गुड फ्राइडे से जुमे तक: तीन धर्मों को जोड़ती आस्था की साझा विरासत
मुस्लिम नाउ विशेष
दुनिया के कई हिस्सों में इन दिनों एक खास आध्यात्मिक माहौल है। यह समय यहूदियों, ईसाइयों और मुसलमानों के लिए गहरी धार्मिक अहमियत रखता है। यहूदी समुदाय पासओवर मना रहा है। ईसाई समुदाय होली वीक और ईस्टर की तैयारी में है। वहीं इस पूरे दौर में इस्लाम की भी एक अहम कड़ी जुड़ी हुई है, जो इन तीनों इब्राहीमी धर्मों को एक साझा धागे में पिरोती है।
पासओवर की जड़ें हज़रत मूसा की उस कहानी में हैं, जब उन्होंने बनी इस्राईल को मिस्र की गुलामी से आज़ादी दिलाई। यह घटना तौरात की किताब एक्सोडस में दर्ज है। इसमें बताया गया है कि कैसे मूसा और हारून ने फिरौन से कहा कि वह इस्राईलियों को आज़ाद करे। लेकिन फिरौन ने इनकार कर दिया। इसके बाद कई मुसीबतें आईं और आखिरकार इस्राईलियों को आज़ादी मिली।
यह कहानी सिर्फ यहूदी धर्म तक सीमित नहीं है। इस्लाम में भी हज़रत मूसा का जिक्र सबसे ज्यादा आता है। कुरआन में कई जगहों पर मिस्र से निकलने और रेगिस्तान में भटकने की घटनाओं का जिक्र मिलता है। यह दिखाता है कि इतिहास और आस्था के कई पहलू इन धर्मों में एक जैसे हैं।
ईसाई धर्म में इसी समय होली वीक मनाया जाता है। इसकी शुरुआत पाम संडे से होती है और इसका अंत ईस्टर पर होता है। यह हज़रत ईसा मसीह के जीवन के आखिरी दिनों, उनके सूली पर चढ़ाए जाने और फिर पुनर्जीवित होने की याद में मनाया जाता है।
बाइबल के अनुसार, आखिरी भोज यानी लास्ट सपर में ईसा ने अपने शिष्यों के साथ रोटी और दाखरस बांटा। इसे आज भी ईसाई धर्म में एक पवित्र परंपरा के रूप में निभाया जाता है। इसे यूखारिस्ट या होली कम्यूनियन कहा जाता है।
इस्लाम इस घटना को अलग नजरिए से देखता है। कुरआन में ईसा मसीह के चमत्कारों का जिक्र है। जैसे अंधों को ठीक करना, बीमारों को शिफा देना और मृतकों को जीवित करना। लेकिन सूली पर चढ़ाए जाने की बात को इस्लाम स्वीकार नहीं करता। इसके अनुसार, अल्लाह ने ईसा को अपने पास उठा लिया था।
फिर भी, कुरआन में एक ऐसी आयत है जो ईसाई परंपरा से गहराई से जुड़ती है। इसमें हज़रत ईसा के हवारियों ने अल्लाह से आसमान से एक दावत उतारने की दुआ की। यह दावत उनके लिए एक निशानी थी। यह घटना ईसाई परंपरा के उस पवित्र भोज की याद दिलाती है, जिसे वे आज भी मानते हैं।
दिलचस्प बात यह है कि यहूदी और ईसाई परंपराएं यहां एक दूसरे से मिलती हैं। माना जाता है कि ईसा का आखिरी भोज भी पासओवर से जुड़ा हुआ था। यानी एक ही घटना अलग अलग रूपों में तीनों धर्मों में मौजूद है।
इसी बीच इस्लाम में जुमे का दिन खास अहमियत रखता है। इसे सबसे मुबारक दिन माना जाता है। हदीस के अनुसार, यही वह दिन है जब हज़रत आदम की पैदाइश हुई। इसी दिन उन्हें जन्नत में दाखिल किया गया और इसी दिन उन्हें जमीन पर भेजा गया।
जुमे के दिन की खास बात यह है कि इसमें इबादत का सवाब कई गुना बढ़ जाता है। इस दिन फज्र और जुमे की नमाज का खास महत्व है। मस्जिद में फज्र की नमाज अदा करना बहुत अफजल माना गया है।
जुमे की नमाज खुद में एक बड़ी इबादत है। माना जाता है कि जो शख्स इस दिन पाक होकर, खुशबू लगाकर और ध्यान से खुतबा सुनते हुए नमाज अदा करता है, उसके पिछले जुमे से अब तक के छोटे गुनाह माफ हो जाते हैं।
इस दिन का एक और खास पहलू है दुआ का कबूल होना। हदीस में बताया गया है कि जुमे के दिन एक खास वक्त होता है, जब की गई दुआ जरूर कबूल होती है। यह वक्त अक्सर असर और मगरिब के बीच माना जाता है।
जुमे का दिन दरूद भेजने के लिए भी खास माना गया है। मुसलमान इस दिन पैगंबर मुहम्मद पर ज्यादा से ज्यादा सलाम भेजते हैं। इसे एक बड़ी इबादत माना जाता है।
इसके अलावा सूरह कहफ की तिलावत का भी खास महत्व है। कहा जाता है कि जो शख्स जुमे के दिन इसे पढ़ता है, उसके लिए दो जुमों के बीच रोशनी पैदा कर दी जाती है।
इन तमाम बातों को देखने पर एक बात साफ होती है। चाहे पासओवर हो, होली वीक हो या जुमे का दिन, तीनों धर्म एक ही ईश्वर की इबादत की बात करते हैं। उनके तरीके अलग हो सकते हैं, लेकिन मूल भावना एक जैसी है।
आज के दौर में जब दुनिया कई तरह के मतभेदों से गुजर रही है, ऐसे समय में इन साझा परंपराओं को समझना और याद रखना बेहद जरूरी है। यह हमें जोड़ने का काम करती हैं, तोड़ने का नहीं।
यह समय सिर्फ धार्मिक अनुष्ठानों का नहीं है। यह आत्ममंथन का भी समय है। यह समझने का समय है कि हमारी जड़ें कितनी गहराई से एक दूसरे से जुड़ी हैं।
अगर हम इन साझा मूल्यों को अपनाएं, तो शायद दुनिया को एक बेहतर जगह बना सकते हैं। जहां धर्म दीवार नहीं, बल्कि पुल का काम करे।

