सऊदी का ईरान पर गुप्त हमला: पश्चिम एशिया में बड़ा सैन्य खुलासा
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रियाद/तेहरान
पश्चिम एशिया की भू-राजनीति में एक ऐसा भूचाल आया है जिसने आधुनिक इतिहास के समीकरणों को पलट कर रख दिया है। एक सनसनीखेज खुलासे में यह बात सामने आई है कि सऊदी अरब की वायुसेना ने मार्च के अंत में ईरान की सीमाओं के भीतर घुसकर कई ‘गुप्त हमले’ (Covert Strikes) किए थे। समाचार एजेंसी रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, यह इतिहास में पहली बार है जब सऊदी अरब ने सीधे तौर पर ईरानी धरती को निशाना बनाया है।
यह खुलासा न केवल सऊदी अरब की बदलती सैन्य नीति को दर्शाता है, बल्कि यह भी बताता है कि खाड़ी क्षेत्र में तनाव किस कदर ‘आर-पार’ की जंग में तब्दील हो चुका था।
मार्च का ‘ऑपरेशन रिटालिएशन’: क्या हुआ था?
दो पश्चिमी अधिकारियों और दो ईरानी अधिकारियों के हवाले से दी गई इस जानकारी के मुताबिक, सऊदी वायुसेना ने मार्च के आखिरी हफ्ते में ईरान पर कई हवाई हमले किए। इन हमलों को पूरी तरह गोपनीय रखा गया था ताकि क्षेत्रीय युद्ध की लपटें बेकाबू न हो जाएं।
सूत्रों का कहना है कि ये हमले ‘जैसे को तैसा’ (Tit-for-tat) की रणनीति के तहत किए गए थे। दरअसल, मार्च के दौरान सऊदी अरब पर होने वाले ड्रोन और मिसाइल हमलों में भारी बढ़ोतरी हुई थी, जिसका जवाब रियाद ने सीधे तेहरान को उसकी जमीन पर दिया। हालांकि, अभी तक इन हमलों के विशिष्ट लक्ष्यों (Targets) की पुष्टि नहीं हो पाई है, लेकिन माना जा रहा है कि इनमें सामरिक और सैन्य ठिकाने शामिल थे।
डिप्लोमेसी और धमकियां: पर्दे के पीछे का खेल
दिलचस्प बात यह है कि एक तरफ बम बरस रहे थे और दूसरी तरफ कूटनीति के तार भी जुड़े हुए थे। रिपोर्ट के अनुसार, सऊदी अरब ने इन हमलों के बारे में ईरान को सूचित भी किया था। रियाद ने तेहरान के राजदूत के माध्यम से स्पष्ट संदेश भेजा कि यदि हमले नहीं रुके, तो जवाबी कार्रवाई और भी भीषण होगी।
इस ‘शक्ति प्रदर्शन’ और कूटनीतिक दबाव का असर यह हुआ कि दोनों देशों के बीच एक अनौपचारिक समझौता हुआ। आंकड़ों की मानें तो:
- 25-31 मार्च: सऊदी अरब पर 105 से अधिक ड्रोन और मिसाइल हमले हुए।
- 1-6 अप्रैल: हमलों की संख्या घटकर मात्र 25 रह गई।
यह कमी दर्शाती है कि सऊदी की जवाबी कार्रवाई ने ईरान को अपने कदम पीछे खींचने पर मजबूर किया। यह अनौपचारिक ‘डी-एस्केलेशन’ 7 अप्रैल को अमेरिका और ईरान के बीच हुए व्यापक युद्धविराम से ठीक एक हफ्ते पहले प्रभावी हुआ था।
सऊदी अरब का बदलता तेवर
सऊदी अरब पारंपरिक रूप से अपनी रक्षा के लिए अमेरिका या क्षेत्रीय सहयोगियों पर निर्भर रहा है, लेकिन यह घटनाक्रम ‘न्यू रियाद’ के उदय का संकेत है। 19 मार्च को सऊदी विदेश मंत्री प्रिंस फैसल बिन फरहान ने स्पष्ट चेतावनी दी थी कि किंगडम अपनी सुरक्षा के लिए “सैन्य कार्रवाई का अधिकार सुरक्षित रखता है।”
इसके ठीक तीन दिन बाद, सऊदी अरब ने ईरान के सैन्य अताशे और चार दूतावास कर्मचारियों को ‘पर्सोना नॉन ग्राटा’ (अवांछित व्यक्ति) घोषित कर देश से निकाल दिया था। यह कड़े राजनयिक और सैन्य संदेशों की एक सोची-समझी श्रृंखला थी।
इराक का एंगल और पाकिस्तान की एंट्री
रिपोर्ट में एक और महत्वपूर्ण खुलासा किया गया है। 7 अप्रैल के युद्धविराम के आसपास जब सऊदी अरब पर फिर से हमले हुए, तो जांच में पाया गया कि ये मिसाइलें ईरान से नहीं बल्कि इराक की धरती से छोड़ी गई थीं। इसका मतलब था कि ईरान ने सीधे हमले तो रोक दिए थे, लेकिन अपने प्रॉक्सी समूहों (Proxy Groups) का इस्तेमाल जारी रखा।
तनाव इतना बढ़ गया था कि सऊदी अरब ने इराक के राजदूत को तलब किया और जवाबी कार्रवाई की धमकी दी। इसी दौरान पाकिस्तान द्वारा लड़ाकू विमानों की तैनाती की खबरों ने भी इस संकट को एक अंतरराष्ट्रीय आयाम दे दिया, जिससे संकेत मिले कि सऊदी अरब के पास जरूरत पड़ने पर क्षेत्रीय सहयोगियों का भी समर्थन है।
UAE भी नहीं रहा पीछे
सऊदी अरब अकेला ऐसा देश नहीं है जिसने ईरान पर सीधी कार्रवाई की है। हाल ही में ‘वॉल स्ट्रीट जर्नल’ की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने भी ईरान के भीतर गुप्त हमले किए थे। खाड़ी के इन दो रसूखदार देशों का यह आक्रामक रुख ईरान की ‘फारस की खाड़ी’ में वर्चस्व की नीति के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है।
निष्कर्ष: एक अस्थिर शांति
फिलहाल, 7 अप्रैल के युद्धविराम के बाद स्थिति नियंत्रण में दिख रही है, लेकिन सऊदी अरब के इन गुप्त हमलों ने यह साफ कर दिया है कि भविष्य में वह “रणनीतिक धैर्य” (Strategic Patience) के बजाय “तत्काल जवाबी कार्रवाई” की नीति अपनाएगा।
पश्चिम एशिया अब उस मोड़ पर है जहां कूटनीति और बारूद के बीच का फासला बहुत कम रह गया है। क्या यह ‘डी-एस्केलेशन’ स्थायी शांति लाएगा, या यह आने वाले किसी बड़े तूफान से पहले की खामोशी है? दुनिया की नजरें अब रियाद और तेहरान के अगले कदम पर टिकी हैं।

