जमाअत-ए-इस्लामी हिंद का ‘ईद गेट-टुगेदर 2026’: नफरत के दौर में मोहब्बत और एकता का पैगाम
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नई दिल्ली | नेशनल डेस्क
राजधानी दिल्ली के प्रतिष्ठित इंडिया हैबिटेट सेंटर के मार्गोसा और सिल्क कॉटन लॉन में शुक्रवार, 27 मार्च को एक अलग ही नजारा था। यहाँ मौका था जमाअत-ए-इस्लामी हिंद (JIH) द्वारा आयोजित ‘ईद गेट-टुगेदर 2026’ का। यह आयोजन केवल एक औपचारिक मुलाकात नहीं थी, बल्कि बदलते भारत में सामाजिक सद्भाव, न्याय और साझा विरासत को सहेजने का एक सशक्त मंच साबित हुआ।

विभिन्न रंगों का संगम: एक छत के नीचे पूरी दुनिया
इस कार्यक्रम की सबसे खास बात इसकी विविधता रही। कार्यक्रम में केवल मुस्लिम समुदाय के लोग ही नहीं, बल्कि विभिन्न देशों के राजनयिक (Diplomats), अलग-अलग धर्मों के गुरु, जनप्रतिनिधि, वरिष्ठ पत्रकार और नागरिक समाज के प्रबुद्ध सदस्य शामिल हुए। अलग-अलग विचारधाराओं और पृष्ठभूमियों से आए इन लोगों की मौजूदगी ने यह संदेश दिया कि शांति और सह-अस्तित्व ही हमारे समाज की असली ताकत है।

संवाद: दूरियों को मिटाने का जरिया
आज के दौर में जहाँ सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों से दूरियां बढ़ रही हैं, वहीं इस ईद मिलन समारोह ने ‘पारस्परिक संवाद’ को प्राथमिकता दी। मेहमानों ने एक-दूसरे के साथ ईद की खुशियां साझा कीं और इस बात पर जोर दिया कि एक समावेशी समाज के निर्माण के लिए आपस में बातचीत करना कितना जरूरी है।

अध्यक्ष सैयद सआदतुल्लाह हुसैनी का प्रेरक संबोधन
जमाअत-ए-इस्लामी हिंद के अध्यक्ष सैयद सआदतुल्लाह हुसैनी ने अपने संबोधन में युवाओं और समाज के लिए एक गहरी बात कही। उन्होंने कहा:
“त्योहार केवल जश्न मनाने के लिए नहीं होते, बल्कि ये लोगों को जोड़ने और सामाजिक संबंधों को मजबूती देने का जरिया हैं। आज के समय में हमें ऐसे मंचों की जरूरत है जो विभाजन के बजाय सहयोग और समझ को बढ़ावा दें।”
उन्होंने आशा व्यक्त की कि यह गेट-टुगेदर केवल एक शाम का कार्यक्रम बनकर नहीं रह जाएगा, बल्कि यह प्रतिभागियों के बीच एक सार्थक संवाद (Meaningful Dialogue) की शुरुआत करेगा, जिससे एक सौहार्दपूर्ण समाज की नींव मजबूत होगी।

युवाओं के लिए संदेश
इस आयोजन ने देश के युवाओं को यह सीख दी कि त्योहारों का असली मकसद अपनी खुशियों में दूसरों को शामिल करना है। सामूहिक जिम्मेदारी और एकता की भावना ही वह रास्ता है, जिससे हम एक बेहतर और न्यायपूर्ण भविष्य की ओर बढ़ सकते हैं। इंडिया हैबिटेट सेंटर की वह शाम केवल मिठाइयों और मुस्कुराहटों की नहीं थी, बल्कि वह एक ‘उम्मीद’ की शाम थी—एक ऐसे भारत की उम्मीद जहाँ हर नागरिक कंधे से कंधा मिलाकर चल सके।

