सिनेमा के पर्दे पर ‘सांस्कृतिक युद्ध’: क्या ‘धुरंधर’ की सफलता के बहाने बॉलीवुड के खान सितारों को हाशिए पर धकेलने की है बड़ी साजिश?
Table of Contents
नई दिल्ली: विशेष रिपोर्ट
भारतीय सिनेमा जगत में इन दिनों केवल फिल्मों का कारोबार नहीं हो रहा, बल्कि परदे के पीछे एक गहरा ‘सांस्कृतिक युद्ध’ (Cultural War) छिड़ा हुआ है। हालिया ब्लॉकबस्टर फिल्म ‘धुरंधर’ की अभूतपूर्व सफलता ने जहां बॉक्स ऑफिस के रिकॉर्ड तोड़े हैं, वहीं एक नए और खतरनाक नैरेटिव को जन्म दे दिया है। वरिष्ठ फिल्म समीक्षकों और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह फिल्म केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि एक खास विचारधारा को स्थापित करने और बॉलीवुड के एक विशिष्ट वर्ग, विशेषकर ‘खान’ सितारों और मुस्लिम कलाकारों की साख को मिटाने की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है।
नया नैरेटिव: अंडरवर्ल्ड, पैसा और पहचान का संकट
सोशल मीडिया से लेकर यूट्यूब के गलियारों तक अब यह बात दबी जुबान में नहीं, बल्कि खुलेआम कही जा रही है कि बॉलीवुड पर पिछले तीन दशकों से जारी ‘खानों’ का राज अब खत्म होने की कगार पर है। ‘मनीष ठाकुर शो’ जैसे कई यूट्यूब चैनलों पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों में दावा किया जा रहा है कि 1947 से 1990 तक केवल दिलीप कुमार ही एकमात्र मुस्लिम सुपरस्टार थे, और वह भी इसलिए सफल हुए क्योंकि उन्होंने अपना नाम हिंदू रखा था।
इन मंचों पर तर्क दिया जा रहा है कि शाहरुख, सलमान और आमिर खान की सफलता के पीछे ‘अंडरवर्ल्ड’ का पैसा था। दलील यह दी जा रही है कि 2014 के बाद कोई नया मुस्लिम सुपरस्टार इसलिए नहीं उभरा क्योंकि अब फिल्मों में दाऊद जैसे गैंगस्टर्स का निवेश बंद हो गया है। इस तरह के दावों के जरिए न केवल इन सितारों की कड़ी मेहनत और टैलेंट का अपमान किया जा रहा है, बल्कि इसे ‘देशघाती साजिश’ करार दिया जा रहा है।
अपमानजनक भाषा और कानूनी दायरे की चुनौती
पत्रकारिता के गिरते स्तर का प्रमाण उन वीडियो में मिलता है जहां देश के सबसे बड़े वैश्विक सितारों के लिए ‘हकला’, ‘मुस्टंडा’ और ‘ठिगना’ जैसे अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया जा रहा है। सतीश चंद्र मिश्रा जैसे कुछ लोग इसे ‘मुस्लिम हीरो पैदा करने की साजिश’ बताते हुए जिस भाषा का उपयोग कर रहे हैं, वह न केवल मानहानि के दायरे में आती है, बल्कि सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने का भी काम कर रही है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह हमला केवल बॉलीवुड तक सीमित नहीं है। यह उस व्यापक रणनीति का हिस्सा है जिसके तहत उन सभी क्षेत्रों को निशाना बनाया जा रहा है जहां अल्पसंख्यकों ने अपनी पहचान बनाई है—चाहे वह कला हो, प्लंबर-नाई का काम हो या फिल्म जगत। मकसद साफ है: दर्शकों को हिंदू-मुसलमान में बांटना ताकि एक खास वर्ग की फिल्मों को हाशिए पर धकेला जा सके।
तथ्यों की कसौटी पर झूठ का मुल्लम
इस नैरेटिव को गढ़ने वाले यह भूल जाते हैं कि भारतीय सिनेमा का इतिहास प्रतिभा (Talent) से लिखा गया है, किसी संप्रदाय से नहीं। यह सरासर झूठ है कि आजादी के बाद दिलीप कुमार के अलावा कोई मुस्लिम स्टार नहीं बना। भारतीय सिनेमा के इतिहास के पन्नों को पलटें तो एक लंबी फेहरिस्त सामने आती है:
- दिलीप कुमार: उन्हें उनकी अदाकारी के लिए ‘ट्रैजेडी किंग’ कहा गया, नाम बदलने के कारण नहीं। उनके जैसा मेथड एक्टर आज तक पैदा नहीं हुआ।
- नसीरुद्दीन शाह और इरफ़ान खान: पैरेलल और मेनस्ट्रीम सिनेमा के ये दो ऐसे स्तंभ हैं, जिनकी बराबरी आज का कोई भी ‘नरेटिव स्टार’ नहीं कर सकता। ‘मासूम’, ‘ए वेडनसडे’ और ‘लाइफ ऑफ पाई’ जैसी फिल्में इनके टैलेंट की गवाह हैं।
- नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी: आज के दौर में नवाज़ुद्दीन ने अपने दम पर यह मुकाम हासिल किया है। ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ में उनकी सफलता के पीछे कौन सा दाऊद था?
- हास्य के उस्ताद: महमूद और जॉनी वॉकर (बदरुद्दीन काजी) जैसे कलाकारों ने जो मुकाम हासिल किया, वह किसी भी सुपरस्टार से बड़ा था।
- खलनायक और स्टाइल आइकन: अजीत (हामिद अली खान) और फिरोज़ खान ने अपनी एक अलग शैली विकसित की, जिसे आज भी कॉपी किया जाता है। अमजद खान का ‘गब्बर सिंह’ किरदार आज भी भारतीय सिनेमा का सबसे बड़ा मील का पत्थर है।
इसके अलावा सैफ अली खान, फरहान अख्तर, अरशद वारसी और फारुख शेख जैसे अनगिनत नाम हैं जिन्होंने अपने काम के दम पर जनता का दिल जीता है।
रणवीर सिंह बनाम खान तिकड़ी: वास्तविकता का धरातल
फिल्म ‘धुरंधर’ में रणवीर सिंह के काम की सराहना हो सकती है, लेकिन क्या दो-चार सरकारी प्रोपेगेंडा आधारित फिल्में करने से कोई शाहरुख, सलमान या आमिर बन सकता है? शाहरुख खान की वैश्विक लोकप्रियता और आमिर खान की सिनेमाई समझ रातों-रात या किसी के निवेश से नहीं बनी है।
आज भी टीवी सीरियल्स और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर मुस्लिम कलाकारों की भरमार है। वहां उन्हें कौन सा अंडरवर्ल्ड बढ़ावा दे रहा है? सच्चाई यह है कि टैलेंट को किसी सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता। रणवीर सिंह को भी यह समझना होगा कि ‘धुरंधर’ जैसे नैरेटिव वाली फिल्मों से वे कुछ समय के लिए तालियां तो बटोर सकते हैं, लेकिन वास्तविक सुपरस्टार वही होता है जो हर वर्ग के दर्शकों को साथ लेकर चले।
निष्कर्ष: जनता की अदालत और भविष्य का सिनेमा
भारत की जनता समझदार है। वह सिनेमा हॉल में एंटरटेनमेंट और टैलेंट देखने जाती है, मजहब नहीं। फिल्मों को हिंदू-मुस्लिम के चश्मे से देखने की यह कोशिश केवल बॉलीवुड को कमजोर करेगी। नफरत के बाजार में फिल्में भले ही कुछ करोड़ कमा लें, लेकिन वे ‘क्लासिक’ का दर्जा कभी हासिल नहीं कर पाएंगी।
बॉलीवुड का भविष्य नफरत फैलाने वाले यूट्यूब चैनलों से नहीं, बल्कि उस रचनात्मकता से तय होगा जिसने पूरी दुनिया में भारत का मान बढ़ाया है। यह समय बॉलीवुड के उन लोगों के लिए भी आत्ममंथन का है जो केवल सफल लहर के साथ बहने के लिए अपनी कला का सौदा कर रहे हैं।

संपादकीय टिप्पणी: यह रिपोर्ट उन प्रवृत्तियों की ओर इशारा करती है जो देश की सॉफ्ट पावर (सिनेमा) को नष्ट करने पर तुली हैं। तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करना पत्रकारिता नहीं, प्रोपेगेंडा है। भारतीय सिनेमा की खूबसूरती उसकी विविधता में है, और इसे बचाए रखना हर भारतीय का कर्तव्य है।

