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वॉशिंगटन डीसी से ईरान तक बढ़ता तनाव, जंग और कूटनीति आमने-सामने खड़ी

मुस्लिम नाउ ब्यूरो, वॉशिंगटन/तेहरान/बगदाद:

पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष अब एक नए और खतरनाक मोड़ पर पहुंचता नजर आ रहा है, जहां जंग के साए के बीच कूटनीति की हलचल भी तेज हो गई है। अमेरिका ने अपने नागरिकों के लिए वैश्विक स्तर पर चेतावनी जारी करते हुए खास तौर पर इराक को तुरंत छोड़ने की सलाह दी है। इस चेतावनी ने न केवल क्षेत्रीय अस्थिरता को उजागर किया है, बल्कि यह भी संकेत दिया है कि हालात कितने गंभीर हो चुके हैं।

अमेरिकी विदेश विभाग के अनुसार, ईरान समर्थित सशस्त्र समूहों ने इराक में अमेरिकी नागरिकों और उनसे जुड़े ठिकानों पर बड़े पैमाने पर हमले किए हैं। इन हमलों में ड्रोन, मिसाइल और रॉकेट जैसे आधुनिक हथियारों के इस्तेमाल की आशंका जताई गई है। इराकी कुर्दिस्तान क्षेत्र तक फैले इन हमलों ने पूरे इलाके को युद्ध जैसे हालात में धकेल दिया है।

स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अमेरिकी दूतावास बगदाद और अमेरिकी वाणिज्य दूतावास एरबिल ने अपनी नियमित सेवाएं निलंबित कर दी हैं। अमेरिकी प्रशासन ने अपने नागरिकों को साफ निर्देश दिया है कि वे किसी भी कीमत पर इराक की यात्रा न करें और जो वहां मौजूद हैं, वे तुरंत देश छोड़ दें।

इस बीच, डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिकी प्रशासन एक दोहरी रणनीति पर काम करता दिखाई दे रहा है—एक तरफ सुरक्षा को लेकर सख्ती, तो दूसरी ओर संभावित कूटनीतिक समाधान की तलाश। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका ईरान के संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाकिर ग़ालिबाफ को एक संभावित वार्ताकार और भविष्य के नेतृत्व के रूप में देख रहा है।

64 वर्षीय ग़ालिबाफ, जो अपने सख्त बयानों और अमेरिका विरोधी रुख के लिए जाने जाते हैं, व्हाइट हाउस के कुछ अधिकारियों की नजर में ऐसे नेता हैं जो भविष्य में ईरान का नेतृत्व कर सकते हैं और अमेरिका के साथ बातचीत की राह खोल सकते हैं। हालांकि, प्रशासन के भीतर इस पर अभी कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “वह एक मजबूत विकल्प हैं, लेकिन हमें हर पहलू को परखना होगा।”

दूसरी ओर, संभावित वार्ता को लेकर भी अनिश्चितता बनी हुई है। कैरोलीन लेविट ने साफ किया है कि जेडी वेंस, स्टीव विटकॉफ और जेरेड कुशनर की ईरानी अधिकारियों से मुलाकात की खबरों की अभी पुष्टि नहीं की जा सकती। उन्होंने कहा, “ये बेहद संवेदनशील कूटनीतिक बातचीत है, और इसे मीडिया के जरिए संचालित नहीं किया जा सकता।”

हालांकि, पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में संभावित बैठक की खबरों ने कूटनीतिक हलकों में हलचल जरूर पैदा कर दी है। बताया जा रहा है कि मध्यस्थ देश दोनों पक्षों को बातचीत की मेज पर लाने की कोशिश कर रहे हैं।

लेकिन इस संभावित कूटनीति के समानांतर, बयानबाजी का स्तर भी बेहद तीखा होता जा रहा है। ग़ालिबाफ ने अपने एक बयान में दुनिया को दो हिस्सों में बांटते हुए कहा कि “या तो आप गाजा के साथ हैं, या फिर उस वर्ग के साथ जो अत्याचार का समर्थन करता है—बीच का कोई रास्ता नहीं है।” उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि अमेरिका द्वारा वार्ता की बात महज तेल और वित्तीय बाजारों को प्रभावित करने की रणनीति है।

इस पूरे घटनाक्रम पर मुंबई में तैनात ईरानी महावाणिज्यदूत सईद रजा मोसायेब मोटलघ का बयान भी महत्वपूर्ण है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की है कि वह युद्ध की शुरुआत करने वाले पक्षों को जवाबदेह ठहराए और उन्हें इस तरह की कार्रवाइयों से रोके। उनका कहना है कि यह केवल ईरान का मुद्दा नहीं, बल्कि वैश्विक न्याय और अंतरराष्ट्रीय कानून का सवाल है।

इस बीच, अमेरिका के आंतरिक मामलों के मंत्री डग बर्गम ने भरोसा जताया है कि ट्रंप इस संकट का समाधान निकाल लेंगे। उन्होंने कहा कि “ट्रंप एक बेहतरीन सौदेबाज हैं और वह अमेरिकी हितों के लिए एक मजबूत समझौता करेंगे।”

तेल बाजार पर भी इस संघर्ष का सीधा असर पड़ा है। हॉर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव के कारण वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित हुई है। हालांकि हाल के दिनों में ब्रेंट क्रूड की कीमतों में गिरावट देखी गई है, जो यह संकेत देती है कि बाजार कूटनीतिक समाधान की उम्मीद कर रहा है।

इसके साथ ही, अमेरिकी शेयर बाजार में भी तेजी आई है, जहां S&P 500 में उल्लेखनीय उछाल दर्ज किया गया। यह निवेशकों के उस विश्वास को दर्शाता है कि हालात भले ही तनावपूर्ण हों, लेकिन समाधान की संभावनाएं अभी खत्म नहीं हुई हैं।

पूरे घटनाक्रम को देखें तो एक बात साफ है—दुनिया एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां एक छोटी सी चूक बड़े युद्ध का कारण बन सकती है। एक ओर सैन्य तैयारियां हैं, चेतावनियां हैं, हमले हैं; तो दूसरी ओर बातचीत की कोशिशें, संभावित समझौते और शांति की उम्मीद।

यह संघर्ष केवल दो देशों के बीच नहीं रह गया है, बल्कि यह वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था और सुरक्षा के हर पहलू को प्रभावित कर रहा है। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद अहम होगा कि क्या कूटनीति जंग पर भारी पड़ती है, या फिर दुनिया एक और बड़े संघर्ष की ओर बढ़ती है।