानों के धार्मिक सम्मान की भी उतनी ही कीमत है, जितनी दूसरों की? क्या सांप्रदायिक सौहार्द का मतलब हमेशा मुसलमानों की चुप्पी और समझौता ही होगा? और क्या मुस्लिम समाज की आवाज़ बनने का दावा करने वालों से यह अपेक्षा नहीं की जानी चाहिए कि वे हर ज़ुल्म के खिलाफ समान रूप से बोलें?
इलियासी के बयान ने एक बार फिर यह बहस तेज कर दी है कि मुस्लिम नेतृत्व किस दिशा में जा रहा है। एक ऐसा नेतृत्व, जो सत्ता के करीब रहने में यकीन रखता है, या एक ऐसा नेतृत्व, जो ज़मीन पर मुसलमानों की पीड़ा और अपमान के खिलाफ़ मजबूती से खड़ा हो। फिलहाल, सोशल मीडिया की प्रतिक्रिया यह साफ़ संकेत दे रही है कि मुसलमान अब दोहरे रवैये को स्वीकार करने के मूड में नहीं हैं।

