हॉर्मुज तनाव से तेल महंगा, बांग्लादेश ने बढ़ाई आपूर्ति
नई दिल्ली/ढाका/न्यूयॉर्क
दुनिया एक बार फिर तेल संकट के किनारे खड़ी है। Strait of Hormuz में बढ़े तनाव ने बाजार को हिला दिया है। अमेरिका और ईरान के टकराव ने तेल टैंकरों की आवाजाही रोक दी है। असर सीधा कीमतों पर दिख रहा है।
रविवार को जैसे ही ट्रेडिंग खुली, कच्चे तेल के दाम उछल गए। अमेरिकी क्रूड करीब 6.4 प्रतिशत बढ़कर 87.88 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गया। वहीं ब्रेंट क्रूड 6.5 प्रतिशत चढ़कर 96.25 डॉलर प्रति बैरल हो गया। यह तेजी अचानक आई। वजह साफ है। आपूर्ति पर खतरा।
यह वही समुद्री रास्ता है जहां से दुनिया का बड़ा हिस्सा तेल गुजरता है। एशिया और यूरोप खास तौर पर इस पर निर्भर हैं। ऐसे में थोड़ी सी रुकावट भी बड़ा असर डालती है।
पिछले दो दिनों में हालात तेजी से बदले। पहले उम्मीद जगी कि रास्ता खुलेगा। ईरान ने संकेत दिया कि वह अपने तट के पास आवाजाही बहाल करेगा। खबर आते ही कीमतें गिर गईं। करीब 9 प्रतिशत तक की गिरावट देखी गई। बाजार ने राहत की सांस ली।
लेकिन राहत ज्यादा देर नहीं टिक सकी।
अगले ही दिन Donald Trump ने साफ कहा कि अमेरिकी नौसेना की नाकेबंदी जारी रहेगी। इसके बाद तेहरान ने अपना रुख बदल दिया। तनाव फिर बढ़ गया। रिपोर्ट्स के मुताबिक ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड ने कुछ जहाजों पर फायरिंग भी की। एक ईरानी झंडे वाले जहाज को अमेरिका ने जब्त करने की बात कही।
यह टकराव अब आठवें हफ्ते में है। United States और Iran के बीच चल रही इस लड़ाई ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को झकझोर दिया है। Israel की भागीदारी ने हालात और जटिल कर दिए हैं।
युद्ध से पहले तेल करीब 70 डॉलर प्रति बैरल के आसपास था। संघर्ष के दौरान यह 119 डॉलर तक भी पहुंचा। अब फिर तेजी दिख रही है। उतार चढ़ाव जारी है। विश्लेषकों का कहना है कि जब तक हॉर्मुज खुलकर सामान्य नहीं होता, तब तक स्थिरता मुश्किल है।
ऊर्जा विशेषज्ञ मानते हैं कि संकट लंबा चला तो कीमतें और बढ़ सकती हैं। टैंकर फंसे हुए हैं। बीमा लागत बढ़ रही है। जहाज मालिक जोखिम लेने से बच रहे हैं। कई तेल सुविधाएं भी प्रभावित हुई हैं। इन सबका असर सप्लाई चेन पर पड़ेगा।
अमेरिका में भी असर दिख रहा है। पेट्रोल की औसत कीमत करीब 4.05 डॉलर प्रति गैलन पहुंच गई है। यह एक हफ्ते पहले से थोड़ी कम जरूर है, लेकिन युद्ध से पहले के स्तर से काफी ज्यादा है। अमेरिकी ऊर्जा सचिव क्रिस राइट ने संकेत दिया है कि राहत जल्दी नहीं मिलेगी। उनके मुताबिक कीमतें अगले साल तक ही साफ तौर पर नीचे आ सकती हैं।
इस बीच एशिया के देशों ने अपने स्तर पर कदम उठाने शुरू कर दिए हैं।
Bangladesh Petroleum Corporation ने ईंधन आपूर्ति बढ़ाने का फैसला किया है। ढाका से जारी बयान में कहा गया कि बढ़ती मांग को देखते हुए यह कदम जरूरी है। सोमवार से ऑक्टेन की आपूर्ति में 20 प्रतिशत और पेट्रोल व डीजल में 10 प्रतिशत बढ़ोतरी की जा रही है।
बीपीसी ने डीलरों और उपभोक्ताओं के लिए निर्देश भी जारी किए हैं। कंपनियों से कहा गया है कि वे बढ़ी हुई दरों पर ईंधन की बिक्री सुनिश्चित करें। मकसद साफ है। बाजार में कमी न हो। घबराहट न फैले।
नए आंकड़ों के मुताबिक रोजाना 13,048 मीट्रिक टन डीजल, 1,511 मीट्रिक टन पेट्रोल और 1,422 मीट्रिक टन ऑक्टेन की आपूर्ति की जाएगी। यह कदम ऐसे समय पर आया है जब क्षेत्र में अनिश्चितता बढ़ रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि बांग्लादेश का यह फैसला एहतियाती है। अगर वैश्विक सप्लाई और बिगड़ी तो घरेलू बाजार पर दबाव बढ़ सकता है। पहले से तैयारी करना जरूरी है।
यूरोप और एशिया के कई देश भी वैकल्पिक स्रोत तलाश रहे हैं। लेकिन तुरंत विकल्प मिलना आसान नहीं है। मध्य पूर्व का तेल अभी भी सबसे अहम है। खासकर हॉर्मुज जैसे रास्तों के कारण।
एक और चिंता बनी हुई है। दो हफ्ते का युद्धविराम जल्द खत्म होने वाला है। अगर नई बातचीत नहीं होती, तो टकराव और बढ़ सकता है। इससे बाजार में और उथल पुथल आएगी।
विश्लेषकों का कहना है कि अगर कल ही कोई समझौता हो जाए, तब भी हालात सामान्य होने में समय लगेगा। टैंकरों की लंबी कतार है। कई जहाज रास्ता बदल चुके हैं। इंफ्रास्ट्रक्चर को भी नुकसान हुआ है। सप्लाई तुरंत पहले जैसी नहीं होगी।
इस पूरे संकट ने एक बार फिर दुनिया को याद दिलाया है कि ऊर्जा सुरक्षा कितनी जरूरी है। एक छोटा सा समुद्री रास्ता भी वैश्विक अर्थव्यवस्था को हिला सकता है।
फिलहाल नजरें हॉर्मुज पर टिकी हैं। अगर रास्ता खुलता है तो राहत मिल सकती है। अगर नहीं, तो महंगाई की नई लहर दुनिया के सामने खड़ी है।

