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कर्नाटक में हिजाब की वापसी और असम में यूसीसी की दस्तक

मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नई दिल्ली, गुवाहाटी, बेंगलुरु

देश की राजनीति में बुधवार को दो ऐसे फैसले सामने आए, जिन्होंने एक बार फिर पहचान, धर्म और अधिकारों की बहस को तेज कर दिया। एक ओर कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने स्कूल और कॉलेजों में हिजाब पर लगी रोक हटाने का फैसला लिया। दूसरी ओर असम की बीजेपी सरकार ने समान नागरिक संहिता यानी यूसीसी लागू करने की दिशा में बड़ा कदम बढ़ा दिया।

दोनों फैसले अलग राज्यों से आए, लेकिन इनके राजनीतिक और सामाजिक मायने राष्ट्रीय स्तर पर देखे जा रहे हैं। खासकर इसलिए क्योंकि दोनों मुद्दे लंबे समय से राजनीतिक विमर्श के केंद्र में रहे हैं और मुस्लिम समुदाय से सीधे जुड़े माने जाते हैं।

कर्नाटक में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया सरकार ने 2022 के उस आदेश को आधिकारिक रूप से वापस ले लिया है, जिसे तत्कालीन बीजेपी सरकार ने लागू किया था। इसी आदेश के बाद राज्य के कई शिक्षण संस्थानों में हिजाब पहनकर आने वाली मुस्लिम छात्राओं को कक्षाओं में प्रवेश से रोका गया था।

नई ड्रेस कोड नीति के तहत अब कक्षा 1 से 12 तक के छात्र अपने निर्धारित यूनिफॉर्म के साथ धार्मिक और पारंपरिक प्रतीक पहन सकेंगे। सरकार ने साफ किया है कि हिजाब के साथ साथ जनेऊ, रुद्राक्ष, शिवधारा, पगड़ी और अन्य पारंपरिक प्रतीकों को भी अनुमति होगी, बशर्ते वे तय ड्रेस कोड के पूरक हों।

यह आदेश मौजूदा शैक्षणिक सत्र से लागू होगा।

सरकार ने कहा है कि नया आदेश पूर्व मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई सरकार के विवादित निर्देश की जगह लेगा। 2022 में लागू हुए उस आदेश ने पूरे देश में तीखी बहस छेड़ दी थी। कर्नाटक के उडुपी से शुरू हुआ विवाद जल्द ही राष्ट्रीय मुद्दा बन गया था। कई कॉलेजों में मुस्लिम छात्राओं को हिजाब पहनने पर रोका गया, जिसके जवाब में कुछ हिंदू छात्र भगवा गमछा पहनकर संस्थानों में पहुंचे। देखते ही देखते मामला सड़कों, अदालतों और चुनावी मंचों तक पहुंच गया।

कांग्रेस सरकार का कहना है कि छात्रों को अपनी धार्मिक पहचान के साथ शिक्षा पाने का अधिकार होना चाहिए। सरकार ने शिक्षण संस्थानों को यह भी निर्देश दिया है कि किसी भी छात्र के साथ भेदभाव या अपमान की स्थिति पैदा न हो।

आदेश में 12वीं सदी के समाज सुधारक बसवेश्वर के विचार “इवा नम्मवा” यानी “यह हमारा अपना है” का भी उल्लेख किया गया है। सरकार ने कहा कि संस्थानों को समावेशी माहौल बनाए रखना होगा, साथ ही अनुशासन और संवैधानिक मूल्यों का पालन भी सुनिश्चित करना होगा।

हालांकि, सरकार के इस फैसले ने नया राजनीतिक विवाद भी खड़ा कर दिया है। आदेश में हिजाब समेत कई धार्मिक प्रतीकों का जिक्र है, लेकिन भगवा गमछा, सिंदूर, कुमकुम या विभूति को लेकर स्पष्ट स्थिति नहीं बताई गई है। इसी को लेकर विपक्ष सवाल उठा रहा है।

कर्नाटक विधानसभा में विपक्ष के नेता आर अशोक ने कांग्रेस सरकार पर “तुष्टिकरण की राजनीति” का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस मुस्लिम वोट बैंक की राजनीति कर रही है और यह फैसला उसी रणनीति का हिस्सा है।

अशोक ने आरोप लगाया कि हिंदुओं के साथ अन्याय करने वाली सरकारों को जनता सबक सिखाती है और आने वाले समय में कर्नाटक की जनता भी जवाब देगी। बीजेपी इस फैसले को राजनीतिक लाभ के नजरिए से देख रही है, जबकि कांग्रेस इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों से जोड़ रही है।

इसी बीच पूर्वोत्तर के राज्य असम में बीजेपी सरकार ने यूसीसी लागू करने की तैयारी तेज कर दी है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में बुधवार को यूनिफॉर्म सिविल कोड को मंजूरी दे दी गई।

सरमा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि यूसीसी विधेयक 26 मई को विधानसभा में पेश किया जाएगा। उन्होंने कहा कि यह उनकी सरकार का चुनावी वादा था और नई सरकार की पहली कैबिनेट बैठक में इसे मंजूरी दी गई है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि असम का यूसीसी राज्य की जरूरतों के हिसाब से तैयार किया गया है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि राज्य की जनजातीय आबादी को इसके दायरे से पूरी तरह बाहर रखा जाएगा।

सरमा के मुताबिक यूसीसी का असर विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, लिव इन रिलेशनशिप और शादी तथा तलाक के अनिवार्य पंजीकरण जैसे मामलों पर पड़ेगा।

उन्होंने कहा कि राज्य की जनजातीय परंपराएं, रीति रिवाज और सामाजिक व्यवस्था इस कानून से प्रभावित नहीं होंगी। सरकार का दावा है कि स्थानीय सामाजिक ढांचे को ध्यान में रखकर यह मसौदा तैयार किया गया है।

बीजेपी शासित राज्यों में उत्तराखंड पहले ही यूसीसी लागू कर चुका है। गोवा में लंबे समय से समान नागरिक कानून व्यवस्था मौजूद है, जबकि गुजरात ने भी इस दिशा में कदम बढ़ाया है। अब असम इस सूची में शामिल होने की तैयारी कर रहा है।

मुस्लिम संगठनों और विपक्षी दलों की ओर से यूसीसी को लेकर पहले भी सवाल उठते रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि यह धार्मिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत कानूनों पर असर डाल सकता है। वहीं समर्थकों का तर्क है कि इससे सभी नागरिकों के लिए समान कानून व्यवस्था बनेगी।

दिलचस्प बात यह है कि जिस दिन असम में यूसीसी को कैबिनेट मंजूरी मिली, उसी दिन कर्नाटक में हिजाब पर रोक हटाने का फैसला सामने आया। एक राज्य धार्मिक पहचान को लेकर अधिक खुलापन दिखा रहा है, जबकि दूसरा नागरिक कानूनों को एकरूप करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

इन दोनों फैसलों ने यह साफ कर दिया है कि आने वाले समय में धर्म, पहचान और अधिकार की राजनीति भारतीय लोकतंत्र में बहस का बड़ा विषय बनी रहेगी। फिलहाल नजरें कर्नाटक में हिजाब नीति के असर और असम विधानसभा में पेश होने वाले यूसीसी बिल पर टिकी हैं।