जामिया में गूंजा भारत-ईरान सभ्यतागत संवाद: 3000 साल पुराने रिश्तों पर मंथन
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मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नई दिल्ली
भारत और ईरान के बीच ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक संबंधों को नए सिरे से समझने और समकालीन वैश्विक परिप्रेक्ष्य में उनके महत्व को रेखांकित करने के उद्देश्य से India Arab Cultural Centre, Jamia Millia Islamia में 13 फरवरी 2026 को एक विशेष विस्तार व्याख्यान (Extension Lecture) का आयोजन किया गया। व्याख्यान का विषय था— “India and Iran: Ancient Civilizational Links and Contemporary Perspectives”।
इस अवसर पर नई दिल्ली स्थित ईरान दूतावास के सांस्कृतिक परामर्शदाता Dr. Faridoddin Faridasr मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता सामाजिक विज्ञान संकाय के डीन Prof. Zubair Meenai ने की।

उद्घाटन सत्र: ऐतिहासिक जड़ों पर जोर
कार्यक्रम का उद्घाटन केंद्र के निदेशक Dr. Aftab Ahmad ने किया। उन्होंने विश्वविद्यालय के कुलपति Prof. Mazhar Asif और कुलसचिव Prof. Md Mahtab Alam Rizvi का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि ऐसे अकादमिक आयोजन छात्रों और शिक्षकों के बीच गहन विमर्श की संस्कृति को मजबूत करते हैं।
डॉ. आफताब अहमद ने अपने संबोधन में कहा कि भारत और ईरान के सभ्यतागत संबंध विश्व की सबसे प्राचीन और गहरी सांस्कृतिक कड़ियों में से हैं। उन्होंने बताया कि दोनों देशों की साझा ‘इंडो-ईरानी’ उत्पत्ति लगभग 3000 वर्ष पुरानी है, जो न केवल भाषाई बल्कि आध्यात्मिक और सांस्कृतिक आधारों पर भी स्थापित है।
डॉ. फरीदासर का व्याख्यान: इतिहास से आधुनिक कूटनीति तक
अपने व्याख्यान में डॉ. फरीदुद्दीन फरीदासर ने भारत और प्राचीन फारस (ईरान) को विश्व की सबसे प्राचीन सतत सभ्यताओं में शुमार करते हुए कहा कि दोनों के बीच सांस्कृतिक और भाषाई संबंध प्रागैतिहासिक काल से जुड़े हुए हैं।
उन्होंने बताया कि तीसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व में भी सिंधु घाटी सभ्यता और मेसोपोटामिया तथा दक्षिणी ईरान के क्षेत्रों के बीच व्यापारिक और सांस्कृतिक संपर्क के प्रमाण मिलते हैं। सिंधु घाटी की मुहरें और कलाकृतियां ईरान और मेसोपोटामिया में पाई गई हैं, जो प्राचीन कालीन आदान-प्रदान का साक्ष्य हैं।
भाषाई दृष्टि से उन्होंने कहा कि संस्कृत और प्राचीन फारसी दोनों ही इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार की शाखाएं हैं। ऋग्वेद और अवेस्ता जैसे प्राचीन ग्रंथों में शब्दावली, मिथकीय प्रतीकों और धार्मिक अनुष्ठानों में कई समानताएं देखने को मिलती हैं।

मध्यकालीन दौर: फारसी भाषा और इंडो-फारसी परंपरा
डॉ. फरीदासर ने इस्लाम के प्रसार के बाद भारत और ईरान के बीच सांस्कृतिक संबंधों के और गहरे होने की चर्चा की। उन्होंने बताया कि मध्यकालीन भारत में फारसी प्रशासन और साहित्य की प्रमुख भाषा बन गई थी। ‘सब्क-ए-हिंदी’ जैसी साहित्यिक शैलियों ने दक्षिण एशियाई कला और साहित्य को गहराई से प्रभावित किया।
इंडो-फारसी साहित्यिक परंपरा ने न केवल दरबारी संस्कृति बल्कि सूफी विचारधारा, कविता और स्थापत्य कला को भी समृद्ध किया। यह सांस्कृतिक संगम आज भी भारतीय उपमहाद्वीप की बहुलतावादी विरासत का अहम हिस्सा है।
समकालीन परिप्रेक्ष्य: कूटनीति और सहयोग
समकालीन संदर्भ में डॉ. फरीदासर ने बताया कि भारत और ईरान ने 1950 में औपचारिक राजनयिक संबंध स्थापित किए। शीत युद्ध और उसके बाद के दौर में भी भारत ने ईरान के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने की नीति अपनाई, भले ही वैश्विक दबाव और प्रतिबंधों ने आर्थिक संबंधों को प्रभावित किया हो।
उन्होंने सांस्कृतिक कूटनीति, ऊर्जा सहयोग, क्षेत्रीय संपर्क और शैक्षणिक आदान-प्रदान को दोनों देशों के रिश्तों की वर्तमान धुरी बताया।
अध्यक्षीय टिप्पणी: बहुस्तरीय संबंधों की निरंतरता
अध्यक्षीय संबोधन में प्रो. जुबैर मीनई ने कहा कि भारत-ईरान संबंध केवल आधुनिक भू-राजनीति तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे गहरी ऐतिहासिक और सभ्यतागत जड़ों में निहित हैं। उन्होंने कहा कि साझा भाषाई विरासत, आध्यात्मिक परंपराएं और सांस्कृतिक आदान-प्रदान दोनों देशों को एक विशिष्ट ऐतिहासिक साझेदारी में बांधते हैं।
उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में आर्थिक सहयोग, क्षेत्रीय कनेक्टिविटी और सांस्कृतिक सहभागिता दोनों देशों के साझा हितों को आगे बढ़ा रही है।

समापन: अकादमिक संवाद की नई दिशा
कार्यक्रम का समापन औपचारिक धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ, जिसे Dr. Zulfikar Ali Ansari ने प्रस्तुत किया। उन्होंने मुख्य वक्ता, अध्यक्ष और उपस्थित प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया।
यह व्याख्यान न केवल भारत-ईरान संबंधों की ऐतिहासिक गहराई को उजागर करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि अकादमिक मंचों के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय समझ और संवाद को कैसे सशक्त किया जा सकता है। जामिया में आयोजित यह कार्यक्रम समकालीन कूटनीतिक विमर्श और प्राचीन सभ्यतागत विरासत के बीच एक सेतु के रूप में उभरा।

