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वीसी का विवादास्पद बयान: संस्थान की गरिमा और वैचारिक राजनीति

दिल्ली की एक चर्चित यूनिवर्सिटी महज एक ईंट-पत्थर की इमारत नहीं है, बल्कि यह उस साझी विरासत और जद्दोजहद का प्रतीक है जिसे स्वतंत्रता सेनानियों ने अपने खून-पसीने से सींचा था। लेकिन हाल के दिनों में इस प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर (कुलपति) ने अपने एक सार्वजनिक बयान से न केवल विवाद खड़ा कर दिया है, बल्कि संस्थान की गरिमा को भी दांव पर लगा दिया है। जब कोई व्यक्ति अपनी योग्यता से अधिक पद पा लेता है, तो वह अक्सर उन शक्तियों की कठपुतली बन जाता है जिन्होंने उसे वह कुर्सी सौंपी होती है। जामिया के वर्तमान कुलपति के साथ भी कुछ ऐसा ही होता प्रतीत हो रहा है।

विवाद की जड़: ‘महादेव का डीएनए’

हाल ही में विश्वविद्यालय परिसर में एक संगठन द्वारा आयोजित कार्यक्रम में कुलपति ने खुद के भीतर ‘महादेव का डीएनए’ होने की बात कही। यह बयान केवल धार्मिक अस्मिता तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके गहरे राजनीतिक निहितार्थ हैं। जिस संगठन ने इस कार्यक्रम का आयोजन किया था, उसका इतिहास और उसकी विचारधारा हमेशा से विवादों के घेरे में रही है। उस पर स्वतंत्रता संग्राम से दूरी बनाए रखने और दशकों तक राष्ट्रीय ध्वज का सम्मान न करने जैसे गंभीर आरोप लगते रहे हैं। ऐसे में एक मुस्लिम बहुल शिक्षण संस्थान के मुखिया का उस मंच से इस तरह की बात करना, चाटुकारिता की पराकाष्ठा प्रतीत होता है।

फूट डालो और राज करो की नई रणनीति

यह कोई छिपी हुई बात नहीं है कि पिछले कुछ वर्षों से देश के सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करने के लिए एक ‘सांस्कृतिक युद्ध’ छेड़ा गया है। इस रणनीति का एक मुख्य हिस्सा है-मुसलमानों को आपस में ही लड़ा देना। कभी अशराफ-पसमांदा के नाम पर, तो कभी सूफी-हनफी या शिया-सुन्नी के नाम पर विभाजन की लकीरें गहरी की जा रही हैं।

दिल्ली की चर्चित यूनिवर्सिटी में वर्तमान में जो बवाल मचा है, वह भी इसी रणनीति का हिस्सा जान पड़ता है। गौर करने वाली बात यह है कि कुलपति एक मुसलमान हैं और उनका विरोध करने वाले भी मुसलमान हैं। विरोध करने वाले वे छात्र और शिक्षक हैं जो यूनिवर्सिटीया की उस लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष छवि को बचाने की कोशिश कर रहे हैं जिसे इसके संस्थापकों ने गढ़ा था। जब एक ‘नाकाबिल मोहरा’ ऐसे संवेदनशील पद पर बैठता है, तो वह अनजाने में (या जानबूझकर) उसी फूट डालो और राज करो की नीति को खाद-पानी देने लगता है।

योग्यता बनाम चाटुकारिता

यूनिवर्सिटी का इतिहास शानदार रहा है। यहाँ महान शिक्षाविद् और रौबिले व्यक्तित्व आसीन रहे हैं। लेकिन वर्तमान कुलपति के भाषणों और कार्यशैली को देखकर सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि क्या वे वास्तव में इस गौरवशाली संस्थान के नेतृत्व के योग्य हैं? या फिर उन्हें केवल एक विशेष एजेंडे को लागू करने के लिए ‘प्लांट’ किया गया है?

सोशल मीडिया पर उनकी ट्रोलिंग और राम पुनियानी जैसे बुद्धिजीवियों द्वारा उठाए जा रहे सवाल यह दर्शाते हैं कि समाज का एक बड़ा वर्ग इस व्यवहार को स्वीकार नहीं कर पा रहा है। चाटुकारिता की अपनी एक सीमा होती है, लेकिन जब कोई शिक्षा का रक्षक ही तर्क और विवेक को छोड़कर ऐसी बातें करने लगे, तो वह हास्यास्पद और चिंतनीय दोनों हो जाता है।

धार्मिक संवेदनशीलता और दोहरा संकट

कुलपति का यह दावा कि वे ‘हिंदू भगवान के वंशज’ हैं, उन्हें दोनों तरफ से मुश्किल में डाल सकता है। एक तरफ मुस्लिम समुदाय इसे अपनी पहचान और धार्मिक मान्यताओं के विरुद्ध देख रहा है, वहीं दूसरी ओर कट्टरपंथी हिंदू संगठन भी इसे सहजता से नहीं लेंगे। इतिहास गवाह है कि वसीम रिज़वी जैसे लोगों ने जब इस्लाम छोड़कर हिंदू धर्म अपनाया, तब भी उन्हें उस गहराई से स्वीकार नहीं किया गया जिसकी उन्होंने अपेक्षा की थी। ऐसे में, एक मुसलमान द्वारा हिंदू देवता का डीएनए खुद में बताना, धार्मिक भावनाओं के साथ खिलवाड़ जैसा है। क्या वह समाज, जो शुद्धतावाद में विश्वास रखता है, इस दावे को बर्दाश्त करेगा?
खामोशी के मायने

इतना बड़ा बवाल मचने और छात्रों के आंदोलनों के बावजूद कुलपति की ओर से अब तक कोई आधिकारिक सफाई नहीं आई है। यह चुप्पी और भी घातक है। जब तक कुलपति अपनी स्थिति स्पष्ट नहीं करते, तब तक कयासों का बाजार गर्म रहेगा और यूनिवर्सिटी जैसी संस्था की साख गिरती रहेगी।

एक कुलपति का दायित्व अपने छात्रों को सही दिशा देना और संस्थान की अकादमिक उत्कृष्टता को बनाए रखना होता है, न कि राजनीतिक आकाओं को खुश करने के लिए विवादास्पद बयानबाजी करना। यदि वे अपनी बात पर अडिग हैं, तो उन्हें तथ्यों के साथ सामने आना चाहिए, और यदि यह केवल एक फिसली हुई जुबान थी, तो माफी माँगने में कोई बुराई नहीं है।

दिल्ली की एक चर्चित यूनिवर्सिटी आज एक चौराहे पर खड़ी है। एक तरफ उसका गौरवशाली अतीत है और दूसरी तरफ वर्तमान नेतृत्व की वैचारिक अस्थिरता। यह समय केवल एक व्यक्ति के विरोध का नहीं है, बल्कि उस सोच के विरुद्ध खड़े होने का है जो शिक्षण संस्थानों को राजनीतिक प्रयोगशाला बनाना चाहती है। जब तक कुलपति जैसे पदों पर बैठे लोग ‘कठपुतली’ बने रहेंगे, तब तक भारतीय शिक्षा व्यवस्था और सामाजिक सद्भाव दोनों ही खतरे में रहेंगे।