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भारतीय सियासत का नया मोड़: हाशिए पर मुसलमान और बदलाव की छटपटाहट

 संपादकीय

भारतीय राजनीति के वर्तमान परिदृश्य में एक बड़ा वैचारिक बदलाव महसूस किया जा रहा है। हालिया चुनाव परिणामों और राजनीतिक विश्लेषकों की टिप्पणियों ने एक कड़वा लेकिन जरूरी सवाल खड़ा कर दिया है: क्या भारतीय लोकतंत्र में मुस्लिम मतदाताओं की भूमिका अब केवल एक ‘सांख्यिकीय आंकड़ा’ बनकर रह गई है? पश्चिम बंगाल से लेकर असम तक और उत्तर प्रदेश से लेकर दक्षिण भारत की गलियारों तक, यह चर्चा आम है कि क्या मुस्लिम वोट अब किसी दल की जीत की ‘गारंटी’ नहीं रहे। अमर उजाला के हालिया पॉडकास्ट में एक वरिष्ठ पत्रकार की यह टिप्पणी कि “मुस्लिम मतदाता अब जीत की कुंजी नहीं रहे,” इसी बदलती हकीकत की ओर इशारा करती है।

परिसीमन का खेल और घटता प्रतिनिधित्व

इस विमर्श को समझने के लिए असम के उदाहरण को देखना आवश्यक है। गुवाहाटी विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के प्रोफेसर राजीब हांडिके का विश्लेषण महत्वपूर्ण है। 2023 में चुनाव आयोग द्वारा 2001 की जनगणना के आधार पर किया गया परिसीमन केवल सीमाओं का पुनर्निर्धारण नहीं था, बल्कि इसने राजनीतिक शक्ति के संतुलन को ही बदल दिया। हालांकि कुल सीटें 126 ही रहीं, लेकिन जिस तरह से ‘स्वदेशी’ समुदायों के लिए सुरक्षित सीटों में वृद्धि हुई और मुस्लिम बहुल क्षेत्रों की अहमियत कम हुई, उसने अल्पसंख्यकों को राजनीतिक मुख्यधारा से और दूर धकेल दिया है। यह रणनीति केवल एक राज्य तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के बड़े हिस्से में ‘हाशिए की राजनीति’ का एक नया मॉडल बन चुकी है।

सत्ता का शिखर और उम्र का तकाजा

पिछले पंद्रह वर्षों से देश की राजनीति पर काबिज मौजूदा सत्ताधारी दल की सफलता का आधार केवल नीतियां नहीं, बल्कि एक खास किस्म की चुनावी इंजीनियरिंग रही है। आलोचक इसे ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति का आधुनिक संस्करण मानते हैं। लेकिन, राजनीति में कुछ भी स्थायी नहीं होता। आज जो रणनीतिकार और सलाहकार सत्ता के केंद्र में हैं, वे अगले पांच से सात सालों में उम्र के उस पड़ाव पर होंगे जहाँ से सक्रिय राजनीति में बने रहना कठिन होगा।

यही स्थिति विपक्ष की भी है। कांग्रेस से लेकर वामपंथियों और क्षेत्रीय दलों तक, बुजुर्ग नेतृत्व ने युवाओं के लिए रास्ते बंद कर रखे हैं। सत्ताधारी दल में भी तीन-चार चेहरों के अलावा कोई सशक्त विकल्प नजर नहीं आता। यह ‘नेतृत्व का शून्य’ आने वाले समय में एक बड़े राजनीतिक विस्फोट का संकेत है।

युवा शक्ति और नई उम्मीद: ‘जेन-जी’ का नजरिया

भविष्य की राजनीति अब उन युवाओं के हाथ में है जो देवी-देवताओं या कट्टरता के नाम पर वोट देने के बजाय बेहतर जीवन, नौकरी और शिक्षा को प्राथमिकता देते हैं। दक्षिण भारत में विजय (थलपति विजय) जैसे युवा चेहरों का उभरना और बिना किसी धार्मिक सहारे के जनमानस पर छा जाना एक नई इबारत लिख रहा है। वहीं, पवन कल्याण जैसे नेताओं को लगता है कि वर्तमान ‘धार्मिक लहर’ ही सत्ता की सीढ़ी है, लेकिन शिक्षित युवा वर्ग जिसे हम ‘जेन-जी’ कहते हैं, वह ऐसी राजनीति को सिरे से नकार रहा है।

श्रीलंका, नेपाल और बांग्लादेश के हालिया घटनाक्रम हमारे सामने हैं। जब सत्ता तंत्र और संस्थाओं का अत्यधिक दुरुपयोग होता है, तो जनता का सब्र टूटता है और वह व्यवस्था परिवर्तन के लिए सड़कों पर उतर आती है। भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में किसी एक समुदाय को पूरी तरह शून्य कर देना लंबे समय तक मुमकिन नहीं है।

मुस्लिम संगठनों को आत्ममंथन की जरूरत

सिर्फ राजनीतिक दलों को कोसने से काम नहीं चलेगा। मुस्लिम संगठनों को भी यह समझना होगा कि उनके नेतृत्व में भी वही ‘पुराना खून’ दौड़ रहा है जो आधुनिक चुनौतियों को समझने में नाकाम है। उन्हें अपने संगठनों में युवाओं और नई सोच को जगह देनी होगी। ‘वोट बैंक’ की पहचान से बाहर निकलकर ‘सक्रिय नागरिक’ के रूप में अपनी भूमिका गढ़नी होगी।

जो लोग यह मान रहे हैं कि मुस्लिम वोट की अहमियत खत्म हो गई है, वे जल्दबाजी में हैं। चुनावी धांधलियाँ और ध्रुवीकरण की राजनीति की एक ‘एक्सपायरी डेट’ होती है। इतिहास गवाह है कि वामपंथियों का अभेद्य किला गिरा और कांग्रेस का वर्चस्व भी टूटा। नीतीश कुमार जैसे कद्दावर नेता भी आज हाशिए पर हैं।

भविष्य की राजनीति और नया खाका

अगले दस साल भारतीय राजनीति के लिए ‘संक्रमण काल’ की तरह होंगे। यदि मुस्लिम समुदाय और विपक्षी दल नई ऊर्जा और नई रणनीति के साथ आगे नहीं बढ़े, तो वे और भी गहरे संकट में घिर सकते हैं। मौका अभी हाथ से निकला नहीं है। भविष्य की राजनीति वही जीतेगा जो ‘बंटवारे’ के बजाय ‘बदलाव’ और ‘विकास’ की भाषा बोलेगा।

मंथन इस बात पर होना चाहिए कि क्या हम एक ऐसे भारत की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ लोकतंत्र का मतलब केवल बहुमत की तानाशाही है, या हम फिर से उस समावेशी राजनीति की ओर लौटेंगे जहाँ हर नागरिक की अहमियत उसके धर्म से नहीं, बल्कि उसकी सहभागिता से तय होगी? नई सियासत गढ़ने का वक्त अब आ गया है।


संपादकीय टिप्पणी: यह लेख वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों और भविष्य के संभावित बदलावों का एक विश्लेषण है, जो समाज के हर वर्ग को सोचने पर मजबूर करता है।