सर सैयद अहमद खान का शिक्षा मिशन बदला भारतीय मुसलमानों का भविष्य
कुरबान अली

उन्नीसवीं सदी का भारत। सामाजिक और राजनीतिक उथल पुथल का दौर। इसी समय एक ऐसा व्यक्तित्व उभरता है जिसने शिक्षा को हथियार बनाकर पूरी कौम की दिशा बदलने की कोशिश की। यह नाम है सर सैयद अहमद खान।
सर सैयद का शुरुआती जीवन ज्ञान की तलाश से भरा हुआ था। उन्होंने अपने चाचा सैयद जैनुल आबेदीन से गणित, भूविज्ञान और चिकित्सा सीखी। साथ ही विभिन्न मौलवियों और मौलानाओं से अरबी साहित्य, तफसीर, हदीस और फिक्ह की शिक्षा हासिल की। उनका बौद्धिक दायरा बचपन से ही व्यापक था।
Sir Syed Ahmad Khan's sherwani. He was always impeccably dressed in a beautiful sherwani. It is part of Aligarh culture.
— Syed Ubaidur Rahman (@syedurahman) May 26, 2023
Founder of Aligarh Muslim University, Sayyid Ahmad Khan was an Indian Muslim reformer, philosopher, and educationist in nineteenth-century British India pic.twitter.com/rrb23sAN3m
उनके परिवार में शिक्षा और लेखन का माहौल था। उनके बड़े भाई सैयद मुहम्मद 1837 में दिल्ली से एक साप्ताहिक अखबार निकालते थे। इस अखबार का नाम था सैयदुल अखबार। यह उस दौर में एक महत्वपूर्ण बौद्धिक मंच था। 1845 में भाई की मृत्यु के बाद इसकी जिम्मेदारी सर सैयद ने संभाली। यहीं से उनकी पत्रकारिता की समझ और दृष्टि विकसित हुई।
सर सैयद एक बहुआयामी व्यक्तित्व थे। वे सिर्फ लेखक या पत्रकार नहीं थे। वे इतिहासकार थे। विधिवेत्ता थे। शिक्षाविद् थे। समाज सुधारक थे। उनमें वैज्ञानिक सोच थी। वे हर चीज को तर्क से परखते थे। यही सोच उन्हें अपने समय से आगे ले गई।
The last message of Sir Syed Ahmad Khan #SirSyedDay pic.twitter.com/MjsAnJym5L
— Rana Safvi رعنا राना (@iamrana) October 17, 2019
उन्होंने मात्र बाईस वर्ष की उम्र में सिविल सेवा में प्रवेश किया। यह उनके प्रशासनिक कौशल का संकेत था। लेकिन उनकी असली रुचि ज्ञान और शोध में थी। इतिहास उन्हें बेहद आकर्षित करता था। इसी रुचि ने उन्हें एक बड़ी कृति लिखने के लिए प्रेरित किया।
तीस वर्ष की उम्र में उन्होंने दिल्ली के ऐतिहासिक स्मारकों पर ‘आसार उस सनादीद’ नामक पुस्तक लिखी। यह सिर्फ एक किताब नहीं थी। यह दिल्ली के इतिहास और वास्तुकला का दस्तावेज थी। इसके बाद उन्होंने 1855 में ‘आइन ए अकबरी’ का नया संस्करण प्रकाशित किया। यह मुगल इतिहास की एक अहम कड़ी थी।
Pic 1- The house Sir Syed stayed in London for a year.
— Salman Nizami (@SalmanNizami_) October 17, 2021
Pic 2- The house he stayed in for a lifetime in Delhi.
No wonder the West values intellect and history and we ignore both — much to our own detriment! pic.twitter.com/PctnLUdalX
प्रसिद्ध इतिहासकार प्रोफेसर एम मुजीब के अनुसार, सर सैयद ने बचपन में ही फारसी और अरबी में महारत हासिल कर ली थी। उन्हें गणित और खगोल विज्ञान में भी गहरी रुचि थी। उन्होंने चिकित्सा का अध्ययन किया और कुछ समय तक इसका अभ्यास भी किया। यह उनके ज्ञान की विविधता को दर्शाता है।
फिर आया 1857 का विद्रोह। यह घटना भारत के इतिहास का निर्णायक मोड़ थी। इस विद्रोह के बाद मुसलमानों की स्थिति काफी कमजोर हो गई। सर सैयद ने इस बदलाव को बहुत करीब से देखा। उन्होंने हालात का गहराई से अध्ययन किया।
Book Launch of Sir Syed Ahmed Khan's biography, authored by my father.
— Aman Wadud (@AmanWadud) December 12, 2020
This is the first book on Sir Syed in Assamese. pic.twitter.com/fDWcDhWGsm
उनके पहले जीवनी लेखक जी एफ आई ग्राहम लिखते हैं कि विद्रोह के बाद सर सैयद ने अपने समाज की हालत को समझने की गंभीर कोशिश की। उन्होंने महसूस किया कि मुसलमान शिक्षा के मामले में बहुत पीछे हैं। उनकी शिक्षा सीमित थी। उसमें आधुनिक विज्ञान और इतिहास का अभाव था।
सर सैयद का मानना था कि सिर्फ पारंपरिक धार्मिक शिक्षा काफी नहीं है। उन्होंने कहा कि तर्क, दर्शन और धार्मिक अध्ययन जरूरी हैं। लेकिन इसके साथ आधुनिक विज्ञान, भूगोल और इतिहास भी उतने ही जरूरी हैं। बिना इसके समाज आगे नहीं बढ़ सकता।
उन्होंने शिक्षा को ही सबसे बड़ा समाधान माना। उनका नारा था शिक्षा, शिक्षा और शिक्षा। वे मानते थे कि अगर जड़ मजबूत होगी तो पेड़ अपने आप फल देगा। उन्होंने साफ कहा कि विज्ञान और तकनीक का ज्ञान ही मुसलमानों की समस्याओं का असली इलाज है।
इसी सोच के साथ उन्होंने काम शुरू किया। 1858 में जब वे मुरादाबाद में पद पर थे, तब उन्होंने एक स्कूल की स्थापना की। इस स्कूल में आधुनिक इतिहास पढ़ाया जाता था। यह उस समय के हिसाब से एक बड़ा कदम था।
Sir Syed Ahmad Khan, was a canonical figure of India’s intellectual history. He passed away in 1898 but stays with us with his writings on a variety of subjects that have not lost their relevance even though they are deeply rooted in their times. pic.twitter.com/JrWx3KOqae
— Rekhta (@Rekhta) October 18, 2019
लेकिन सर सैयद यहीं नहीं रुके। उन्हें एहसास हुआ कि आधुनिक विषयों की किताबें स्थानीय भाषाओं में उपलब्ध नहीं हैं। इससे शिक्षा का प्रसार रुकता है। इसी से उनके मन में ट्रांसलेशन सोसाइटी का विचार आया। इसका उद्देश्य था अंग्रेजी की किताबों का अनुवाद करना।
1862 में उनका तबादला गाजीपुर हुआ। वहां उन्होंने एक और महत्वपूर्ण काम किया। उन्होंने बाइबिल पर टिप्पणी लिखी। यह किसी मुसलमान द्वारा किया गया पहला ऐसा प्रयास था। उनका मकसद था यह दिखाना कि बाइबिल और कुरान में कोई मूलभूत विरोध नहीं है।
यह काम आसान नहीं था। इसमें गहरी समझ और साहस दोनों की जरूरत थी। प्रोफेसर एम मुजीब लिखते हैं कि सर सैयद का हर काम मेहनत से भरा होता था। वे हर योजना को बहुत सोच समझकर बनाते थे। उनका काम विद्वता और संतुलन का उदाहरण था।
Full video here (https://t.co/dSxH5dIfAh)
— Dr. Ruchika Sharma (@tishasaroyan) October 15, 2025
Watch how Sir Syed Ahmed Khan contributed to the myth of Delhi being a "Mahabharat era" city. According to Khan, there was archaeological proof of Yudhishthir's existence. 😳 Why did he make such a preposterous conclusion? pic.twitter.com/HRUeWOmmsO
सर सैयद का दृष्टिकोण स्पष्ट था। वे समाज को टकराव से निकालकर संवाद की ओर ले जाना चाहते थे। वे चाहते थे कि लोग ज्ञान के आधार पर सोचें। अंधविश्वास से बाहर आएं। आधुनिकता को अपनाएं।
उन्होंने शिक्षा को सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने इसे सामाजिक सुधार का माध्यम बनाया। उनका मानना था कि अगर समाज शिक्षित होगा तो वह खुद अपनी समस्याओं का समाधान ढूंढ लेगा।
आज जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं तो सर सैयद का काम और भी महत्वपूर्ण लगता है। उन्होंने जिस शिक्षा आंदोलन की नींव रखी, उसने आने वाली पीढ़ियों को दिशा दी। उनका प्रभाव आज भी महसूस किया जा सकता है।
वे सिर्फ एक व्यक्ति नहीं थे। वे एक आंदोलन थे। एक सोच थे। उन्होंने अपने समय की चुनौतियों को समझा और उनका व्यावहारिक समाधान दिया। यही उन्हें महान बनाता है।
नोटः लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और बीबीसी के लिए कार्य कर चुके हैं।

