UP : लाउडस्पीकर पर सेहरी-इफ्तार घोषणा पर रोक, इमाम बोले-मंदिर और रैलियों पर भी लगे प्रतिबंध
Table of Contents
मुस्लिम नाउ ब्यूरो, कोलकाता
रमज़ान के पवित्र महीने में लाउडस्पीकर के उपयोग को लेकर उत्तर प्रदेश विधानसभा में उठे एक सवाल ने अब राष्ट्रीय स्तर पर बहस को जन्म दे दिया है। बजट सत्र के दौरान समाजवादी पार्टी के विधायक कमल अख्तर द्वारा रमज़ान में सेहरी और इफ्तार के समय मस्जिदों से संक्षिप्त घोषणा की अनुमति देने की मांग के बाद सदन में तीखी चर्चा हुई। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का हवाला देते हुए इस मांग को खारिज कर दिया। अब इस पूरे विवाद पर कोलकाता की ऐतिहासिक नखोदा मस्जिद के इमाम मौलाना मोहम्मद शफीक काज़मी का बयान सामने आया है, जिसने बहस को नया आयाम दे दिया है।
सदन में क्या उठा मुद्दा?
वायरल वीडियो में देखा गया कि कमल अख्तर ने शून्यकाल में यह मामला उठाते हुए कहा कि रमज़ान के दौरान गांवों और शहरी इलाकों में बड़ी संख्या में रोज़ेदार सेहरी खत्म होने और इफ्तार के समय की जानकारी मस्जिदों से लाउडस्पीकर के जरिए प्राप्त करते रहे हैं। उन्होंने तर्क दिया कि यह घोषणा महज़ कुछ सेकंड की होती है और इसका उद्देश्य केवल सही समय की सूचना देना है, जिससे रोज़ा रखने वालों को सुविधा मिलती है।
अख्तर ने यह भी कहा कि राज्य में होली, दिवाली, दशहरा, कांवड़ यात्रा, ईसाई और सिख पर्वों के दौरान भी व्यवस्थाएं की जाती हैं, इसलिए रमज़ान के दौरान भी समान संवेदनशीलता दिखाई जानी चाहिए। उन्होंने सीमित और नियंत्रित उपयोग की अनुमति देने की अपील दोहराई।
सरकार का जवाब: सुप्रीम कोर्ट का हवाला
इस पर प्रतिक्रिया देते हुए वित्त एवं संसदीय कार्य मंत्री सुरेश कुमार खन्ना ने साफ कहा कि लाउडस्पीकर पर रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक प्रतिबंध सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के तहत है। उन्होंने कहा कि यह कोई राज्य सरकार का मनमाना निर्णय नहीं, बल्कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों का पालन है।
खन्ना ने कहा, “लाउडस्पीकर पर प्रतिबंध सरकार द्वारा नहीं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा लगाया गया है और यह पूरे राज्य में समान रूप से लागू है।” उन्होंने यह भी जोड़ा कि शादियों या अन्य आयोजनों में यदि निर्धारित समय से अधिक ध्वनि का उपयोग होता है तो पुलिस कार्रवाई करती है।
मंत्री ने यह भी तर्क दिया कि पहले समय बताने के लिए मस्जिदों से घोषणाएं की जाती थीं क्योंकि घड़ियां आम नहीं थीं, लेकिन आज लगभग हर व्यक्ति के पास मोबाइल फोन है, जिससे समय की जानकारी आसानी से मिल जाती है।
#WATCH | Kolkata, West Bengal: On Yogi govt's ban on loudspeaker usage during Ramzan, Imam Nakhoda Masjid, Maulana Mohd. Shafique Qazmi says, "… We support the government’s decision. Loudspeakers should be banned in mosques, temples, and during political party rallies. They… pic.twitter.com/6RwlHhqg10
— ANI (@ANI) February 20, 2026
इमाम नखोदा मस्जिद का बेबाक बयान
इसी मुद्दे पर कोलकाता की नखोदा मस्जिद के इमाम मौलाना मोहम्मद शफीक काज़मी ने न्यूज एजेंसी से बातचीत में तंजिया लहजे में प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा, “हम सरकार के फैसले का स्वागत करते हैं। यदि नियम हैं तो मस्जिदों, मंदिरों और राजनीतिक पार्टियों की रैलियों—सभी जगह लाउडस्पीकर बैन होने चाहिए। केवल मस्जिदों में ही नहीं, बल्कि हर जगह एक समान नियम लागू हों।”
उनका यह बयान सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। मौलाना काज़मी अक्सर सामयिक मुद्दों पर खुलकर अपनी राय रखने के लिए जाने जाते हैं। उनका कहना है कि यदि ध्वनि प्रदूषण के नियम लागू हैं, तो उनका पालन सभी धार्मिक स्थलों और राजनीतिक मंचों पर समान रूप से होना चाहिए।
कानूनी पृष्ठभूमि और बहस का केंद्र
सुप्रीम कोर्ट के ध्वनि प्रदूषण संबंधी आदेशों के अनुसार, रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक लाउडस्पीकर और सार्वजनिक संबोधन प्रणाली के उपयोग पर प्रतिबंध है, सिवाय बंद परिसरों में आंतरिक संचार के। हालांकि, कमल अख्तर का तर्क था कि अदालत का आदेश मुख्य रूप से ध्वनि स्तर से संबंधित है, न कि पूर्ण प्रतिबंध से।
यही बिंदु अब बहस का केंद्र बन गया है—क्या सीमित समय और नियंत्रित ध्वनि स्तर के साथ छूट दी जा सकती है, या नियमों का सख्ती से समान अनुपालन होना चाहिए?
सामाजिक और राजनीतिक असर
इस मुद्दे ने राजनीतिक हलकों के साथ-साथ सामाजिक विमर्श को भी तेज कर दिया है। एक पक्ष इसे धार्मिक सुविधा से जुड़ा प्रश्न बता रहा है, जबकि दूसरा पक्ष कानून के समान अनुपालन की बात कर रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि तकनीकी युग में मोबाइल एप और डिजिटल अलर्ट उपलब्ध होने के बावजूद, सामूहिक घोषणा का सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व अभी भी कई इलाकों में बना हुआ है। वहीं, ध्वनि प्रदूषण और सार्वजनिक शांति भी संवेदनशील विषय हैं।
निष्कर्ष: समानता बनाम परंपरा
रमज़ान के दौरान लाउडस्पीकर के उपयोग पर उठा यह विवाद केवल एक धार्मिक मुद्दा नहीं, बल्कि कानून, समानता और परंपरा के संतुलन का सवाल बन गया है। नखोदा मस्जिद के इमाम का बयान इस बहस को व्यापक दृष्टिकोण देता है—यदि नियम हैं तो वे सभी पर समान रूप से लागू हों।
अब निगाहें इस पर टिकी हैं कि क्या भविष्य में राज्य सरकार कोई संतुलित समाधान निकालेगी या सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के सख्त अनुपालन की नीति जारी रहेगी। फिलहाल, रमज़ान के इस पवित्र महीने में उठा यह सवाल देशभर में कानून और धार्मिक परंपराओं के बीच संतुलन पर गहन चर्चा को जन्म दे चुका है।

