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कर्बला का संदेश अमर, मीरवाइज़ ने भारत पाकिस्तान संवाद पर दिया जोर

मुस्लिम नाउ ब्यूरो, श्रीनगर

यौमे आशूरा के मौके पर श्रीनगर की ऐतिहासिक जामा मस्जिद में जुमे की नमाज के दौरान मीरवाइज़ ए कश्मीर डॉ. मौलवी मोहम्मद उमर फारूक ने कर्बला की घटना को इंसानियत के लिए हमेशा प्रासंगिक संदेश बताया। उन्होंने कहा कि कर्बला केवल इस्लामी इतिहास का एक अध्याय नहीं है। यह सच्चाई, सब्र, न्याय और बलिदान का ऐसा पैगाम है, जो हर दौर और हर समाज को राह दिखाता है।

अपने संबोधन में मीरवाइज़ ने कहा कि जब समाज में समझदारी की जगह अहंकार ले लेता है, जब बातचीत की जगह टकराव को चुना जाता है और जब ताकत को समाधान समझ लिया जाता है, तब उसका परिणाम केवल दुख, तबाही और अस्थिरता होता है। इसके विपरीत जो लोग कठिन हालात में भी सच, धैर्य और संवाद का रास्ता अपनाते हैं, इतिहास उन्हें सम्मान के साथ याद रखता है।

उन्होंने कहा कि इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु का जीवन इसी सिद्धांत का सबसे बड़ा उदाहरण है। उन्होंने कभी संघर्ष या हिंसा की इच्छा नहीं की। उनका उद्देश्य न्याय की रक्षा करना और इस्लाम के मूल मूल्यों को कायम रखना था। उन्होंने आखिरी समय तक संवाद और सत्य का मार्ग नहीं छोड़ा। जब अत्याचार और अन्याय का रास्ता चुना गया, तब उन्होंने अपने सिद्धांतों से समझौता करने के बजाय बलिदान को स्वीकार किया। यही कारण है कि आज भी कर्बला पूरी दुनिया में सत्य और नैतिक साहस का सबसे बड़ा प्रतीक मानी जाती है।

मीरवाइज़ ने कहा कि कर्बला का संदेश किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं है। यह हर उस समाज के लिए प्रेरणा है, जो न्याय, मानवता और शांति में विश्वास रखता है। उन्होंने कहा कि सत्ता और ताकत कुछ समय के लिए प्रभावशाली दिखाई दे सकती है, लेकिन इतिहास अंततः उन्हीं लोगों को सम्मान देता है, जो सत्य और इंसाफ के साथ खड़े रहते हैं।

अपने संबोधन में उन्होंने हाल के अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि ईरान, अमेरिका और इज़राइल के बीच हालिया तनाव ने एक बार फिर साबित किया है कि सैन्य शक्ति हर समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकती। युद्ध से हालात बदल सकते हैं। लोगों को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। संसाधनों की बर्बादी होती है। निर्दोष नागरिक सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। लेकिन स्थायी शांति का रास्ता अंततः बातचीत, कूटनीति और समझदारी से ही निकलता है।

उन्होंने कहा कि कई महीनों तक चले तनाव और संघर्ष के बाद भी संबंधित पक्ष आखिरकार वार्ता की मेज पर लौटे। यह किसी पक्ष की कमजोरी नहीं, बल्कि वास्तविकता की स्वीकारोक्ति है कि किसी भी विवाद का स्थायी समाधान केवल बातचीत से ही संभव है। उन्होंने पाकिस्तान और कतर सहित उन सभी क्षेत्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय पक्षों की सराहना की जिन्होंने संवाद का माहौल बनाने की दिशा में प्रयास किए।

मीरवाइज़ ने कहा कि यह अनुभव दक्षिण एशिया के लिए भी उतना ही महत्वपूर्ण है। विशेष रूप से भारत और पाकिस्तान को इससे सीख लेने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र में दुनिया की लगभग एक चौथाई आबादी रहती है। यहां विशाल युवा शक्ति है। समृद्ध सभ्यतागत विरासत है। आर्थिक विकास की अपार संभावनाएं हैं। इसके बावजूद लंबे समय से चले आ रहे राजनीतिक मतभेद, अविश्वास और अनसुलझे मुद्दों ने पूरे क्षेत्र की प्रगति को प्रभावित किया है।

उन्होंने कहा कि यदि क्षेत्र में शांति और स्थिरता का वातावरण बने तो करोड़ों लोगों का जीवन बेहतर हो सकता है। व्यापार बढ़ सकता है। शिक्षा और रोजगार के अवसर बढ़ सकते हैं। सामाजिक विश्वास मजबूत हो सकता है। लेकिन इसके लिए संवाद और आपसी सम्मान की संस्कृति को बढ़ावा देना होगा।

अपने पारिवारिक और सार्वजनिक जीवन का उल्लेख करते हुए मीरवाइज़ ने कहा कि वर्ष 1990 में उनके पिता शहीद मीरवाइज़ मौलवी फारूक की हत्या के बाद उन्हें केवल धार्मिक नेतृत्व की जिम्मेदारी नहीं मिली, बल्कि उन सिद्धांतों को आगे बढ़ाने का दायित्व भी मिला जिनके लिए उनके पिता ने अपना जीवन समर्पित किया था।

उन्होंने कहा कि शहीद मीरवाइज़ हमेशा न्याय, शांति और बातचीत के पक्षधर रहे। उनका मानना था कि हिंसा किसी भी समस्या का समाधान नहीं हो सकती। उन्होंने लगातार भारत और पाकिस्तान के बीच सार्थक वार्ता की वकालत की और विश्वास व्यक्त किया कि जम्मू कश्मीर सहित पूरे क्षेत्र के लोगों का भविष्य शांति, सम्मान और संवाद में ही सुरक्षित है।

मीरवाइज़ ने कहा कि उन्होंने इसी सोच को अपने सार्वजनिक जीवन का आधार बनाया। पहले अवामी एक्शन कमेटी और बाद में ऑल पार्टीज हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के मंच से भी उन्होंने लगातार बातचीत के सिद्धांत का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि पिछले 36 वर्षों के दौरान उन्हें अनेक चुनौतियों और विरोध का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने संवाद और न्याय के मार्ग से पीछे हटना स्वीकार नहीं किया।

अपने संबोधन के अंत में उन्होंने लोगों से अपील की कि वे कर्बला के वास्तविक संदेश को केवल धार्मिक आयोजन तक सीमित न रखें। इसे अपने व्यक्तिगत जीवन, सामाजिक व्यवहार और सार्वजनिक जीवन में भी अपनाएं। उन्होंने कहा कि इमाम हुसैन का संदेश हमें सिखाता है कि कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी सत्य, धैर्य और न्याय का साथ नहीं छोड़ना चाहिए। यही वह मूल्य हैं जो समाजों को मजबूत बनाते हैं और आने वाली पीढ़ियों के लिए बेहतर भविष्य तैयार करते हैं।

प्रमुख बातें

क्या कहा गया

कर्बला सत्य, सब्र और न्याय का शाश्वत संदेश है।

मुख्य संदेश

युद्ध नहीं। संवाद और समझदारी ही स्थायी समाधान का रास्ता है।

भारत और पाकिस्तान पर राय

दोनों देशों को शांति और बातचीत की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।

ईरान, अमेरिका और इज़राइल तनाव पर टिप्पणी

सैन्य शक्ति की सीमाएं हैं। अंततः कूटनीति ही समाधान देती है।

कर्बला से सीख

इमाम हुसैन का बलिदान आज भी सत्य, नैतिक साहस और इंसाफ का सबसे बड़ा प्रतीक है।

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