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जमाअत-ए-इस्लामी हिंद ने जताई चिंता: नफरत की राजनीति और वैश्विक युद्ध पर प्रस्ताव पारित

नई दिल्ली

देश की प्रमुख सामाजिक और धार्मिक संस्था जमाअत-ए-इस्लामी हिंद ने भारत की आंतरिक स्थिति और वैश्विक घटनाक्रमों पर गहरा दुख व्यक्त किया है। दिल्ली स्थित मुख्यालय में संस्था की केंद्रीय सलाहकार परिषद (मरकज़ी मजलिस-ए-शूरा) का तीन दिवसीय सम्मेलन आयोजित किया गया। इस बैठक में वर्तमान दौर की चुनौतियों को लेकर दो महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किए गए। परिषद ने साफ तौर पर कहा कि नफरती नैरेटिव और वैश्विक आक्रामकता मानवता के लिए बड़ा खतरा बन गए हैं।

संस्था ने अपने पहले प्रस्ताव में मध्य पूर्व के हालात पर कड़ा रुख अपनाया है। जमाअत का मानना है कि अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान और लेबनान पर किए गए हमले पूरी तरह अनुचित हैं। परिषद ने कहा कि यह अंतर्राष्ट्रीय कानूनों का खुला उल्लंघन है। जिस तरह से स्कूलों, अस्पतालों और मासूम बच्चों को निशाना बनाया गया उसने दुनिया की अंतरात्मा को झकझोर कर रख दिया है। प्रस्ताव में आरोप लगाया गया कि ये कार्रवाइयाँ केवल युद्ध नहीं बल्कि मध्य पूर्व को अस्थिर रखने की एक सुनियोजित साजिश हैं। यह इज़राइली विस्तारवाद के एजेंडे को मज़बूत करने का प्रयास है।

जमाअत ने अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से अपील की है कि वह मूकदर्शक न बने। दुनिया की ताकतों को ऐसी आक्रामकता रोकने के लिए निष्पक्ष भूमिका निभानी चाहिए। हालांकि अमेरिका और ईरान के बीच हालिया बातचीत का कोई तत्काल नतीजा नहीं निकला लेकिन संस्था ने इसे एक सकारात्मक कदम बताया। प्रस्ताव में कहा गया कि बातचीत ही गतिरोध तोड़ने का एकमात्र रास्ता है। युद्ध कभी किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता। शांति का मार्ग केवल संवाद से ही प्रशस्त होता है।

देश की आंतरिक स्थिति पर परिषद का दूसरा प्रस्ताव काफी गंभीर है। जमाअत ने भारत के भीतर बढ़ती राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों पर चिंता जताई है। संस्था ने कहा कि सत्ता हासिल करने के लिए नफरती भाषणों और समाज को बांटने वाले नैरेटिव का सहारा लिया जा रहा है। हाल ही में असम और पश्चिम बंगाल के चुनावों में यह रुझान प्रमुखता से देखा गया। परिषद के अनुसार यह देश के लोकतांत्रिक भविष्य के लिए एक खतरनाक संकेत है। समाज का बंटवारा भारत के धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक ढांचे पर सीधा हमला है। इसके परिणाम राष्ट्र के लिए बहुत हानिकारक हो सकते हैं।

संस्था ने संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता पर भी सवाल उठाए हैं। प्रस्ताव में कहा गया कि विशिष्ट राजनीतिक उद्देश्यों के लिए सरकारी संस्थाओं का उपयोग बढ़ रहा है। इससे जनता का विश्वास इन संस्थाओं से कम होता जा रहा है। मतदाता सूचियों के ‘विशेष गहन संशोधन’ (SIR) प्रक्रिया में मिली अनियमितताओं पर भी गहरा असंतोष व्यक्त किया गया। जमाअत का आरोप है कि लाखों नागरिकों, विशेषकर मुसलमानों और हाशिए पर पड़े समूहों को मतदाता सूची से बाहर करने का सुनियोजित प्रयास हुआ है। यह समाज के एक बड़े वर्ग की राजनीतिक आवाज़ को दबाने का एजेंडा लगता है।

परिषद ने अपने निष्कर्ष में न्याय-प्रिय समूहों और बुद्धिजीवियों की सराहना की है। संस्था ने कहा कि देश में अभी भी ऐसी ताकतें मौजूद हैं जो संविधान की रक्षा के लिए लड़ रही हैं। भारत सरकार को अपना नजरिया बदलने की जरूरत है। सरकार को ईंधन की कमी, महंगाई और बेरोज़गारी जैसे बुनियादी मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए। जनता को भी जागरूक होने का आह्वान किया गया है ताकि वे सत्ता से शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे असल मुद्दों पर जवाब मांग सकें।

मुसलमानों को सलाह देते हुए जमाअत ने कहा कि उन्हें नकारात्मक प्रतिक्रियाओं से बचना चाहिए। भावनात्मक राजनीति के बजाय शिक्षा और क्षमता-निर्माण पर ध्यान देना जरूरी है। संस्था ने साथी नागरिकों के साथ संबंध मज़बूत करने और संवाद का माहौल बनाने पर ज़ोर दिया। परिषद का मानना है कि इन प्रयासों से ही देश में न्याय, सामाजिक समानता और भाईचारा फिर से सुदृढ़ हो सकेगा। सम्मेलन में दोहराया गया कि समाज के सभी वर्गों का विकास ही राष्ट्र की असली प्रगति है।