Politics

असम चुनाव 2026 : मुस्लिम राजनीति गरमाई, मदनी-अजमल-ओवैसी विवाद तेज

असम विधानसभा चुनाव के दौरान मुस्लिम राजनीति एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गई है। मौलाना महमूद मदनी, इत्र कारोबारी और राजनेता बदरुद्दीन अजमल तथा एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी के बीच बयानबाजी ने सियासी माहौल को गरमा दिया है। तीनों नेताओं के समर्थक सोशल मीडिया पर एक-दूसरे के खिलाफ खुलकर मोर्चा खोले हुए हैं और एक-दूसरे की राजनीतिक रणनीतियों और कमियों को उजागर करने में लगे हैं।

दिलचस्प बात यह है कि जो लोग पहले हेमंत बिस्वा सरमा द्वारा मदनी पर की गई आलोचना पर चुप्पी साधे हुए थे, वे अब सक्रिय होकर महमूद मदनी की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं और फैसलों पर सवाल उठा रहे हैं। इस पूरे विवाद का केंद्र बना है बदरुद्दीन अजमल और असदुद्दीन ओवैसी के बीच असम चुनाव में हुआ गठबंधन, जिस पर मदनी की ओर से आपत्ति जताई गई और अजमल को नोटिस तक भेज दिया गया।

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह विवाद केवल व्यक्तिगत नहीं बल्कि नेतृत्व और प्रभाव के दायरे को लेकर भी है। राजनीति का एक अनकहा नियम यह माना जाता है कि जो नेता जिस रास्ते से आगे बढ़ता है, वह नहीं चाहता कि उसी रास्ते से कोई और उसकी बराबरी करे। इसी संदर्भ में देखा जाए तो महमूद मदनी का राजनीतिक सफर और बदरुद्दीन अजमल की स्वतंत्र राजनीतिक पहचान के बीच तुलना की जा रही है।

महमूद मदनी जहां विभिन्न राजनीतिक समीकरणों और समर्थन के आधार पर राज्यसभा तक पहुंचे, वहीं उनके परिवार के अन्य सदस्य चुनावी राजनीति में अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर सके। इसके विपरीत बदरुद्दीन अजमल ने अपनी पार्टी बनाकर असम में मजबूत राजनीतिक आधार तैयार किया। उन्होंने अपने दम पर विधानसभा और लोकसभा चुनावों में उम्मीदवार उतारे और कई सीटों पर जीत दर्ज कर अपनी राजनीतिक ताकत साबित की।

अजमल की पहचान केवल एक राजनेता के रूप में ही नहीं, बल्कि एक सफल कारोबारी और समाजसेवी के रूप में भी है। इत्र के व्यवसाय से अर्जित संपत्ति का उपयोग उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में किया है। उनके द्वारा स्थापित संस्थानों में सभी धर्मों के छात्र मेडिकल, इंजीनियरिंग और अन्य पेशेवर कोर्स की पढ़ाई कर रहे हैं। इसी तरह असदुद्दीन ओवैसी भी शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में सक्रिय हैं। उनके द्वारा संचालित संस्थान वर्षों से समाज को सेवाएं दे रहे हैं, जिनकी नींव उनके पिता सुल्तान सलाहुद्दीन ओवैसी ने रखी थी।

ओवैसी की छवि एक पढ़े-लिखे, स्पष्टवादी और मजबूत वक्ता की है। वे अपने बयानों और मुद्दों को लेकर हमेशा मुखर रहते हैं। वहीं महमूद मदनी के संगठन और उनकी कार्यशैली को लेकर भी समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं, खासकर फंडिंग और संगठनात्मक गतिविधियों को लेकर।

इस पूरे विवाद का एक बड़ा पहलू यह भी है कि जब मुस्लिम नेता अपने दम पर या गठबंधन बनाकर चुनाव लड़ते हैं, तो तथाकथित सेक्युलर पार्टियों और उनके कुछ मुस्लिम नेताओं द्वारा उनकी आलोचना की जाती है। यह तर्क दिया जाता है कि इससे वोटों का बंटवारा होता है। हालांकि हकीकत यह भी है कि कई बार मुस्लिम नेतृत्व के अलग चुनाव लड़ने के बावजूद भाजपा को जीत मिलती रही है।

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि कुछ दल नहीं चाहते कि मुस्लिम समाज से स्वतंत्र नेतृत्व उभरे। वे चाहते हैं कि मुस्लिम नेता केवल उनके अधीन रहकर ही राजनीति करें, ताकि समय आने पर उन्हें नियंत्रित किया जा सके। यही कारण है कि जब भी कोई नेता स्वतंत्र पहचान बनाने की कोशिश करता है, तो उसे आलोचना का सामना करना पड़ता है।

हेमंत बिस्वा सरमा जैसे नेता, जिन्होंने अपनी राजनीतिक यात्रा कांग्रेस से शुरू की, आज भाजपा में रहकर बड़े हिंदुत्ववादी नेता के रूप में स्थापित हैं। यह भी दर्शाता है कि राजनीति में विचारधारा से ज्यादा रणनीति और अवसर महत्वपूर्ण होते हैं।

अंत में देखा जाए तो महमूद मदनी द्वारा बदरुद्दीन अजमल को नोटिस भेजना कई लोगों को एक अपरिपक्व कदम लगता है। अधिकांश लोगों का मानना है कि यह विवाद आपसी संवाद से सुलझाया जा सकता था। वहीं यह भी साफ है कि मुस्लिम राजनीति के भीतर नेतृत्व और प्रभाव को लेकर खींचतान जारी है, जो आने वाले समय में और तेज हो सकती है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *