Culture

राष्ट्रीय पुरस्कार से ऑटो रिक्शा तक शफीक सैयद का संघर्ष

मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नई दिल्ली

सोशल मीडिया पर इन दिनों एक तस्वीर और एक कहानी फिर तेजी से साझा की जा रही है। दावा किया जा रहा है कि राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता अभिनेता शफीक सैयद आज ऑटो रिक्शा चलाकर अपना जीवन यापन कर रहे हैं। इस पोस्ट को देखकर कई लोग इसे ताजा घटना मान रहे हैं। जबकि सच्चाई यह है कि यह कहानी नई नहीं है। शफीक सैयद के संघर्ष की यह खबर पहली बार करीब डेढ़ दशक पहले सामने आई थी।

हालांकि समय बीतने के बावजूद यह कहानी आज भी लोगों को भावुक कर देती है। इसकी वजह सिर्फ एक अभिनेता का संघर्ष नहीं बल्कि फिल्मी दुनिया की वह सच्चाई है जहां शुरुआती सफलता हमेशा लंबे करियर की गारंटी नहीं बनती।

घर से भागकर मुंबई पहुंचा एक किशोर

शफीक सैयद का बचपन बेहद साधारण परिस्थितियों में बीता। उनका परिवार बेंगलुरु की एक झुग्गी बस्ती में रहता था। वर्ष 1986 में वह कुछ दोस्तों के साथ बिना किसी योजना के घर छोड़कर मुंबई पहुंच गए।

उनके मन में सिर्फ एक सवाल था। क्या मुंबई सचमुच वैसी ही है जैसी फिल्मों में दिखाई जाती है।

मुंबई पहुंचने के बाद उनके पास न रहने की जगह थी और न कमाई का कोई साधन। कई दिनों तक उन्होंने चर्चगेट रेलवे स्टेशन के आसपास दूसरे बेघर बच्चों के साथ फुटपाथ पर रातें बिताईं।

20 रुपये की तलाश ने बदल दी जिंदगी

एक दिन एक महिला उनके पास आईं। उन्होंने सड़क पर रहने वाले बच्चों के लिए आयोजित एक थिएटर वर्कशॉप में शामिल होने का प्रस्ताव दिया। इसके बदले रोज 20 रुपये मिलने थे।

ज्यादातर बच्चों ने इसे मजाक समझकर मना कर दिया। लेकिन शफीक तैयार हो गए। उन्हें पैसों की जरूरत थी। यही फैसला उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुआ।

करीब 120 बच्चों में से उनका चयन मीरा नायर की फिल्म सलाम बॉम्बे के मुख्य किरदार कृष्णा के लिए हुआ।

एक फिल्म जिसने दुनिया का ध्यान खींचा

1988 में रिलीज हुई सलाम बॉम्बे भारतीय सिनेमा की सबसे चर्चित फिल्मों में शामिल है। फिल्म ने मुंबई की सड़कों पर रहने वाले बच्चों की जिंदगी को बेहद वास्तविक तरीके से दुनिया के सामने रखा।

फिल्म का निर्देशन मीरा नायर ने किया था। इसमें रघुवीर यादव, नाना पाटेकर, अनिता कंवर और हंसा विट्ठल जैसे कलाकार भी नजर आए।

फिल्म को कान फिल्म महोत्सव में सम्मान मिला। इसे ऑस्कर पुरस्कार में सर्वश्रेष्ठ विदेशी भाषा फिल्म की श्रेणी में नामांकन भी मिला। साथ ही राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार सहित कई अंतरराष्ट्रीय सम्मान भी प्राप्त हुए।

इसी फिल्म ने शफीक सैयद को राष्ट्रीय पहचान दिलाई।

15 हजार रुपये और एक बड़ा सपना

शफीक सैयद ने एक साक्षात्कार में बताया था कि फिल्म की शूटिंग करीब 52 दिन चली। इसके लिए उन्हें 15 हजार रुपये मिले।

उस समय यह रकम उनके लिए किसी सपने से कम नहीं थी।

उन्हें लगा कि अब फिल्म उद्योग में उनके लिए नए रास्ते खुल जाएंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

पुरस्कार मिला लेकिन काम नहीं मिला

फिल्म की सफलता के बाद शफीक ने कई प्रोडक्शन हाउस के चक्कर लगाए। वह अपने साथ अखबारों की कतरनें और तस्वीरें लेकर जाते थे ताकि लोग उनकी पहचान कर सकें।

लेकिन उन्हें नई फिल्मों में काम नहीं मिला।

उन्होंने बाद में बताया कि कई सहायक निर्देशक उनसे सिर्फ औपचारिक बातचीत करते। कोई पूछता कि खाना खाया या नहीं। लेकिन अभिनय का मौका किसी ने नहीं दिया।

यहीं से उनका संघर्ष फिर शुरू हो गया।

सिर्फ एक और फिल्म, फिर खत्म हुआ फिल्मी सफर

सलाम बॉम्बे के बाद शफीक सैयद ने निर्देशक गौतम घोष की फिल्म पतंग में काम किया।

इसके बाद उन्हें कोई बड़ा अवसर नहीं मिला।

धीरे धीरे उन्होंने फिल्म उद्योग से दूरी बना ली और बेंगलुरु लौट गए।

ऑटो रिक्शा बना रोजी रोटी का सहारा

बेंगलुरु लौटने के बाद उन्होंने परिवार की जिम्मेदारी उठाने के लिए ऑटो रिक्शा चलाना शुरू किया।

साल 2009 में जब फिल्म स्लमडॉग मिलियनेयर पूरी दुनिया में चर्चा में थी तब एक अखबार ने शफीक को खोज निकाला।

तब पता चला कि राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता यह अभिनेता सामान्य आय पर अपना परिवार चला रहा है।

यहीं से उनकी कहानी पहली बार राष्ट्रीय चर्चा का विषय बनी।

फिर भी अभिनय से पूरी तरह नहीं टूटा रिश्ता

बाद के वर्षों में उन्होंने कन्नड़ टेलीविजन की कुछ प्रोडक्शन कंपनियों में सहायक के रूप में भी काम किया।

उन्होंने अपनी जिंदगी पर आधारित एक आत्मकथा भी लिखी जिसका शीर्षक आफ्टर सलाम बॉम्बे रखा।

उनकी इच्छा थी कि कोई निर्देशक इस कहानी को फिर से बड़े पर्दे पर लेकर आए।

मीरा नायर का बड़ा फैसला

सलाम बॉम्बे की सफलता के बाद मीरा नायर ने डॉक्टर दिनाज स्टैफर्ड के साथ मिलकर सलाम बालक ट्रस्ट की स्थापना की।

इस संस्था का उद्देश्य सड़क पर रहने वाले बच्चों को शिक्षा, स्वास्थ्य, आश्रय और बेहतर भविष्य देना था।

आज यह संस्था हजारों बच्चों के पुनर्वास का काम कर रही है।

सोशल मीडिया पर फिर क्यों वायरल हुई कहानी

हाल के दिनों में सोशल मीडिया पर कई पोस्ट में दावा किया गया कि शफीक सैयद अभी ऑटो चला रहे हैं और यह हाल ही की घटना है।

असल में यह जानकारी नई नहीं है। उनके संघर्ष की खबर पहले भी कई बार प्रकाशित हो चुकी है।

फिर भी यह कहानी लोगों को इसलिए प्रभावित करती है क्योंकि यह फिल्मी दुनिया के उस पक्ष को सामने लाती है जहां हर सफल शुरुआत का अंत सफल करियर में नहीं होता।

आज कहां हैं शफीक सैयद

शफीक सैयद अब बेंगलुरु के बाहरी इलाके में अपने परिवार के साथ रहते हैं।

उनके परिवार में पत्नी, बच्चे और मां शामिल हैं।

वह सार्वजनिक जीवन से काफी दूर रहते हैं लेकिन उनकी कहानी समय समय पर लोगों को यह याद दिलाती है कि सम्मान और पुरस्कार हमेशा आर्थिक सुरक्षा की गारंटी नहीं होते।

निष्कर्ष

शफीक सैयद की कहानी केवल एक अभिनेता की कहानी नहीं है। यह संघर्ष, उम्मीद और जिंदगी की अनिश्चितताओं का दस्तावेज है।

एक समय पूरी दुनिया ने उनके अभिनय की सराहना की। राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। ऑस्कर नामित फिल्म का चेहरा बने। लेकिन उसके बाद भी उन्हें सामान्य जीवन जीने के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ी।

उनकी यात्रा यह सिखाती है कि सफलता का असली अर्थ केवल तालियां नहीं बल्कि लगातार अवसर मिलना भी है।


Frequently Asked Questions

शफीक सैयद कौन हैं

वह 1988 की फिल्म सलाम बॉम्बे के मुख्य बाल कलाकार और राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता अभिनेता हैं।

शफीक सैयद ऑटो रिक्शा क्यों चलाने लगे

फिल्मों में लगातार काम नहीं मिलने के कारण उन्होंने बेंगलुरु में ऑटो रिक्शा चलाकर परिवार का पालन पोषण किया।

सलाम बॉम्बे फिल्म क्यों प्रसिद्ध है

यह फिल्म सड़क पर रहने वाले बच्चों के जीवन पर आधारित थी। इसे ऑस्कर में नामांकन मिला और कई अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार भी मिले।

सलाम बालक ट्रस्ट क्या है

मीरा नायर द्वारा स्थापित संस्था जो बेघर और सड़क पर रहने वाले बच्चों की शिक्षा और पुनर्वास का काम करती है।

Quick Answer

शफीक सैयद कौन हैं?

शफीक सैयद 1988 की चर्चित फिल्म सलाम बॉम्बे के मुख्य बाल कलाकार हैं। इस फिल्म के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला था। बाद में फिल्मों में काम नहीं मिलने के कारण उन्हें बेंगलुरु में ऑटो रिक्शा चलाकर परिवार का पालन पोषण करना पड़ा। हाल के दिनों में उनकी पुरानी कहानी सोशल मीडिया पर फिर वायरल हो रही है।