दुआओं की सरहद: जब ईरान के जख्मों पर कश्मीर ने रखा मरहम
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सरहदें टूटीं, जज्बा जीता: ईरान के जख्मों पर कश्मीर का मरहम

मुस्लिम नाउ ब्यूरो, श्रीनगर / जम्मू:
इतिहास गवाह है कि जब-जब दुनिया के किसी कोने में बारूदी धुएं ने मासूमों का दम घोंटने की कोशिश की है, तब-तब इंसानियत ने सरहदों की दीवारें गिराकर अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है। आज पश्चिम एशिया की तपती जमीन पर इजरायल और अमेरिका के मिसाइलों की गूंज है, लेकिन उस गूंज के बीच कश्मीर की वादियों से एक ऐसी खामोश मगर बेहद ताकतवर लहर उठी है, जिसने दुनिया के कूटनीतिक गलियारों को हैरान कर दिया है। यह कहानी ईरान के साथ खड़े उस हिंदुस्तान की है, जिसकी रूह कश्मीर के छोटे-छोटे घरों में बसती है।
ईरान के राजदूत का भावुक संदेश: जब तेल नहीं, जज्बात जीते
हाल ही में भारत में ईरान के राजदूत ने एक ऐसा बयान दिया जिसने अंतरराष्ट्रीय राजनीति के कठोर चेहरों को भी भावुक कर दिया। उन्होंने बताया कि जहाँ एक ओर ईरान चीन और रूस जैसे वैश्विक दिग्गजों को सहयोग दे रहा है, वहीं उसने भारतीय तेल जहाजों को भी ‘हॉर्मुज जलडमरूमध्य’ (Strait of Hormuz) से सुरक्षित गुजरने का रास्ता दिया है। राजदूत ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “यह केवल व्यापारिक समझौता नहीं है, बल्कि भारत के उन आम लोगों के प्रति हमारा आभार है, जो इस कठिन समय में ईरान के साथ एक चट्टान की तरह अडिग खड़े हैं।” यह बयान साफ करता है कि जब दुनिया प्रतिबंधों की भाषा बोल रही थी, तब भारत के आम जनमानस की सहानुभूति ने ईरान के लिए संजीवनी का काम किया।
एक मुट्ठी चावल और सोने के कंगन: कश्मीर का महादान
यह केवल हेडलाइंस की बात नहीं है। यह कहानी उन हज़ारों माताओं की है जिन्होंने अपने संदूक खोल दिए हैं। कश्मीर की सर्द हवाओं के बीच इन दिनों एक ऐसा मंजर देखने को मिल रहा है जो किसी उपन्यास के सबसे मार्मिक अध्याय जैसा है। ईद की खुशियों के ठीक अगले दिन, 22 मार्च 2026 की वह सुबह याद की जाएगी जब श्रीनगर के रैनावारी से लेकर बडगाम के गांवों तक युवाओं की टोलियां हाथ में झोला लेकर घर-घर निकलीं।
रैनावारी के एजाज अहमद जब अपनी टोली के साथ निकले, तो उन्हें उम्मीद नहीं थी कि उन्हें क्या मिलने वाला है। एजाज कहते हैं, “ईरान पर थोपा गया युद्ध गैर-कानूनी है। वहाँ इंसानियत कराह रही है। एक सभ्य समाज का हिस्सा होने के नाते, हमारा फर्ज है कि हम चुप न रहें।” और कश्मीर चुप नहीं रहा। लोगों ने केवल नकदी नहीं दी; किसी ने अपनी शादी की अंगूठी दान कर दी, तो किसी ने अपने घर के पुराने तांबे के बर्तन यह कहकर थमा दिए कि “इन्हें बेचकर हमारे ईरानी भाइयों के लिए दवाइयां भेजना।”
जब मासूमों ने तोड़ी अपनी ‘पॉकेट मनी’ की दीवार
बडगाम जिले के ‘मस्जिद इमाम ज़मां’ के बाहर का दृश्य किसी को भी रुला देने के लिए काफी था। वहां छोटे-छोटे बच्चे अपनी रंग-बिरंगी ‘पिग्गी बैंक’ (गुल्लक) लेकर कतार में खड़े थे। इन बच्चों को शायद पश्चिम एशिया के जटिल भूगोल और राजनीति का पता न हो, लेकिन उन्हें यह पता था कि सरहद पार उनके जैसे ही बच्चों के घर उजड़ रहे हैं।
मस्जिद के इमाम मोहसिन अली भावुक स्वर में बताते हैं, “हमारी बहनों ने अपने जेवर दान कर दिए हैं। वे कहती हैं कि अगर हम मैदान-ए-जंग में जाकर लड़ नहीं सकते, तो कम से कम उन मजलूमों के घावों को भरने में मदद तो कर सकते हैं।” अधिकारियों के मुताबिक, श्रीनगर, बडगाम और बारामुला जैसे इलाकों में दान का इतना बड़ा अंबार लग गया है कि उसे संभालने के लिए अतिरिक्त स्वयंसेवकों की जरूरत पड़ रही है। कुछ ग्रामीण परिवारों ने तो अपने पशु (livestock) तक दान करने की पेशकश की है।
यौम-ए-कुद्स: आक्रोश और एकजुटता का संगम
इस मानवीय मुहिम की नींव 13 मार्च को ‘यौम-ए-कुद्स’ के मौके पर ही पड़ गई थी। बडगाम और लेह-लद्दाख की सड़कों पर हजारों की भीड़ केवल प्रदर्शन के लिए नहीं उतरी थी, बल्कि वह एक संदेश थी। मरकजी इमामबाड़ा से निकली वह रैली शांतिपूर्ण जरूर थी, लेकिन उसमें इजरायल और अमेरिका के हमलों के प्रति गहरा आक्रोश था। 28 फरवरी को ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की शहादत के बाद कश्मीर की फिजाओं में जो उदासी थी, वह अब सक्रिय मदद में बदल चुकी है।
तेहरान का जवाब: “शुक्रिया इंडिया”
कश्मीर की इस बेमिसाल उदारता पर ईरानी दूतावास भी नतमस्तक है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर तस्वीरें साझा करते हुए लिखा, “भारत, आपकी इस इंसानियत को हम कभी नहीं भूलेंगे।” दूतावास ने बार-बार कश्मीर के लोगों की दयालुता का जिक्र किया है। यह पहली बार है जब किसी अंतरराष्ट्रीय आपदा या युद्ध में जमीनी स्तर पर भारतीय जनता ने इतने बड़े पैमाने पर अपनी निजी संपत्ति का त्याग किसी दूसरे देश के लिए किया है।

धर्म की दीवारों से परे: एक नई मिसाल
इस पूरी मुहिम की सबसे खूबसूरत बात यह है कि इसमें कोई सांप्रदायिक या मजहबी दीवार नहीं दिखी। कश्मीर में शिया, सुन्नी और अन्य समुदायों के लोग कंधे से कंधा मिलाकर ईरान के लिए राहत कोष जुटा रहे हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि दुख का कोई धर्म नहीं होता और मदद की कोई जात नहीं होती।
निष्कर्ष: दुआओं का पुल
आज कश्मीर से तेहरान तक एक अदृश्य पुल बन चुका है। यह पुल ईंट-पत्थरों का नहीं, बल्कि दुआओं और आंसुओं का है। जब इतिहासकार 2026 के इस दौर को लिखेंगे, तो वे केवल मिसाइलों और हमलों का जिक्र नहीं करेंगे, वे उन कश्मीरी बच्चों का भी जिक्र करेंगे जिन्होंने अपनी पॉकेट मनी से एक दूर देश के नागरिक की जान बचाने की कोशिश की।
यह कहानी हमें सिखाती है कि जब जुल्म की इंतिहा होती है, तो इंसानियत का सैलाब सरहदों की बंदिशें तोड़ देता है। हिंदुस्तान आज ईरान के साथ केवल रणनीतिक रूप से नहीं, बल्कि अपनी धड़कनों के साथ खड़ा है।

