मुहर्रम 2026: देश भर में शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हुआ आशूरा, अखाड़ों में दिखी होड़
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नई दिल्ली / शिमला / श्रीनगर:
देश भर में शांति और आपसी भाईचारे के साथ मुहर्रम का त्योहार संपन्न हो गया। आशूरा यानी मुहर्रम के 10वें दिन देश के अलग-अलग हिस्सों में शिया और सुन्नी समुदाय के लोगों ने अपने-अपने तरीके से पैगंबर मोहम्मद के नवासे हजरत इमाम हुसैन की शहादत को याद किया। कहीं अलम और ताजिया के जुलूस निकाले गए, तो कहीं भूखों को खाना खिलाया गया और राहगीरों को शरबत बांटा गया। उत्तर प्रदेश, दिल्ली, जम्मू-कश्मीर से लेकर मध्य प्रदेश और कर्नाटक तक प्रशासन सुरक्षा व्यवस्था को लेकर पूरी तरह मुस्तैद दिखा।
शिमला की मस्जिद में गूंजा कर्बला का इतिहास और सार्वभौमिक संदेश
हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला में मुहर्रम के मौके पर विशेष मजलिसों और दुआओं का आयोजन किया गया। शिमला मस्जिद में एक सभा को संबोधित करते हुए धार्मिक विद्वान सैयद काजिम रजा नकवी ने कर्बला की जंग और इमाम हुसैन के बलिदान पर विस्तार से रोशनी डाली। उन्होंने कहा कि इमाम हुसैन की शहादत केवल किसी एक समुदाय के लिए नहीं है, बल्कि यह न्याय, सच्चाई, करुणा और अत्याचार के खिलाफ खड़े होने का एक सार्वभौमिक संदेश है।
नकवी ने ऐतिहासिक घटनाक्रम का जिक्र करते हुए बताया कि उस दौर के अत्याचारी शासक यजीद ने इमाम हुसैन को अपने सामने झुकने या युद्ध का सामना करने का विकल्प दिया था। यजीद ने इस्लामिक मूल्यों और नियमों को पूरी तरह बदल दिया था। इमाम हुसैन ने तानाशाही और जुल्म के सामने झुकने से साफ इनकार कर दिया।
“विरोधी खेमे में खुद को मुसलमान कहने वालों की संख्या बहुत बड़ी थी, लेकिन पैगंबर मोहम्मद के परिवार से सच्चा प्यार करने वाले केवल 72 लोग थे। इन लोगों ने कर्बला के मैदान में अपनी जान न्योछावर कर दी। मुहर्रम की 7 तारीख से ही उनका पानी बंद कर दिया गया था। तीन दिन की भूख और प्यास के बाद मौला हुसैन को शहीद कर दिया गया।” — सैयद काजिम रजा नकवी, धार्मिक विद्वान
उन्होंने कर्बला की क्रूरता का जिक्र करते हुए छह महीने के मासूम अली असगर की शहादत को भी याद किया, जिन्हें पानी के बदले तीन मुखी तीर मार दिया गया था। नकवी ने इस संघर्ष की तुलना हिंदू धर्मग्रंथों से करते हुए कहा कि यह संदेश महाभारत में श्री कृष्ण के स्टैंड, या रावण के सामने श्री राम के न झुकने जैसा ही है। जैसे विभीषण ने अपने भाई का साथ छोड़कर सच का साथ दिया, वैसे ही कर्बला भी हक के लिए खड़े होने का नाम है। इस साल शिमला के बॉयलुगंज से निकलने वाला पारंपरिक जुलूस लोगों की कम संख्या के कारण नहीं निकाला गया, बल्कि अंदर ही मरसिया खानी और मजलिसें हुईं।
Along with his Ashura message, Honourable J&K Chief Minister @OmarAbdullah rejected the PDP's allegations of 25,000 backdoor appointments, strongly criticizing the Party and its president. pic.twitter.com/5EcLEBsxlF
— JKNC (@JKNC_) June 26, 2026
जम्मू-कश्मीर के बडगाम और श्रीनगर में कड़ी सुरक्षा के बीच जुलूस
जम्मू-कश्मीर के बडगाम जिले में आशूरा के मौके पर विशाल मुहर्रम जुलूस निकाला गया। प्रशासन और स्थानीय लोगों के बीच बेहतर तालमेल की वजह से पूरा कार्यक्रम बेहद शांतिपूर्ण रहा। बडगाम के उपायुक्त (DC) अतहर आमिर खान ने बताया कि जिले में करीब 196 जगहों पर छोटे-बड़े जुलूस निकाले गए। सभी विभागों के अधिकारी जमीन पर मुस्तैद रहे।
सुरक्षा व्यवस्था को लेकर बडगाम के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) हरिप्रसाद केके ने कहा कि पिछले दो महीनों से स्थानीय हितधारकों के साथ समन्वय बैठकें की जा रही थीं। सुरक्षा के लिए मल्टी-लेयर अरेंजमेंट किए गए थे। आपातकालीन स्थितियों से निपटने के लिए क्विक रिस्पांस टीमें (QRT) और ‘112’ आपातकालीन वाहन लगातार गश्त कर रहे थे।
#WATCH | अयोध्या, उत्तर प्रदेश | अयोध्या CO आशुतोष तिवारी ने मुहर्रम पर्व के जुलूस पर कहा, "…अयोध्या धाम क्षेत्र को ज़ोन और सेक्टरों में बांटकर ड्यूटी लगाई गई है। साथ ही जितने भी जुलूस के रूट हैं उनका भ्रमण किया गया है और सभी मार्गों पर पर्याप्त बल तैनात किए गए हैं। जुलूस के… pic.twitter.com/nzVY1XgFSB
— ANI_HindiNews (@AHindinews) June 26, 2026
श्रीनगर में भी मुहर्रम के जुलूसों के दौरान यातायात व्यवस्था को इस तरह संभाला गया ताकि आम जनता को परेशानी न हो। कश्मीर के पुलिस महानिरीक्षक (IGP) वीके बिरदी ने बताया कि जुलूस के रास्तों पर अनुशासन बनाए रखने के लिए आयोजकों की तरफ से वालंटियर्स भी तैनात किए गए थे। शिया समुदाय के लोगों ने छाती पीटकर और नौहा पढ़कर अपना गम जाहिर किया, वहीं सुन्नी समुदाय के लोगों ने इस दिन रोजा रखा।
उज्जैन वीडियो विवाद पर पुलिस की सफाई और अफवाहों से बचने की अपील
मध्य प्रदेश के उज्जैन से मुहर्रम जुलूस का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था, जिसे लेकर तरह-तरह के दावे किए जा रहे थे। इस मामले में पुलिस की जांच में एक बड़ा खुलासा हुआ है। पुलिस ने स्पष्ट किया है कि यह मामला किसी भी तरह के आतंकी प्रतीक या दूसरे धर्म के लोगों को डराने-धमकाने से नहीं जुड़ा था। असल में, यह स्थानीय अखाड़ों के बीच आपसी प्रतिस्पर्धा और होड़ का मामला था। इस मामले में पुलिस ने शोएब, तालीम, जाहिद और गोपाल नाम के व्यक्तियों को आरोपी बनाया है।
इस घटना के बाद सोशल मीडिया पर एक जरूरी बहस भी शुरू हो गई है। ‘मुस्लिम वॉयस सेल’ ने इस पर अपनी राय रखते हुए लिखा कि कुरान कभी भी दिखावे, फसाद या बेगुनाह लोगों के मन में डर पैदा करने की इजाजत नहीं देता। किसी एक व्यक्ति या गुट की गलत हरकत को पूरे मजहब से नहीं जोड़ा जाना चाहिए, और न ही मजहब की आड़ में ऐसी हरकतों का बचाव किया जाना चाहिए।
#WATCH | दिल्ली: सदर बाज़ार के बारा टूटी इलाके में मुस्लिम समुदाय के लोग मुहर्रम के जुलूस में शामिल हुए। pic.twitter.com/4kf5t250QI
— ANI_HindiNews (@AHindinews) June 26, 2026
दिल्ली और उत्तर प्रदेश में ड्रोन से निगरानी और ताजिया की ऊंचाई पर सख्ती
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में मुहर्रम को लेकर प्रशासन काफी सतर्क रहा। उत्तर-पश्चिम दिल्ली की डीसीपी आकांक्षा यादव ने बताया कि सभी आयोजकों को दिल्ली सरकार के नियमों के मुताबिक ही ताजिया की ऊंचाई रखने के निर्देश दिए गए थे। जुलूस में भाले, तलवारें या अन्य प्रतिबंधित हथियार ले जाने पर पूरी तरह रोक रही।
जहांगीरपुरी, भारत नगर और महिंद्रा पार्क जैसे मिश्रित आबादी वाले संवेदनशील इलाकों में अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया गया था। छतों पर नजर रखने के लिए ड्रोन कैमरों की मदद ली गई और सभी जुलूसों की वीडियो रिकॉर्डिंग की गई।
उत्तर प्रदेश के अयोध्या में भी सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम दिखे। अयोध्या के सीओ आशुतोष तिवारी ने बताया कि पूरे अयोध्या धाम क्षेत्र को जोन और सेक्टरों में बांटकर सुरक्षाकर्मियों की ड्यूटी लगाई गई थी। जुलूस के आगे और पीछे ‘बॉक्स फॉर्मेशन’ में सुरक्षा बल तैनात रहे जिससे सुरक्षा में कोई चूक न हो। लखनऊ के डीसीपी पश्चिम कमलेश दीक्षित ने बताया कि पूरे इलाके पर सीसीटीवी कैमरों और ड्रोन से नजर रखी गई और एक विशेष कंट्रोल रूम से इसकी लाइव मॉनिटरिंग होती रही। मुंबई के डोंगरी इमामबाड़ा में भी जुलूस शांतिपूर्ण रहा, जहां एआईएमआईएम प्रवक्ता वारिस पठान ने पुलिस अधिकारियों से मुलाकात कर व्यवस्था की सराहना की।
रतलाम में दर्दनाक हादसा और प्रयागराज का 300 साल पुराना ऐतिहासिक ताजिया
मुहर्रम के दौरान मध्य प्रदेश के रतलाम से एक दुखद खबर भी सामने आई। यहाँ जुलूस के दौरान एक बड़ा ताजिया सड़क के ऊपर से गुजर रही हाईटेंशन बिजली की लाइन से टकरा गया। करंट फैलने की वजह से झुलसकर 3 लोगों की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि 15 से ज्यादा लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। स्थानीय लोगों का कहना है कि बिजली के तार काफी नीचे लटके हुए थे, जिसके बारे में प्रशासन को पहले ही ध्यान देना चाहिए था।
दूसरी तरफ, उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में मुहर्रम के मौके पर एक ऐतिहासिक ताजिया लोगों के आकर्षण का केंद्र बना रहा। यह अनोखा ताजिया अखरोट की लकड़ी से बना है और बेहद प्राचीन है। स्थानीय लोगों के मुताबिक, यह करीब 300 साल पुराना है और शेरशाह सूरी के जमाने का माना जाता है। यह ताजिया लगभग चार से पांच पीढ़ियों से एक ही जगह सहेज कर रखा गया है। इसके नाजुक और प्राचीन ढांचे को देखते हुए करीब 12-15 साल पहले इसे एक जगह स्थिर रखने का फैसला किया गया था, क्योंकि तब इसे उठाने के लिए 100 से ज्यादा लोगों की जरूरत पड़ी थी और इसके टूटने का खतरा था।
मुहर्रम का यह पूरा घटनाक्रम याद दिलाता है कि आपसी समझ और प्रशासनिक सतर्कता से बड़े आयोजनों को शांतिपूर्वक संपन्न कराया जा सकता है। कुछ जगहों पर शरारती तत्वों ने सोशल मीडिया के जरिए माहौल बिगाड़ने की कोशिश जरूर की, लेकिन समाज की समझदारी और पुलिस की मुस्तैदी के आगे ऐसी साजिशें कामयाब नहीं हो सकीं।
इस्लामी कैलेंडर के पहले महीने मुहर्रम के दसवें दिन (यौम-ए-आशूरा) को पैगंबर हज़रत मुहम्मद (स.अ.व.) के नवासे हज़रत इमाम हुसैन और उनके 72 साथियों की कर्बला में हुई शहादत की याद में मनाया जाता है। इसके अलावा, इस दिन को पैगंबर मूसा (मूसा अलैहिस्सलाम) द्वारा मिस्र के फिरौन पर मिली विजय और मुक्ति की याद में भी मनाया जाता है
इमाम हुसैन की शहादत सत्य, न्याय और इंसानियत की रक्षा के लिए अपने उसूलों पर अडिग रहने का सबसे बड़ा प्रतीक है। उन्होंने अत्याचारी शासक यज़ीद की सत्ता के आगे झुकने के बजाय अपनी जान का बलिदान देना बेहतर समझा, ताकि इस्लाम के मूल सिद्धांतों और मानवीय गरिमा को बचाया जा सके।
मुहर्रम में ताजिया मुख्य रूप से हज़रत इमाम हुसैन (पैगंबर मुहम्मद साहब के नवासे) और उनके साथियों की शहादत की याद में निकाला जाता है। ताजिया को इराक के कर्बला में स्थित इमाम हुसैन के मकबरे का एक प्रतीकात्मक या नकली मॉडल (प्रतिकृति) माना जाता है।
कर्बला का मुख्य संदेश सत्य, न्याय और इंसानियत की रक्षा के लिए किसी भी अत्याचार के आगे न झुकना है। हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) ने अपने परिवार और साथियों के साथ मिलकर अपने प्राणों का सर्वोच्च बलिदान दिया, जो हमें अन्याय के खिलाफ साहस और धैर्य के साथ खड़े होने की प्रेरणा देता है।
शिया और सुन्नी समुदाय मुहर्रम को बहुत अलग तरीके से मनाते हैं。 शिया समुदाय इमाम हुसैन की शहादत के शोक में 10 दिनों तक मातम मनाता है और काले कपड़े पहनता है, जबकि सुन्नी मुसलमान इसे पैगंबर हज़रत मूसा की जीत और ईश्वर के प्रति आभार के रूप में रोज़े रखकर मनाते हैं

