संदर्भ नसीरूद्दीन शाह और एआर रहमान : जब सवाल धर्म बन जाए और जवाब गाली,यही है आज का सार्वजनिक विमर्श
मुस्लिम नाउ विशेष
आग के बगैर धुआँ नहीं उठता—यह कहावत यूँ ही नहीं बनी। जब-जब किसी समाज में असहज सच बोलने की कोशिश होती है, धुआँ उठता है—और उसी धुएँ में कुछ लोग आँखें बंद कर आग को नकारने लगते हैं। भारत के संगीत जगत के वैश्विक नायक ए. आर. रहमान ने हाल ही में बॉलीवुड में आए बदलावों और मुस्लिम कलाकारों को पहले की तुलना में कम अवसर मिलने की बात कही, तो प्रतिक्रिया का पैमाना तर्क नहीं, बल्कि नफरत बन गया। आलोचना का स्वर असहमति नहीं रहा; वह बद्तमीजी, अपमान और पहचान-आधारित हमलों में बदल गया।
रहमान कोई साधारण नाम नहीं—वे भारत की सांस्कृतिक पहचान के ऐसे स्तंभ हैं, जिनके सुरों ने सीमाएँ लाँघीं, पुरस्कार बटोरे, और ‘मेड इन इंडिया’ की ध्वनि को दुनिया के कोने-कोने तक पहुँचाया। उन्होंने न जाने कितनी बार मंचों पर, संकटों में और राष्ट्रीय अवसरों पर संगीत के माध्यम से देश का नाम रोशन किया। फिर भी, जब उन्होंने एक अनुभव साझा किया—ध्यान रहे, आरोप नहीं—तो उन्हें ‘एजेंडा’ का ठप्पा लगाने में देर नहीं लगी। सवाल उठता है: क्या हमारे सार्वजनिक विमर्श में अनुभव साझा करना भी अपराध हो गया है?
Have been receiving calls about my uncle's column in today's #IndianExpress.
— Saira Shah Halim সায়রা سائرہ (@sairashahhalim) February 5, 2026
Deeply unsettling to read his column.
It’s a sad state of affairs when a literary fest or a college symposium becomes a test of "nationalism" rather than a celebration of ideas. My uncle,… pic.twitter.com/Z8L8Vv72IA
इसी कड़ी में जब सिनेमा के दिग्गज नसीरुद्दीन शाह ने मंच से कुछ असहज तथ्यों की ओर इशारा किया, तो वही भीड़ फिर सक्रिय हो गई। नसीरुद्दीन शाह—जिन्हें भारतीय सिनेमा में मेथड एक्टिंग का भीष्म पितामह कहा जाता है—पर ‘चुका हुआ हीरो’ से लेकर न जाने क्या-क्या कहा गया। यह विडंबना नहीं तो और क्या है कि जिनके कंधों पर भारतीय अभिनय की आधुनिक परंपरा खड़ी है, उन्हीं के अनुभवों को ‘अप्रासंगिक’ बताने की होड़ मच जाए?
Naseeruddin Shah claims to miss the India of old. In reality, he misses it because in that India the Hindus suffered discrimination but did not speak up.
— Anand Ranganathan (@ARanganathan72) July 8, 2025
Here I expose him for what he is, a real life Gulfam Hassan – a traitor to the cause of justice, equality, and fraternity. pic.twitter.com/2FxWXKJFLy
कार्यक्रम में ऐन मौके पर आमंत्रण रद्द होना, हॉल के स्वरूप में एक वर्ग को लेकर आए बदलाव—ये बातें व्यक्तिगत कटुता नहीं, बल्कि संस्थागत व्यवहार के संकेत हैं। नसीरुद्दीन शाह ने इन्हीं संकेतों को सार्वजनिक किया और साथ ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीतियों पर आलोचनात्मक टिप्पणी भी की। आलोचना—जो किसी भी लोकतंत्र की प्राणवायु है—को तुरंत देशद्रोह या धर्मविरोध के फ्रेम में कैद कर देना, बहस का नहीं, भय का लक्षण है।
Row over Naseeruddin Shah's op-ed
— TIMES NOW (@TimesNow) February 5, 2026
Outdated actor Naseeruddin Shah makes provocative statements for attention and should spend time in Pakistan before commenting on India…: @drdineshbjp speaks to @MohitBhatt90 pic.twitter.com/YhMYkzplEX
सबसे चिंताजनक यह नहीं कि आलोचना हुई; चिंताजनक यह है कि आलोचना का स्वर कैसा था। संवाद की जगह अपमान, तर्क की जगह ट्रोलिंग, और असहमति की जगह पहचान पर प्रहार—यह वही प्रवृत्ति है जो जरूरी मुद्दों पर चर्चा से बचती है और हर प्रश्न को किसी एक धर्म की प्रतिष्ठा के उत्थान या पतन से जोड़ देती है। जब सवाल रोजगार के अवसरों, प्रतिनिधित्व, और संस्थागत निष्पक्षता के हों, तब उन्हें ‘हम बनाम वे’ में बदल देना समस्या का समाधान नहीं, समस्या का विस्तार है।
So Naseeruddin Shah is ‘disinvited’ by Mumbai university. Scholar-activist Anand Teltumbde’s talk is cancelled at the Kalaghoda festival under Mumbai police orders. Will the ‘mob’ and their state patrons now decide who can speak and who cannot in public fora? Is this not…
— Rajdeep Sardesai (@sardesairajdeep) February 5, 2026
हम सब जानते हैं—और भीतर से महसूस करते हैं—कि देश में कुछ ऐसा चल रहा है जिस पर खुलकर, ईमानदारी से बात नहीं हो रही। कला, संस्कृति और सिनेमा समाज का आईना होते हैं। अगर उस आईने में दरारें दिख रही हैं, तो आईना तोड़ देने से चेहरा साफ़ नहीं हो जाता। उलटे, बिखरे काँच में सच्चाई और अधिक चुभती है। आज जरूरत इस बात की है कि हम कलाकारों की बात को उनकी पहचान से नहीं, उनके अनुभव और तर्क से परखें।
यह भी याद रखना चाहिए कि भारत की सांस्कृतिक परंपरा बहुलता से बनी है। संगीत में सूफ़ी रंग, शास्त्रीय रागों की गहराई, लोकधुनों की मिट्टी—सब मिलकर वह रचना करते हैं जिसे दुनिया ‘इंडियन’ कहती है। सिनेमा में भी यही विविधता उसकी ताकत रही है। यदि किसी समुदाय के कलाकारों को अवसरों में संकुचन का अनुभव हो रहा है, तो यह केवल उस समुदाय का नहीं, पूरी रचनात्मक अर्थव्यवस्था का नुकसान है।
जो लोग मुसलमानों के अस्तित्व को मिटाने का संकल्प लिए बैठे हैं—या कम से कम अपने शब्दों और आचरण से यही संकेत देते हैं—वे सबसे अधिक शोर मचाते हैं। वे जानते हैं कि संवाद होगा तो जवाब देना पड़ेगा; सवाल उठेंगे तो जवाबदेही तय होगी। इसलिए वे बहस को धर्मयुद्ध बना देते हैं। यह रणनीति नई नहीं, लेकिन इसका असर घातक है—क्योंकि यह समाज को स्थायी ध्रुवीकरण की ओर धकेलती है।
लोकतंत्र में असहमति राष्ट्रविरोध नहीं होती। कलाकारों की आलोचना, पत्रकारों की पड़ताल, नागरिकों के प्रश्न—ये सब मिलकर लोकतंत्र को जीवित रखते हैं। जब हम हर आलोचना को ‘एंटी-नेशनल’ कहकर खारिज कर देते हैं, तब हम अपनी ही आवाज़ों को खामोश करने का अभ्यास सीखते हैं। और एक बार खामोशी आदत बन जाए, तो अंधेरा गहराता जाता है।
BIG NEWS 🚨 Bollywood actor Naseeruddin Shah triggers Fresh Controversy.
— News Algebra (@NewsAlgebraIND) February 5, 2026
"I was disinvited at the last minute from Mumbai University's Jashn-e-Urdu event and later falsely accused of refusing to attend"
"I have been critical of the way PM Modi conducts himself"
"His narcissism… pic.twitter.com/6fRdVps8X3
भारत को ‘सोने की चिड़िया’ बनाने के सपने तब साकार होते हैं, जब हम समस्याओं को पहचानते हैं, उन पर बहस करते हैं, और समाधान खोजते हैं। यदि हम असहज सवालों से भागते रहे, तो वही सपने हमें अंधेरे कुएँ में भटकाते रहेंगे। ए. आर. रहमान और नसीरुद्दीन शाह की बातों से सहमत होना जरूरी नहीं—लेकिन उन्हें सुनना, समझना और सम्मानपूर्वक असहमति दर्ज करना लोकतांत्रिक जिम्मेदारी है।
आज का प्रश्न किसी एक कलाकार या समुदाय का नहीं, हमारे सार्वजनिक विवेक का है। क्या हम इतने आत्मविश्वासी हैं कि आलोचना सुन सकें? क्या हम इतने परिपक्व हैं कि अनुभवों को साजिश नहीं, संकेत समझें? और क्या हम इतने साहसी हैं कि नफरत के शोर में भी संवाद की धीमी, लेकिन स्थायी आवाज़ चुनें?
अगर हाँ, तो धुआँ उठने पर हम आग बुझाने का रास्ता खोजेंगे। अगर नहीं, तो धुआँ हमारी आँखों को जलाता रहेगा—और हम कहते रहेंगे कि आग कहीं नहीं।

