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एएमयू: अरबी, उर्दू और फारसी के साझा साहित्यिक विरासत पर मंथन

अलीगढ़

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) का अरबी विभाग एक बार फिर बौद्धिक विमर्श का केंद्र बना। विभाग के छात्र संगठनों ‘अल-नदी अल-अरबी’ और ‘मुंतदा अल-बाहिथीन’ के तत्वावधान में आयोजित एक विशेष शैक्षणिक सत्र में अरबी, उर्दू और फारसी साहित्यों के अंतर्संबंधों और उनकी साझा विरासत पर गहरा प्रकाश डाला गया।

इस गरिमामयी कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में उर्दू विभाग के पूर्व प्रोफेसर और विख्यात आलोचक व सौंदर्यशास्त्री प्रोफेसर काजी जमाल हुसैन उपस्थित रहे।


साहित्यिक अभिरुचि ही अध्ययन का वास्तविक उद्देश्य

अपने प्रभावशाली व्याख्यान में प्रोफेसर काजी जमाल हुसैन ने छात्रों को केवल किताबी ज्ञान तक सीमित न रहकर एक ‘परिष्कृत साहित्यिक समझ’ (Refined Literary Taste) विकसित करने की सलाह दी। उन्होंने जोर देकर कहा कि शास्त्रीय कृतियों (Classical Works) की बारीकियों को समझना ही साहित्य के अध्ययन का असली मकसद है।

व्याख्यान के मुख्य बिंदु:

  • अरबी की प्राचीनता: उन्होंने अरबी को दुनिया की सबसे पुरानी और प्रभावशाली भाषाओं में से एक बताया और इसकी समृद्ध विरासत को सहेजने पर बल दिया।
  • सौंदर्यशास्त्र के आयाम: पूर्व-इस्लामिक और शास्त्रीय अरबी कविता के उदाहरणों के माध्यम से उन्होंने साहित्यिक सौंदर्यशास्त्र के विभिन्न पहलुओं को समझाया।
  • तुलनात्मक अध्ययन: प्रोफेसर हुसैन ने छात्रों को केवल एक भाषा तक सीमित न रहने की सलाह दी। उन्होंने छात्रों से उर्दू और फारसी साहित्य के साथ तुलनात्मक अध्ययन करने का आह्वान किया।

मीर से रूमी तक: शब्दों का सफर

साहित्य की गहराई को समझाते हुए प्रोफेसर हुसैन ने मीर तकी मीर, मिर्जा गालिब, जिगर मुरादाबादी जैसे उर्दू कवियों और रूमी, सादी तथा अम्रुल कैस जैसे महान अरबी व फारसी साहित्यकारों के छंदों का हवाला दिया। उन्होंने विस्तार से समझाया कि कैसे समय के साथ शब्दों के अर्थ विकसित होते हैं या बदल जाते हैं।


विरासत और भविष्य का संगम

इससे पहले, अरबी विभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर मोहम्मद फैजान बेग ने मुख्य अतिथि का स्वागत किया। उन्होंने विभाग के गौरवशाली इतिहास को याद करते हुए बताया कि स्थापना काल से ही यह विभाग विश्वविद्यालय की शैक्षणिक प्रगति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

समारोह की रूपरेखा:

  • संचालन: ‘अल-नदी अल-अरबी’ के सचिव खालिद सैफुल्लाह ने मंच का कुशलतापूर्वक संचालन किया।
  • उद्देश्य: ‘मुंतदा अल-बाहिथीन’ के अध्यक्ष मोहम्मद शाहिद ने कार्यक्रम के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए शोध की बारीकियों को साझा किया।
  • धन्यवाद ज्ञापन: कार्यक्रम का समापन डॉ. अहसानुल्लाह खान के धन्यवाद प्रस्ताव के साथ हुआ।

भाषाई सीमाओं से परे साहित्य

यह आयोजन इस बात का प्रमाण है कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय आज भी अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ है। अरबी, फारसी और उर्दू केवल भाषाएं नहीं हैं, बल्कि एक ऐसी संस्कृति का हिस्सा हैं जिन्होंने सदियों से भारतीय उपमहाद्वीप के बौद्धिक धरातल को सींचा है। इस तरह के कार्यक्रम छात्रों को अपनी जड़ों को समझने और वैश्विक साहित्य के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने की प्रेरणा देते हैं।

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