दुनिया खतरनाक मोड़ पर: खाड़ी देशों ने दी ऊर्जा संकट और महायुद्ध की चेतावनी
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न्यूयॉर्क
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के मंच से दुनिया को एक बड़ी चेतावनी दी गई है। गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल (GCC) के महासचिव जासिम अल्बुदैवी ने कहा है कि दुनिया इस वक्त एक ‘खतरनाक चौराहे’ पर खड़ी है। ईरान द्वारा किए जा रहे हमलों ने न केवल क्षेत्रीय सुरक्षा को खतरे में डाला है, बल्कि वैश्विक ऊर्जा संकट (Energy Shock) का डर भी पैदा कर दिया है।
यह पहली बार है जब जीसीसी के किसी महासचिव ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को इस तरह संबोधित किया है। जासिम अल्बुदैवी ने साफ शब्दों में कहा कि खाड़ी क्षेत्र की स्थिरता केवल इस इलाके का मामला नहीं है। यह पूरी दुनिया की जरूरत है। अगर यहाँ अशांति होती है, तो उसका असर हर देश की रसोई और उद्योग पर पड़ेगा।
ईरानी हमलों की कड़ी निंदा
अल्बुदैवी ने 28 फरवरी के बाद से खाड़ी देशों और जॉर्डन पर हुए बैलिस्टिक मिसाइल और ड्रोन हमलों की जमकर आलोचना की। उन्होंने कहा कि ये हमले नागरिक ठिकानों, हवाई अड्डों, तेल संयंत्रों और बंदरगाहों को निशाना बनाकर किए गए हैं। यह अंतरराष्ट्रीय कानून और संप्रभुता का खुला उल्लंघन है।
महासचिव ने स्पष्ट किया कि नागरिकों और उनकी संपत्तियों को निशाना बनाना किसी भी स्थिति में जायज नहीं ठहराया जा सकता। उन्होंने सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 2817 का स्वागत किया। साथ ही उन्होंने मांग की कि हमलावरों की जवाबदेही तय करने के लिए इस प्रस्ताव को पूरी सख्ती से लागू किया जाए।
वैश्विक सप्लाई चेन पर मंडराता खतरा
जीसीसी प्रमुख ने चेतावनी दी कि यह तनाव सिर्फ सीमाओं तक सीमित नहीं रहेगा। समुद्री परिवहन और ग्लोबल सप्लाई चेन पर इसका बुरा असर पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि समुद्री रास्तों में रुकावट आने से दुनिया भर में तेल, गैस, उर्वरक और पेट्रोकेमिकल्स की कमी हो सकती है।
अल्बुदैवी ने सुरक्षा परिषद से अपनी जिम्मेदारी निभाने की अपील की। उन्होंने कहा कि महत्वपूर्ण जलमार्गों की सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय व्यापार के प्रवाह को सुनिश्चित करना यूएन का मुख्य कर्तव्य है। खाड़ी देशों के पास आत्मरक्षा का अधिकार सुरक्षित है, लेकिन वे अब भी बातचीत और कूटनीति को ही प्राथमिकता देते हैं।
सऊदी अरब के कूटनीतिक नेतृत्व की सराहना
अपने ऐतिहासिक संबोधन में अल्बुदैवी ने सऊदी अरब के नेतृत्व की जमकर तारीफ की। उन्होंने कहा कि क्षेत्रीय संघर्षों को सुलझाने में सऊदी अरब ने एक बड़े भाई की भूमिका निभाई है। फिलिस्तीन मुद्दे पर सऊदी अरब के प्रयासों और ‘टू-स्टेट सॉल्यूशन’ के समर्थन की उन्होंने सराहना की।
उन्होंने ‘न्यूयॉर्क घोषणापत्र’ का जिक्र करते हुए कहा कि सऊदी अरब के नेतृत्व में ही गाजा पर बनी अरब और इस्लामिक मंत्रिस्तरीय समिति ने इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। साथ ही उन्होंने कतर द्वारा किए जा रहे मध्यस्थता के प्रयासों को भी सराहा, जिससे युद्धविराम और मानवीय सहायता पहुँचाने में मदद मिली है।
क्षेत्रीय संकट और जीसीसी का रुख
अल्बुदैवी ने यमन, लेबनान और सीरिया के हालातों पर भी जीसीसी का पक्ष रखा:
- यमन: जीसीसी संयुक्त राष्ट्र के नेतृत्व में एक व्यापक राजनीतिक समाधान का समर्थन करता है।
- लेबनान: हालिया हिंसा में हुए बुनियादी ढांचे के नुकसान और बड़े पैमाने पर विस्थापन पर चिंता जताई गई। संप्रभुता के सम्मान की मांग की गई।
- सीरिया: जीसीसी वहां पुनर्निर्माण और आर्थिक सुधार के प्रयासों में सक्रिय सहयोग दे रहा है।
उन्होंने यह भी बताया कि खाड़ी देशों ने 2020 से 2025 के बीच 14 अरब डॉलर से ज्यादा की मानवीय सहायता दी है। यह उन्हें दुनिया के सबसे बड़े दानदाताओं की सूची में शामिल करता है।
निष्कर्ष: शांति या विनाश?
भाषण के अंत में अल्बुदैवी ने दुनिया को एक निर्णायक मोड़ की याद दिलाई। उन्होंने कहा कि या तो हम सामूहिक सुरक्षा के रास्ते पर चलेंगे, या फिर दुनिया को ताकत के शासन (Rule of Force) के हवाले कर देंगे।
उन्होंने कहा कि हम शांति के लिए अपना हाथ बढ़ाते हैं। लेकिन हम अपनी सुरक्षा, संप्रभुता या क्षेत्रीय स्थिरता के साथ कोई समझौता नहीं करेंगे। खाड़ी देशों का यह कड़ा संदेश बताता है कि आने वाले दिन वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था के लिए कितने संवेदनशील होने वाले हैं। अगर तनाव कम नहीं हुआ, तो दुनिया को एक बड़े आर्थिक और ऊर्जा संकट का सामना करना पड़ सकता है।
खाड़ी देशों की यह आवाज अब संयुक्त राष्ट्र के गलियारों में गूंज रही है। अब देखना यह है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस ‘खतरनाक चौराहे’ पर कौन सा रास्ता चुनता है। क्या कूटनीति इस आग को बुझा पाएगी या फिर दुनिया एक और बड़े युद्ध की गवाह बनेगी?

