ईरान-अमेरिका दो हफ्ते युद्धविराम, होर्मुज़ खोलने पर बनी बड़ी सहमति
नई दिल्ली/तेहरान/वॉशिंगटन/इस्लामाबाद
मध्य पूर्व में जारी भीषण तनाव के बीच एक अहम कूटनीतिक मोड़ सामने आया है। ईरान और अमेरिका ने दो सप्ताह के अस्थायी युद्धविराम पर सहमति जताई है, जिसके तहत पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में शुक्रवार से औपचारिक वार्ता शुरू होगी। यह फैसला ऐसे समय में लिया गया, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर बड़े हमलों की अपनी समयसीमा समाप्त होने से लगभग दो घंटे पहले अचानक नरम रुख अपनाते हुए युद्धविराम के लिए सशर्त सहमति दे दी।
इस घटनाक्रम में पाकिस्तान की कूटनीतिक भूमिका बेहद अहम रही है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ ने अमेरिकी राष्ट्रपति से अपील की थी कि वे ईरान को दी गई समयसीमा में दो सप्ताह की बढ़ोतरी करें ताकि बातचीत का रास्ता खुल सके। साथ ही उन्होंने ईरान से भी आग्रह किया था कि वह होर्मुज़ जलडमरूमध्य को अस्थायी रूप से खोल दे, जिससे वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित न हो।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर घोषणा करते हुए कहा कि अमेरिका ईरान पर प्रस्तावित हमलों को दो सप्ताह के लिए स्थगित करने को तैयार है, बशर्ते तेहरान होर्मुज़ जलडमरूमध्य को “पूरी तरह, तुरंत और सुरक्षित रूप से” खोलने पर सहमत हो। यह जलमार्ग वैश्विक तेल आपूर्ति का एक प्रमुख केंद्र है, जहां से दुनिया के लगभग पांचवें हिस्से का तेल गुजरता है।
ट्रंप ने यह भी खुलासा किया कि ईरान की ओर से 10 बिंदुओं का एक प्रस्ताव मिला है, जिसे उन्होंने वार्ता के लिए “व्यवहार्य आधार” बताया। उनके अनुसार, अमेरिका और ईरान के बीच पहले से मौजूद कई विवादित मुद्दों पर सहमति बन चुकी है और आगामी दो सप्ताह का समय समझौते को अंतिम रूप देने के लिए महत्वपूर्ण होगा।
ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल ने भी इस युद्धविराम की पुष्टि करते हुए कहा कि यदि ईरान पर हमले रोके जाते हैं, तो उसकी सशस्त्र सेनाएं भी अपनी रक्षात्मक कार्रवाइयों को रोक देंगी। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा कि अगले दो सप्ताह तक होर्मुज़ जलडमरूमध्य से सुरक्षित आवागमन सुनिश्चित किया जाएगा, जो ईरानी सैन्य बलों के समन्वय के तहत संचालित होगा।
हालांकि, यह अभी स्पष्ट नहीं है कि ईरान इस अवधि में जलडमरूमध्य पर अपने नियंत्रण को किस हद तक ढीला करेगा। युद्ध के दौरान इस रणनीतिक मार्ग पर ईरान की पकड़ ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को झकझोर दिया है और तेल की कीमतों में अस्थिरता पैदा की है।
Statement on behalf of the Supreme National Security Council of the Islamic Republic of Iran: pic.twitter.com/cEtBNCLnWT
— Seyed Abbas Araghchi (@araghchi) April 7, 2026
इस युद्धविराम के पीछे पाकिस्तान के प्रयासों को व्यापक सराहना मिल रही है। प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ ने अपने संदेश में कहा कि मध्य पूर्व में जारी संघर्ष के शांतिपूर्ण समाधान के लिए कूटनीतिक प्रयास लगातार जारी हैं और उम्मीद है कि यह जल्द ही ठोस परिणाम देंगे। ईरान के विदेश मंत्री ने भी पाकिस्तान के नेतृत्व का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि इस संकट को कम करने में इस्लामाबाद की भूमिका सराहनीय है।
इस बीच, अमेरिकी प्रशासन के एक अधिकारी ने जानकारी दी कि अमेरिका ने ईरान के खिलाफ सभी आक्रामक सैन्य अभियानों को फिलहाल रोक दिया है, हालांकि रक्षात्मक कार्रवाई जारी रहेगी। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इज़राइल ने भी इस दो सप्ताह के युद्धविराम प्रस्ताव पर सहमति जताई है, हालांकि उसके भीतर कुछ वर्ग इस समझौते को लेकर पूरी तरह संतुष्ट नहीं हैं।
युद्धविराम की घोषणा के बावजूद क्षेत्र में तनाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, बहरीन, कुवैत और इज़राइल में मिसाइल अलर्ट जारी रहे, जिससे यह संकेत मिलता है कि हालात अभी भी संवेदनशील बने हुए हैं और किसी भी समय स्थिति फिर से बिगड़ सकती है।
ईरान ने युद्ध समाप्त करने के लिए कुछ प्रमुख मांगें भी रखी हैं, जिनमें होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर नियंत्रण बनाए रखना, क्षेत्र से अमेरिकी सैन्य बलों की वापसी, आर्थिक प्रतिबंधों को हटाना और ईरान की जमी हुई संपत्तियों को मुक्त करना शामिल है। इन मांगों को मध्य पूर्व की राजनीति और वैश्विक ऊर्जा संतुलन में बड़े बदलाव की दिशा में एक कदम माना जा रहा है।
इससे पहले, अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा था कि यदि तय समयसीमा तक समझौता नहीं हुआ, तो बड़े पैमाने पर हमले किए जाएंगे। उन्होंने यहां तक कहा था कि “एक पूरी सभ्यता समाप्त हो सकती है।” इन बयानों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता पैदा कर दी थी और कई देशों तथा संगठनों ने इसे खतरनाक और गैर-जिम्मेदाराना बताया था।
संयुक्त राष्ट्र, यूरोपीय देशों और कई अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों ने भी नागरिक ठिकानों जैसे पुल, बिजली संयंत्र और बुनियादी ढांचे पर हमले की धमकियों को अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताया। फ्रांस के विदेश मंत्री और वेटिकन से भी इस पर कड़ी प्रतिक्रिया सामने आई, जहां इसे संभावित युद्ध अपराध करार दिया गया।
ईरान के संयुक्त राष्ट्र प्रतिनिधि ने इन धमकियों को “युद्ध अपराध के लिए उकसावा” बताया और कहा कि यदि हमला किया गया, तो ईरान तत्काल और समानुपातिक जवाब देगा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि ईरान अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा के लिए हर संभव कदम उठाएगा।
फरवरी में शुरू हुए इस संघर्ष में अमेरिका और इज़राइल ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम और सैन्य ढांचे को निशाना बनाते हुए कई हमले किए थे। इसके जवाब में ईरान ने भी इज़राइल और खाड़ी देशों पर मिसाइल हमले किए, जिससे पूरे क्षेत्र में अस्थिरता फैल गई और वैश्विक स्तर पर आर्थिक व राजनीतिक झटके महसूस किए गए।
हालांकि, सैन्य शक्ति के मामले में ईरान अमेरिका और इज़राइल से कमजोर माना जाता है, लेकिन होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर उसका नियंत्रण उसे एक महत्वपूर्ण रणनीतिक बढ़त देता है। यही कारण है कि वैश्विक तेल आपूर्ति पर असर पड़ने से अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ता जा रहा है कि इस संघर्ष का जल्द समाधान निकाला जाए।
ईरान के भीतर भी हालात चिंताजनक हैं। आम नागरिकों में भय और अनिश्चितता का माहौल है। कई लोग बुनियादी सुविधाओं के बाधित होने को लेकर चिंतित हैं। एक स्थानीय नागरिक ने कहा कि यदि बिजली, पानी और इंटरनेट जैसी सुविधाएं बाधित होती हैं, तो देश गंभीर संकट में फंस सकता है।
Diplomatic efforts for peaceful settlement of the ongoing war in the Middle East are progressing steadily, strongly and powerfully with the potential to lead to substantive results in near future. To allow diplomacy to run its course, I earnestly request President Trump to extend…
— Shehbaz Sharif (@CMShehbaz) April 7, 2026
इस बीच, ईरान में कुछ स्थानों पर नागरिकों ने महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों की सुरक्षा के लिए मानव श्रृंखलाएं भी बनाई हैं, जो देश के भीतर बढ़ती चिंता और राष्ट्रवादी भावना को दर्शाती हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह दो सप्ताह का युद्धविराम बेहद महत्वपूर्ण है। यदि इस दौरान सकारात्मक और ठोस वार्ता होती है, तो यह मध्य पूर्व में स्थायी शांति की दिशा में एक बड़ा कदम साबित हो सकता है। हालांकि, अगर बातचीत विफल रहती है, तो यह संघर्ष और भी गंभीर रूप ले सकता है।
फिलहाल, पूरी दुनिया की नजरें इस्लामाबाद में होने वाली वार्ता पर टिकी हैं, जहां यह तय होगा कि यह अस्थायी राहत स्थायी समाधान में बदल पाएगी या नहीं।

