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कोटद्वार केस में पुलिस की कार्रवाई पर सवाल, अजित अंजुम का इंटरव्यू वायरल

उत्तराखंड में कोटद्वार की एक घटना ने न सिर्फ़ स्थानीय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि यह बहस भी तेज़ कर दी है कि क्या राज्य में क़ानून का तराज़ू सभी के लिए समान है। इस बहस को और धार तब मिली, जब देश के चर्चित पत्रकार और यूट्यूबर अजित अंजुम ने एक पुलिस अधिकारी से इंटरव्यू के दौरान सीधे-सीधे वे सवाल पूछे, जिनसे उत्तराखंड पुलिस असहज दिखी।

मामला एक बुज़ुर्ग मुस्लिम दुकानदार से जुड़ा है, जिनकी कपड़ों की दुकान के साइनबोर्ड पर ‘बाबा’ लिखा है। दुकानदार का कहना है कि उनका पोता उन्हें प्यार से ‘बाबा’ कहता है, इसलिए उन्होंने यही नाम अपनी दुकान का रखा। लेकिन इस नाम पर हिंदूवादी संगठन बजरंग दल को आपत्ति हो गई। संगठन के कार्यकर्ता दुकान पर पहुंचे और कथित तौर पर नाम बदलवाने का दबाव बनाने लगे। जब माहौल तनावपूर्ण हुआ, तो पास ही मौजूद एक जिम ट्रेनर दीपक कुमार—जो बाद में ‘मोहम्मद दीपक’ कहकर अपनी पहचान बताते हैं—बीच-बचाव के लिए सामने आए। दीपक ने बुज़ुर्ग दुकानदार का पक्ष लिया और दबाव बना रहे लोगों को पीछे हटने को कहा।

इस पूरी घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। देशभर में आम लोगों ने दीपक की पहल की सराहना की और उसे इंसानियत की मिसाल बताया। लेकिन यही बात कुछ लोगों को नागवार गुज़री। पहले ‘डेमोग्राफिक चेंज’ जैसे नैरेटिव के ज़रिये मामले को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश हुई, और जब वह नहीं चला, तो हालात और बिगड़ गए। आरोप है कि तीन दिन पहले करीब सौ से डेढ़ सौ बजरंग दल कार्यकर्ता दीपक के घर पहुंच गए और उस पर हमला करने की कोशिश की।

घटना के दौरान बड़ी भीड़ जमा हो गई। पुलिस भी मौके पर पहुंची और हालात काबू में करने की कोशिश की। वायरल वीडियो में साफ़ दिखता है कि एक कार्यकर्ता दीवार फांदकर पुलिस की मौजूदगी में दीपक तक पहुंचने की कोशिश करता है, हालांकि बाद में उसे पकड़ लिया जाता है। इसके बावजूद पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठने लगे, जब कोटद्वार पुलिस ने इस मामले में दो मुकदमे दर्ज किए—एक, बजरंग दल के एक कार्यकर्ता की शिकायत पर दीपक के खिलाफ गाली-गलौज का आरोप लगाते हुए; और दूसरा, कथित हमलावरों के खिलाफ शांति भंग का मामला, लेकिन उन्हें ‘अज्ञात व्यक्ति’ बताकर।

यहीं से विवाद ने तूल पकड़ लिया। देशभर में यह सवाल गूंजने लगा कि जब वायरल वीडियो में कथित हमलावरों के चेहरे साफ़ दिखाई दे रहे हैं, तो फिर नामजद एफआईआर क्यों नहीं? इसी मुद्दे पर अजित अंजुम ने उत्तराखंड पुलिस अधिकारी से इंटरव्यू में तीखे सवाल किए। उन्होंने वीडियो दिखाते हुए पूछा कि पहचान स्पष्ट होने के बावजूद अज्ञात लोगों के खिलाफ मामला दर्ज करने के पीछे क्या वजह है? क्या किसी तरह का दबाव था?

इस सवाल पर पुलिस अधिकारी असहज दिखे और जवाब दिया—“आप तो इसे पर्सनल ले रहे हैं।” अजित अंजुम ने तुरंत पलटकर कहा कि वह इसे निजी तौर पर नहीं ले रहे, बल्कि एक पत्रकार के रूप में सवाल पूछ रहे हैं। इसके बाद अधिकारी का जवाब और भी चौंकाने वाला था—“आपके वीडियो लाखों लोग देखते हैं।” इस एक पंक्ति ने कई आशंकाओं को जन्म दे दिया। क्या सच बोलने से प्रशासन के ‘एक्सपोज़’ होने का डर है? क्या नामजद कार्रवाई करने से बड़ा विवाद खड़ा हो सकता है?

इस इंटरव्यू के बाद सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई। कई लोगों ने इसे उत्तराखंड प्रशासन की कार्यशैली पर सीधा सवाल बताया। मशहूर फैक्ट-चेकर मुहम्मद जुबैर ने भी एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर अजित अंजुम के इंटरव्यू की तारीफ करते हुए लिखा कि जब वीडियो में साफ़ तौर पर कुछ लोगों को पहचाना जा सकता है, तो अज्ञात एफआईआर दर्ज करने का कोई औचित्य नहीं। उन्होंने कथित तौर पर पहचाने गए कुछ नाम भी सार्वजनिक किए, जिससे मामला और संवेदनशील हो गया।

यह पूरा घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है, जब उत्तराखंड में मुसलमानों के साथ भेदभाव और चुनिंदा कार्रवाई के आरोप पहले से लगते रहे हैं। हाल के वर्षों में यूसीसी, अवैध निर्माण के नाम पर मस्जिदों और मकबरों पर कार्रवाई, ‘जिहाद’ के अलग-अलग नैरेटिव, कारोबार पर हमले और कथित पलायन जैसे मुद्दे चर्चा में रहे हैं। हाल ही में राज्य के मुसलमानों ने एक पत्रकार सम्मेलन कर अपने साथ हो रही ज्यादतियों का ज़िक्र भी किया था।

ऐसे माहौल में अजित अंजुम का यह इंटरव्यू महज़ एक बातचीत नहीं, बल्कि प्रशासन के लिए आईना बन गया है। उनके सवालों ने यह बहस छेड़ दी है कि क्या उत्तराखंड में कानून सबके लिए बराबर है, या फिर कुछ मामलों में ‘अज्ञात’ का सहारा लेकर सच्चाई को ढका जा रहा है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या इस इंटरव्यू के बाद पुलिस अपनी कार्रवाई पर पुनर्विचार करेगी, या फिर सवाल पूछने वालों पर ही कार्रवाई की जाएगी।