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ईरान-इजरायल युद्ध तेज, तेहरान बोला लंबी लड़ाई को पूरी तरह तैयार

मध्य पूर्व एक बार फिर बड़े युद्ध की आहट से कांप रहा है. ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच टकराव लगातार तेज होता जा रहा है. ताजा घटनाओं से संकेत मिल रहे हैं कि यह संघर्ष जल्दी खत्म होने वाला नहीं है. मिसाइल हमले, हवाई हमले और जवाबी कार्रवाई लगातार जारी है. कई शहरों में सायरन बज रहे हैं. लोग बंकरों में छिप रहे हैं. और पूरी दुनिया की निगाहें इस क्षेत्र पर टिकी हुई हैं.

अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक अमेरिका और इजरायल ने ईरान के कई इलाकों पर हमले तेज कर दिए हैं. खास तौर पर ईरान के इस्फहान प्रांत में कई सैन्य और रणनीतिक ठिकानों को निशाना बनाया गया है. इन हमलों में कई लोगों के मारे जाने की खबर है. हालांकि सही आंकड़ा अभी सामने नहीं आया है.

ईरान की ओर से भी जवाबी कार्रवाई जारी है. ईरानी सेना और रिवोल्यूशनरी गार्ड ने इजरायल की ओर कई बैलिस्टिक मिसाइलें दागी हैं. ईरान ने यह भी दावा किया है कि उसने इराक और कुवैत में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया है. इन हमलों के बाद पूरे क्षेत्र में तनाव और बढ़ गया है.

कुवैत सरकार ने पुष्टि की है कि वहां के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे की रडार प्रणाली को नुकसान पहुंचा है. हालांकि हवाई यातायात को लेकर अभी स्थिति स्पष्ट नहीं है. कुवैत ने लोगों से सतर्क रहने की अपील की है.

इस बीच ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने साफ कहा है कि तेहरान ने कभी युद्धविराम की मांग नहीं की. उनका कहना है कि ईरान लंबे युद्ध के लिए तैयार है. उन्होंने कहा कि यदि देश की संप्रभुता और संसाधनों पर हमला हुआ तो उसका जवाब दिया जाएगा.

अराघची ने अमेरिका पर गंभीर आरोप भी लगाए. उन्होंने कहा कि यह युद्ध अवैध है और इसका कोई विजेता नहीं होगा. उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति पर भी निशाना साधा. उनका कहना है कि निर्दोष लोग सिर्फ इसलिए मारे जा रहे हैं क्योंकि वॉशिंगटन इस युद्ध को आगे बढ़ाना चाहता है.

उधर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक अलग दावा किया है. उनका कहना है कि ईरान की ओर से समझौते के लिए संपर्क किया गया है. लेकिन अभी तक जो शर्तें सामने आई हैं वे अमेरिका के लिए स्वीकार्य नहीं हैं.

ट्रंप ने यह भी कहा कि अमेरिका अपने हितों और सहयोगियों की सुरक्षा के लिए हर जरूरी कदम उठाएगा.

इस युद्ध का असर केवल ईरान और इजरायल तक सीमित नहीं है. इसका प्रभाव पूरे क्षेत्र पर पड़ रहा है. लेबनान में भी हालात बेहद गंभीर हो चुके हैं.

इजरायल के हमलों में अब तक लेबनान में 850 से अधिक लोगों की मौत की खबर है. वहीं करीब आठ लाख से ज्यादा लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर हो गए हैं. बड़ी संख्या में लोग सुरक्षित इलाकों की ओर पलायन कर रहे हैं.

दक्षिणी लेबनान के कई शहरों में इमारतें मलबे में बदल चुकी हैं. राहत और बचाव दल लगातार काम कर रहे हैं. लेकिन हालात बेहद कठिन हैं. कई जगहों पर अस्पताल भी दबाव में हैं.

मध्य पूर्व में इस युद्ध का सबसे बड़ा असर ऊर्जा बाजार पर भी पड़ सकता है. खास तौर पर होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर चिंता बढ़ रही है.

यह जलमार्ग दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्गों में से एक है. दुनिया के बड़े हिस्से का तेल यहीं से होकर गुजरता है. यदि यहां तनाव बढ़ता है तो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हो सकती है.

ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड के नौसेना कमांडर अलीरेजा तंगसीरी ने चेतावनी दी है कि यदि अमेरिका ने ईरान के खार्ग द्वीप पर हमला किया तो इसका असर पूरी दुनिया की ऊर्जा कीमतों पर पड़ेगा.

खार्ग द्वीप ईरान के तेल निर्यात का मुख्य केंद्र है. यहां से बड़ी मात्रा में तेल दुनिया के बाजारों तक पहुंचता है.

तंगसीरी का कहना है कि यदि इस इलाके को निशाना बनाया गया तो तेल बाजार में नया समीकरण बनेगा. और दुनिया को इसका भारी आर्थिक असर झेलना पड़ेगा.

अमेरिका ने हाल ही में खार्ग द्वीप पर हमले की धमकी दी थी. हालांकि अभी तक इस बारे में कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है.

ईरान ने साफ कर दिया है कि उसके ऊर्जा ढांचे पर किसी भी हमले का जवाब दिया जाएगा.

दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक इस युद्ध को लेकर अलग-अलग राय दे रहे हैं. कई विशेषज्ञों का मानना है कि दुनिया का कोई भी बड़ा देश इस युद्ध में सीधे कूदना नहीं चाहता.

अमेरिका की नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल में काम कर चुके और काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस के वरिष्ठ विशेषज्ञ चार्ल्स कपचैन ने कहा है कि ज्यादातर देश इस संघर्ष से दूरी बनाकर रखना चाहते हैं.

उनका कहना है कि यूरोप के कई देशों में यह युद्ध लोकप्रिय नहीं है. लोग एक और लंबे युद्ध में फंसने से डरते हैं.

कपचैन के अनुसार यदि होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की सुरक्षा के लिए कोई अंतरराष्ट्रीय गठबंधन बनता है तो भी उसमें शामिल होने को लेकर कई देश हिचकेंगे.

उन्होंने कहा कि यह जलमार्ग बहुत संकरा और संवेदनशील है. ईरान के पास ऐसे कई साधन हैं जिनसे वह यहां से गुजरने वाले जहाजों को निशाना बना सकता है.

विशेषज्ञों के मुताबिक ईरान अपने तटीय इलाकों से मिसाइल दाग सकता है. वह समुद्री ड्रोन और पनडुब्बियों का इस्तेमाल भी कर सकता है.

यही वजह है कि कई देश सीधे सैन्य भूमिका से बचना चाहते हैं.

विश्लेषकों का यह भी मानना है कि ईरान की मौजूदा सत्ता व्यवस्था बहुत मजबूत है. इसलिए बाहरी ताकतों के लिए उसे जल्दी कमजोर करना आसान नहीं होगा.

कई देशों को डर है कि यदि यह युद्ध लंबा खिंचा तो उसके परिणाम बेहद गंभीर होंगे.कुछ विश्लेषकों ने यह भी कहा है कि दुनिया में अब किसी नए बड़े युद्ध के लिए उत्साह नहीं है.

2003 का इराक युद्ध और अफगानिस्तान का लंबा संघर्ष अभी भी लोगों की याद में ताजा है. उन युद्धों ने पूरे क्षेत्र को अस्थिर कर दिया था.

विशेषज्ञों का मानना है कि उन युद्धों के बाद कई नए उग्रवादी संगठन पैदा हुए. कई इलाकों में लंबे समय तक हिंसा जारी रही.

इसी कारण कई देश चाहते हैं कि मौजूदा संघर्ष जल्द खत्म हो.लेकिन फिलहाल ऐसा होता नजर नहीं आ रहा है.

युद्ध का एक और मोर्चा इराक के कुर्द इलाके में भी खुल गया है. रिपोर्टों के अनुसार उत्तरी इराक के सुलैमानीयाह क्षेत्र में एक ईरानी कुर्द विपक्षी संगठन के ठिकाने पर तीन मिसाइलें दागी गईं.

यह हमला कोमाला नाम के संगठन के एक ठिकाने पर हुआ बताया जा रहा है.हालांकि संगठन के एक वरिष्ठ सदस्य ने दावा किया है कि इस हमले से कोई बड़ा नुकसान नहीं हुआ.

इस घटना ने भी क्षेत्र में तनाव बढ़ा दिया है.

खाड़ी देशों में भी चिंता बढ़ती जा रही है. कई देशों ने अपने नागरिकों को सतर्क रहने की सलाह दी है.बहरीन में अचानक हवाई हमले की चेतावनी देने वाले सायरन बजने लगे.

बहरीन के गृह मंत्रालय ने लोगों से शांत रहने और सुरक्षित स्थानों पर जाने की अपील की है.सरकार ने कहा है कि लोग आधिकारिक सूचनाओं पर ध्यान दें और अफवाहों से बचें.

इस पूरे संकट का असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है. तेल की कीमतें पहले ही बढ़ने लगी हैं.यदि होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई तो ऊर्जा बाजार में बड़ा झटका लग सकता है.

खाड़ी के कई देश अब वैकल्पिक तेल निर्यात मार्गों पर विचार कर रहे हैं.

विशेषज्ञों का कहना है कि कुछ देश नए पाइपलाइन मार्गों और बंदरगाहों का उपयोग बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं ताकि संकट की स्थिति में तेल निर्यात जारी रखा जा सके.

लेकिन यह समाधान तुरंत संभव नहीं है.अंतरराष्ट्रीय समुदाय भी इस संकट को लेकर सक्रिय दिखाई नहीं दे रहा है.कई देशों ने चिंता जरूर जताई है. लेकिन अब तक कोई बड़ा कूटनीतिक प्रयास सामने नहीं आया है.

कुछ विश्लेषकों का कहना है कि एशिया और यूरोप के देशों को इस संकट को शांत कराने के लिए ज्यादा सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए.

उनका मानना है कि यदि बड़े देश मिलकर मध्यस्थता करें तो हालात को संभाला जा सकता है.लेकिन फिलहाल मैदान में हथियारों की आवाज ज्यादा तेज सुनाई दे रही है.

मध्य पूर्व की यह आग यदि जल्द नहीं बुझी तो इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ सकता है.ऊर्जा बाजार, व्यापार मार्ग और क्षेत्रीय सुरक्षा सभी पर इसका प्रभाव पड़ेगा.

इस समय सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या कूटनीति इस युद्ध को रोक पाएगी.या फिर यह संघर्ष एक लंबे और खतरनाक दौर में बदल जाएगा.दुनिया फिलहाल इसी सवाल का जवाब तलाश रही है.