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अतीत के ज़ख्म भूले,पेश की मानवता की मिसाल: गुजरात की बाढ़ में मसीहा बने मुस्लिम युवा

मुस्लिम नाउ ब्यूरो, अहमदाबाद

प्राकृतिक आपदाएं जब आती हैं तो वे किसी का मजहब या जाति देखकर नहीं आतीं। संकट के ऐसे ही क्षणों में इंसानियत की असली परीक्षा होती है। हाल ही में गुजरात के सूरत शहर ने एक भयंकर प्राकृतिक आपदा का सामना किया। महज 14 घंटों के भीतर शहर में 13 से 14 इंच तक रिकॉर्डतोड़ बारिश हुई। इस मूसलाधार बारिश ने पूरे शहर की रफ्तार को थाम दिया। सड़कें देखते ही देखते उफनती नदियों में तब्दील हो गईं। लोगों के घरों और दुकानों में पानी भर गया। हजारों परिवारों का साजो-सामान तबाह हो गया। इस भीषण संकट के बीच सूरत की सड़कों से एक ऐसी तस्वीर सामने आई जिसने पूरे देश का दिल जीत लिया।

यह तस्वीर थी उन मुस्लिम युवाओं की जो बिना किसी धार्मिक भेदभाव के बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए आगे आए। अतीत में गुजरात ने सांप्रदायिक दंगों की गहरी आग को झेला है। उन दंगों में मुस्लिम समुदाय को जान और माल का भारी नुकसान उठाना पड़ा था। लेकिन आज जब गुजरात का एक बड़ा हिस्सा पानी में डूबा है तो यहां के मुसलमानों ने अपने पुराने ज़ख्मों को भुला दिया है। उन्होंने सांप्रदायिक सौहार्द और इंसानियत का दामन मजबूती से थाम रखा है। देश के कुछ हिस्सों में भले ही नफरत की बातें होती हों लेकिन गुजरात के मुसलमानों ने साबित कर दिया है कि इस्लाम का सिखाया गया भलाई का रास्ता सबसे ऊपर है।

कमर तक भरे पानी में उतरे मददगार

सूरत के पलसाणा और कामरेज जैसे इलाकों में बारिश ने सबसे ज्यादा तबाही मचाई है। इन इलाकों में हालात इतने गंभीर हो गए कि लोगों का घरों से निकलना दूभर हो गया। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो और मीडिया रिपोर्ट्स इस बात की गवाही दे रहे हैं कि मुसीबत की इस घड़ी में मुस्लिम समुदाय के युवा फरिश्ते बनकर सामने आए।

वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि युवा लड़के कमर तक भरे गंदे पानी में उतरकर काम कर रहे हैं। वे अपने सिर पर और हाथों में राहत सामग्री के पैकेट उठाए हुए हैं। इन पैकेट्स में पीने का साफ पानी, सूखा भोजन, बिस्कुट और अन्य जरूरी सामान शामिल हैं। ये युवा बिना यह पूछे कि सामने वाले का धर्म क्या है, हर जरूरतमंद के दरवाजे तक पहुंच रहे हैं। स्वयंसेवकों ने छोटी गाड़ियों और नावों के जरिए उन अंदरूनी गलियों तक भी मदद पहुंचाई है जहां प्रशासन की गाड़ियां नहीं पहुंच पा रही थीं।

पंजाब के बाद अब गुजरात में पेश की मिसाल

बाढ़ पीड़ितों की निस्वार्थ सेवा का यह कोई पहला मामला नहीं है। इससे पहले जब पंजाब में भयंकर बाढ़ आई थी, तब भी मुस्लिम समुदाय के लोगों ने आगे बढ़कर सिख और हिंदू भाइयों की मदद की थी। अब वैसी ही मिसाल उन्होंने अपने गृह राज्य गुजरात में कायम की है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि इन युवाओं की मेहनत ने समाज में आपसी भाईचारे को एक नई मजबूती दी है। संकट के समय में जब लोग अपनों को ढूंढ रहे थे, तब इन युवाओं ने पूरे शहर को अपना परिवार मान लिया।

प्रशासनिक स्तर पर राहत कार्यों में तेजी

एक तरफ जहां सामाजिक संगठन और मुस्लिम युवा जमीन पर मोर्चा संभाले हुए हैं, वहीं दूसरी तरफ राज्य सरकार भी राहत और पुनर्वास के कार्यों में जुटी है। गुजरात के गृह राज्य मंत्री हर्ष संघवी खुद हालात पर नजर बनाए हुए हैं। उन्होंने मीडिया को बताया कि बाढ़ प्रभावित परिवारों को घरेलू सामान के नुकसान की भरपाई के लिए 6,800 रुपये की आर्थिक सहायता दी जा रही है।

प्रशासन ने इसके लिए बाकायदा घर-घर जाकर सर्वे शुरू किया है। अधिकारियों के मुताबिक अब तक 20 प्रतिशत से अधिक प्रभावित परिवारों के खातों में या नकद रूप में यह सहायता राशि पहुंचाई जा चुकी है। बचे हुए परिवारों को भी जल्द से जल्द यह मदद देने के लिए प्रशासन दिन-रात काम कर रहा है।

प्रवासी मजदूरों का भी रखा गया ध्यान

सूरत को देश की डायमंड और टेक्सटाइल सिटी कहा जाता है। यहां उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और उड़ीसा जैसे राज्यों से लाखों प्रवासी मजदूर रोजी-रोटी कमाने आते हैं। इस बाढ़ में सबसे ज्यादा मार इन्हीं गरीब मजदूरों पर पड़ी है। लगभग 150 से अधिक प्रवासी मजदूरों का पूरा सामान पानी में बह गया या खराब हो गया।

इस स्थिति को देखते हुए प्रशासन ने एक सराहनीय कदम उठाया है। अधिकारियों को सख्त निर्देश दिए गए हैं कि इन मजदूरों को तुरंत नए कपड़े, राशन और रहने की सुरक्षित जगह मुहैया कराई जाए। राहत कार्यों में इस बात का विशेष ध्यान रखा जा रहा है कि कोई भी व्यक्ति भूखा न सोए, चाहे वह स्थानीय निवासी हो या कोई प्रवासी श्रमिक।

आधी रात को निरीक्षण और स्वास्थ्य सुविधाओं पर जोर

बाढ़ के बाद सबसे बड़ा खतरा महामारियों और बीमारियों के फैलने का होता है। पानी उतरने के साथ ही डायरिया, टाइफाइड और डेंगू जैसी बीमारियों का जोखिम बढ़ जाता है। इसे रोकने के लिए सूरत नगर निगम और स्वास्थ्य विभाग ने युद्धस्तर पर काम शुरू कर दिया है। शहर के अलग-अलग हिस्सों में 10 विशेष मेडिकल टेंट और हेल्थ कैंप लगाए गए हैं। इन कैंपों में लोगों की मुफ्त जांच की जा रही है और जरूरी दवाइयां बांटी जा रही हैं।

जिन इलाकों में जलभराव ज्यादा समय तक रहा, वहां सुबह से लेकर रात तक डॉक्टरों की टीमें तैनात की गई हैं। इसके साथ ही साफ पानी की सप्लाई का समय भी बढ़ा दिया गया है ताकि लोगों को दूषित पानी न पीना पड़े। सड़कों की मरम्मत और कीटनाशकों के छिड़काव का काम भी तेजी से चल रहा है। खुद हर्ष संघवी ने आधी रात को प्रभावित इलाकों का दौरा कर सफाई व्यवस्था का जायजा लिया।

फिर जिंदा हुई ‘सूरत स्पिरिट’

सूरत शहर का इतिहास गवाह है कि इसने प्लेग, बाढ़ और दंगों जैसी कई बड़ी आपदाओं का सामना किया है। लेकिन हर बार यह शहर और मजबूत होकर उभरा है। स्थानीय लोग इसे ‘सूरत स्पिरिट’ कहते हैं। इस बार भी यही भावना देखने को मिल रही है। जिन लोगों के घर सुरक्षित थे, उन्होंने अपने घरों के दरवाजे प्रभावित लोगों के लिए खोल दिए। व्यापारिक इलाकों में दुकानदारों ने एक-दूसरे की दुकानों से कीचड़ साफ करने में मदद की।

मुस्लिम युवाओं के इस जज्बे ने ‘सूरत स्पिरिट’ में चार चांद लगा दिए हैं। उन्होंने यह साबित कर दिया है कि अतीत की कड़वी यादों को पीछे छोड़कर ही एक बेहतर भविष्य का निर्माण किया जा सकता है। मजहब की दीवारों को तोड़कर जब इंसानियत के लिए हाथ बढ़ते हैं, तो बड़ी से बड़ी आपदा भी घुटने टेक देती है।

उम्मीद की एक नई सुबह

सूरत की यह कहानी सिर्फ तबाही और नुकसान की कहानी नहीं है। यह कहानी प्रशासनिक मुस्तैदी, सामाजिक तालमेल और अटूट मानवीय संवेदनाओं की है। सरकारी तंत्र जहां आर्थिक मदद और स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने में लगा है, वहीं मुस्लिम समुदाय के नागरिक समाज की रीढ़ बनकर खड़े हैं। कमर तक पानी में डूबे इन युवाओं की तस्वीरें इस बात का सबसे बड़ा सबूत हैं कि विपरीत परिस्थितियों में भी भारत की साझा संस्कृति और भाईचारा पूरी तरह सुरक्षित है। जब समाज इस तरह एकजुट होकर संकट का मुकाबला करता है, तो हर आपदा के बाद उम्मीद की एक नई सुबह जरूर होती है।

AEO

सूरत बाढ़ में मुस्लिम युवाओं ने क्या किया?

मुस्लिम युवाओं ने कमर तक पानी में उतरकर बाढ़ प्रभावित लोगों तक भोजन, पीने का पानी, दवाइयां और राहत सामग्री पहुंचाई। उन्होंने बिना किसी धार्मिक भेदभाव के जरूरतमंदों की सहायता की।

गुजरात सरकार ने क्या राहत दी?

राज्य सरकार ने प्रभावित परिवारों के लिए 6800 रुपये की सहायता, स्वास्थ्य शिविर, प्रवासी मजदूरों के लिए राहत सामग्री और बीमा दावों के त्वरित निपटारे की व्यवस्था शुरू की है।

इस घटना का सबसे बड़ा संदेश क्या है?

सूरत की बाढ़ ने दिखाया कि संकट के समय इंसानियत, सामाजिक एकजुटता और आपसी सहयोग ही समाज की सबसे बड़ी ताकत होते हैं।

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