Uttar pradesh muslims success story : अखाड़े का सुल्तान, पढ़ाई में होनहार लुकमान अली
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मुस्लिम नाउ विशेष
अक्सर माना जाता है कि खेल और पढ़ाई दो अलग-किनारे हैं जिन्हें एक साथ नहीं जोड़ा जा सकता। दुनिया ने देखा है कि खेल की चकाचौंध में अक्सर किताबें पीछे छूट जाती हैं। लेकिन उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले के एक छोटे से गाँव ‘मोहरका पट्टी’ से निकले मोहम्मद लुकमान अली ने इस धारणा को मटियामेट कर दिया है।
लुकमान अली आज न केवल कुश्ती के दांव-पेच से विरोधियों को पस्त कर रहे हैं, बल्कि देश के प्रतिष्ठित जामिया मिल्लिया इस्लामिया से ‘मास्टर ऑफ सोशल वर्क’ (MSW) की पढ़ाई कर एक नई मिसाल पेश कर रहे हैं।

विरासत में मिली कुश्ती, जज्बे ने दी उड़ान
लुकमान के रगों में कुश्ती का जुनून विरासत में मिला है। उनके पिता, छज्जो अली, जो रेलवे में कार्यरत थे, स्वयं कुश्ती के शौकीन रहे। उन्होंने ही लुकमान के मन में पहलवानी के बीज बोए। वहीं, उनकी मां जायदा ने उन्हें दीनी तालीम के साथ-साथ अनुशासन और नैतिकता का पाठ पढ़ाया।
गाँव के मिट्टी के अखाड़ों से शुरू हुआ यह सफर दिल्ली के विश्व प्रसिद्ध छत्रसाल स्टेडियम तक जा पहुँचा। सुबह 4 बजे उठकर पसीना बहाना और फिर कॉलेज की क्लासेस अटेंड करना—यह लुकमान की दिनचर्या का हिस्सा बन गया।
सफलता का सफर: मिट्टी से मेडल तक
लुकमान की असली उड़ान 2018 में शुरू हुई, जब उन्होंने पहली बड़ी जीत हासिल की। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा:
- 2022 राष्ट्रीय चैंपियनशिप: नंदिनी नगर में आयोजित प्रतियोगिता में उन्होंने रजत पदक (Silver Medal) जीतकर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया।
- अंतरराष्ट्रीय मंच पर धाक: 2023 में थाईलैंड में भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए उन्होंने छठा स्थान हासिल किया। लुकमान भावुक होकर याद करते हैं, “जब पहली बार तिरंगे वाली जर्सी पहनी, तो आँखों में गर्व के आंसू थे।”
शिक्षा और खेल का बेमिसाल संतुलन
लुकमान अली आज उन चुनिंदा एथलीटों में शामिल हैं जो टाइम मैनेजमेंट के ‘उस्ताद’ हैं। वे मानते हैं कि शिक्षा और खेल एक-दूसरे के दुश्मन नहीं, बल्कि पूरक हैं। जामिया में सोशल वर्क के छात्र के रूप में वे समाज की समस्याओं को समझते हैं और खेल के जरिए सकारात्मक बदलाव लाने का सपना देखते हैं।
वे कहते हैं, “दिन की सही योजना हो, तो आप अखाड़े में भी जीत सकते हैं और परीक्षा भवन में भी।”
अगला लक्ष्य: ओलंपिक 2028
फिलहाल लुकमान ‘खेलो इंडिया’ और ‘एशियाई इंडोर चैंपियनशिप’ की तैयारी में जी-जान से जुटे हैं। लेकिन उनकी नजरें एक बड़े लक्ष्य पर टिकी हैं— 2028 का ओलंपिक। वे भारत के लिए ओलंपिक मेडल जीतकर उस सपने को पूरा करना चाहते हैं जो उन्होंने मोहरका पट्टी की मिट्टी में देखा था।

