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Maria Wirth की नई किताब: यह शोध है या मुस्लिम-ईसाई के खिलाफ प्रोपेगेंडा?

मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नई दिल्ली

सोशल मीडिया के दौर में विमर्श गढ़ने का खेल बहुत निराला हो गया है। हाल ही में जर्मनी मूल की मारिया विर्थ की एक नई किताब हिंदी में बाजार में आई है। इसका शीर्षक है- “हिंदू धर्म पर मुसलमानों, ईसाइयों तथा वामपंथियों का आक्रमण क्यों?”। यह किताब पहले अंग्रेजी में आई थी और अब इसे हिंदी पाठकों के लिए अमेज़न और सुरुचि प्रकाशन पर उपलब्ध कराया गया है।

एक वरिष्ठ पत्रकार के नाते जब हम इस किताब के शीर्षक और इसके पीछे के नैरेटिव को देखते हैं तो कई गंभीर सवाल खड़े होते हैं। क्या यह वाकई कोई ऐतिहासिक शोध है? या फिर यह समाज में पहले से मौजूद ध्रुवीकरण की खाई को और गहरा करने का एक सुनियोजित प्रयास है?

संख्या बल और प्रताड़ना का अजीब तर्क

किताब का शीर्षक ही अपने आप में एक खास तरह की राजनीति की तरफ इशारा करता है। इसमें मुस्लिम, ईसाई और वामपंथियों को सीधे तौर पर ‘आक्रमणकारी’ के रूप में पेश किया गया है। लेकिन जब हम धरातल की हकीकत देखते हैं तो आंकड़े कुछ और ही कहानी कहते हैं।

दुनिया भर में हिंदुओं की आबादी तीसरी सबसे बड़ी है। अकेले भारत में हिंदुओं की संख्या एक अरब से ज्यादा है। ऐसे में यह तर्क गले नहीं उतरता कि कुछ करोड़ की आबादी वाले अल्पसंख्यक समुदाय एक अरब की विशाल आबादी को ‘दबा’ रहे हैं या उस पर ‘आक्रमण’ कर रहे हैं। समाजशास्त्रीय नजरिए से देखें तो यह ‘विक्टिम कार्ड’ खेलने जैसा है। यह एक ऐसा नैरेटिव है जिसमें बहुसंख्यक आबादी को यह डराया जाता है कि वे खतरे में हैं।

अल्पसंख्यकों की मौजूदा स्थिति और नैरेटिव का टकराव

मारिया विर्थ अपनी किताब और ब्लॉग में जिस तरह की बातें करती हैं वह आज के जमीनी हालात से मेल नहीं खातीं। आज देश में अल्पसंख्यकों की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। आए दिन छोटी आबादियों पर भीड़ के हमले की खबरें आती हैं। खान-पान से लेकर कारोबार तक पर पाबंदियां लगाने की कोशिशें होती हैं। लव जिहाद जैसे शब्दों के जरिए एक खास समुदाय को निशाना बनाया जा रहा है।

जब कानून और सत्ता का इकबाल एक तरफ झुका हुआ महसूस हो तब यह कहना कि अल्पसंख्यक बहुसंख्यकों को प्रताड़ित कर रहे हैं बहुत ही विरोधाभासी लगता है। वामपंथियों की बात करें तो उनका राजनीतिक आधार लगभग सिमट चुका है। पश्चिम बंगाल से उनकी विदाई हुए अरसा बीत गया। केरल के बाहर उनकी मौजूदगी न के बराबर है। फिर भी उन्हें एक बड़े खतरे के तौर पर पेश करना सिर्फ राजनीतिक लाभ के लिए गढ़ा गया डर महसूस होता है।

इतिहास के साथ छेड़छाड़ और नया प्रोपेगेंडा

किताब के पीछे की मानसिकता को समझने के लिए मारिया विर्थ के ब्लॉग्स को पढ़ना जरूरी है। वे मुग़ल शासकों और मुस्लिम इतिहास को बेहद नकारात्मक रोशनी में देखती हैं। पिछले कुछ वर्षों में भारत में एक खास तरह की लहर चली है। इसमें ऐतिहासिक शहरों, सड़कों और इमारतों के नाम बदले जा रहे हैं। इतिहास की किताबों से चुनिंदा हिस्से हटाए जा रहे हैं।

मारिया विर्थ इसी लहर का हिस्सा नजर आती हैं। वे ‘हिंदू यूनिवर्सिटी ऑफ अमेरिका’ से जुड़ी हैं। उनके लेखन में शोध कम और पूर्वाग्रह ज्यादा झलकता है। वे हर उस चीज को ‘अधर्म’ करार देती हैं जो उनके तय किए हुए फ्रेमवर्क में फिट नहीं बैठती। उनके एक्स (ट्विटर) पर डेढ़ लाख से ज्यादा फॉलोअर्स हैं। यह दर्शाता है कि एक खास विचारधारा के लोग उन्हें बड़ी उत्सुकता से पढ़ते हैं। लेकिन लोकप्रियता हमेशा विश्वसनीयता की गारंटी नहीं होती।

कौन हैं मारिया विर्थ?

मारिया विर्थ जर्मनी की रहने वाली हैं। उन्होंने हैम्बर्ग यूनिवर्सिटी से मनोविज्ञान की पढ़ाई की है। वे ऑस्ट्रेलिया जा रही थीं लेकिन भारत आकर यहीं की होकर रह गईं। कुंभ मेले के दौरान उन्हें भारत की आध्यात्मिक शक्ति का अहसास हुआ। यह एक व्यक्तिगत अनुभव हो सकता है। लेकिन जब कोई विदेशी व्यक्ति भारत आकर यहां की जटिल सामाजिक संरचना को बिना समझे एक पक्षीय राय देता है तो वह खतरनाक हो जाता है।

उन्होंने अपनी किताब “थैंक यू इंडिया” में योग और हिंदू धर्म की तारीफ की है। धर्म की प्रशंसा करना गलत नहीं है। लेकिन दूसरे धर्मों को नीचा दिखाकर या उन्हें हमलावर बताकर अपनी बात कहना विद्वत्ता नहीं कहलाती। वे अक्सर विश्व हिंदू कांग्रेस जैसे मंचों पर नजर आती हैं। इससे उनकी वैचारिक संबद्धता साफ हो जाती है।

राम मंदिर और आधुनिक ‘रावण’ का रूपक

फरवरी 2024 में लिखे उनके एक लेख “आज के रावणों के खिलाफ श्री राम की मदद की जरूरत है” को देखिए। इसमें वे अयोध्या में राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा को 500 साल के संघर्ष की जीत बताती हैं। वे कहती हैं कि 1947 में ही भारत का बंटवारा धार्मिक आधार पर हुआ था इसलिए तभी मंदिरों को वापस ले लेना चाहिए था।

वे ‘वोक’ कल्चर, आधुनिक खान-पान और पश्चिमी विचारों को ‘असुर’ और ‘अधर्म’ कहती हैं। उनके लिए आधुनिकता एक खतरा है। वे मानती हैं कि भारत ही एकमात्र ऐसी जगह है जहां ‘देवताओं’ की पूजा होती है। इस तरह की बातें सुनने में अच्छी लग सकती हैं लेकिन ये दुनिया को ‘हम’ बनाम ‘वो’ के खांचे में बांट देती हैं।

प्रोपेगेंडा का बढ़ता बाजार

आजकल ऐसी किताबों की बाढ़ आ गई है जो किसी खास धर्म या समुदाय के प्रति नफरत भरती हैं। सुरुचि प्रकाशन जैसे संस्थान ऐसी सामग्री को बढ़ावा देते हैं जो एक विशेष राजनीतिक एजेंडे को पुष्ट करती हो। मारिया विर्थ की किताब भी इसी कड़ी का हिस्सा है।

जब वे कहती हैं कि “पश्चिमी मीडिया पीएम मोदी की आलोचना करेगा क्योंकि वे हिंदू धर्म के प्रति समर्पित हैं” तो वे सीधे तौर पर राजनीतिक बचाव कर रही होती हैं। एक लेखक का काम सत्ता की जय-जयकार करना नहीं बल्कि समाज का आईना दिखाना होता है। मारिया विर्थ का लेखन इस कसौटी पर खरा नहीं उतरता।

हमें क्या समझना चाहिए?

किसी भी किताब को पढ़ने से पहले लेखक की पृष्ठभूमि और उसकी मंशा को समझना जरूरी है। मारिया विर्थ की यह किताब उन लोगों को बहुत पसंद आएगी जो पहले से ही अल्पसंख्यकों के प्रति पूर्वाग्रह रखते हैं। लेकिन एक सजग समाज के नाते हमें यह सोचना होगा कि क्या ऐसी सोच हमें तरक्की की ओर ले जाएगी?

भारत की ताकत उसकी विविधता और सहिष्णुता रही है। एक अरब की आबादी को किसी छोटे समुदाय से खतरा बताना सिर्फ और सिर्फ राजनीतिक रोटियां सेंकने का जरिया है। इतिहास को बदलने की कोशिश और वर्तमान की समस्याओं से ध्यान भटकाने के लिए ऐसे नैरेटिव गढ़े जाते हैं। मारिया विर्थ की यह किताब शोध का विषय कम और एक खास तरह की विचारधारा का प्रचार तंत्र ज्यादा जान पड़ती है।

पाठकों को चाहिए कि वे ऐसी किताबों को आलोचनात्मक नजरिए से देखें। धर्म का मतलब जोड़ना होता है न कि डर पैदा करना। अगर कोई किताब आपको पड़ोसी से डराना सिखाती है तो समझ लीजिए कि वह धर्म की नहीं बल्कि राजनीति की किताब है।