पुरानी दिल्ली का इतिहास और एसवाई कुरैशी की उपलब्धियां
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नौशाद अख्तर
मुस्लिम नाउ की ‘यादें’ श्रृंखला में आप पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस. वाई. कुरैशी की जीवन-यात्रा का एक दिलचस्प हिस्सा पढ़ ही रहे हैं। आइए, यह भी जानिए कि मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में उन्होंने भारतीय चुनाव व्यवस्था में कौन-कौन से महत्वपूर्ण सुधार किए। साथ ही, उनकी नजरों से उस पुरानी दिल्ली की भी झलक देखिए, जिसे कभी शाहजहाँनाबाद के नाम से जाना जाता था और जिसकी गलियों में सदियों का इतिहास आज भी सांस लेता है।
गौरतलब है कि एस. वाई. कुरैशी का परिवार पिछले लगभग पाँच सौ वर्षों से पुरानी दिल्ली से जुड़ा रहा है। हालांकि, वर्तमान में वे अपने परिवार के साथ गुरुग्राम में निवास करते हैं।
भारत के 17वें मुख्य चुनाव आयुक्त डॉ. एसवाई कुरैशी का कार्यकाल 30 जुलाई 2010 से 10 जून 2012 तक रहा। उनका कार्यकाल भारतीय चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता, जनभागीदारी और संस्थागत सुधारों के लिए विशेष रूप से जाना जाता है।
मुख्य चुनावी सुधार और प्रमुख पहलें
1. राष्ट्रीय मतदाता दिवस (National Voters’ Day) की शुरुआत
डॉ. कुरैशी के कार्यकाल का सबसे ऐतिहासिक कदम 25 जनवरी 2011 को राष्ट्रीय मतदाता दिवस की शुरुआत करना था। भारत निर्वाचन आयोग के स्थापना दिवस (25 जनवरी 1950) को यादगार बनाने और नए युवा मतदाताओं को जोड़ने के लिए यह फैसला लिया गया। इसके तहत हर साल 18 वर्ष की आयु पूरी करने वाले युवाओं को पहचान पत्र देकर मतदान के प्रति जागरूक किया जाता है।
2. ‘स्वीप’ (SVEEP) कार्यक्रम की स्थापना
युवाओं, महिलाओं और शहरी क्षेत्र के मतदाताओं की चुनाव में कम भागीदारी को दूर करने के लिए उन्होंने SVEEP कार्यक्रम (Systematic Voters’ Education and Electoral Participation) को राष्ट्रीय स्तर पर संस्थागत रूप दिया। इस अभियान के जरिए मतदाता शिक्षा और जागरूकता को चुनाव प्रबंधन का अहम हिस्सा बनाया गया।
3. चुनाव व्यय निगरानी प्रभाग (Expenditure Monitoring Division)
चुनावों में धनबल के बढ़ते प्रभाव पर लगाम लगाने के लिए डॉ. कुरैशी ने निर्वाचन आयोग में एक समर्पित ‘व्यय निगरानी प्रभाग’ का गठन किया। इसके अंतर्गत उम्मीदवारों के चुनावी खर्च पर नजर रखने के लिए विशेष उड़न दस्तों, स्थैतिक निगरानी टीमों और आयकर विभाग के अधिकारियों की तैनाती अनिवार्य की गई।
4. ‘पेड न्यूज’ पर नकेल
मीडिया में रुपयों के बदले खबरें छपवाने (Paid News) की प्रथा को रोकने के लिए उनके कार्यकाल में जिला और राज्य स्तर पर मीडिया प्रमाणन और निगरानी समितियां (MCMC) गठित की गईं। पेड न्यूज साबित होने पर उस खर्च को उम्मीदवार के आधिकारिक चुनावी खर्च में जोड़ा जाने लगा।
5. इंडिया इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डेमोक्रेसी एंड इलेक्शन मैनेजमेंट (IIIDEM)
चुनाव अधिकारियों के पेशेवर प्रशिक्षण और अन्य लोकतांत्रिक देशों को चुनावी प्रबंधन में सहयोग देने के लिए नई दिल्ली में IIIDEM की स्थापना की गई।
प्रमुख उपलब्धियां और विधानसभा चुनाव
- सफलतापूर्वक चुनाव संचालन: उनके कार्यकाल के दौरान उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, पंजाब, असम और केरल जैसे बड़े राज्यों में पारदर्शी तरीके से विधानसभा चुनाव संपन्न कराए गए।
- मॉडल आचार संहिता का कड़ा पालन: चुनावों के दौरान सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग और मतदाताओं को प्रलोभन देने की घटनाओं पर सख्त कार्रवाई की गई।
- चुनावी साक्षरता और किताबें: सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने भारत की चुनावी प्रक्रिया की विशालता पर An Undocumented Wonder: The Making of the Great Indian Election नामक पुस्तक भी लिखी।
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शाहजहाँनाबाद की रूह: इतिहास, संस्कृति और 1947 के वे दिन
यमुना के किनारे बसी पुरानी दिल्ली केवल एक शहर नहीं, बल्कि वक्त की छाती पर उकेरी गई एक जीवित दास्तान है। जिसे कभी मुग़ल बादशाह शाहजहाँ ने सन् 1639 में अपनी नई राजधानी ‘शाहजहाँनाबाद’ के रूप में तराशा था, वह वक्त के अनगिनत थपेड़ों को सहकर भी अपनी एक अलग रूह संभाले हुए है। लाल पत्थरों की प्राचीरों से लेकर तंग और बलखाती गलियों तक, पुरानी दिल्ली के कण-कण में इतिहास की प्रतिध्वनि सुनाई देती है।
स्थापत्य और तहज़ीब की विरासत
शाहजहाँनाबाद की वास्तुकला अपने आप में एक दर्शन थी। लाल किला जहाँ सत्ता का केंद्र था, वहीं जामा मस्जिद अवाम के आध्यात्मिक विश्वास का प्रतीक बनी। चांदनी चौक, जिसे कभी बादशाह की बेटी जहाँआरा ने नहर-ए-बहिश्त (स्वर्ग की नहर) के किनारे डिज़ाइन किया था, वक्त के साथ एशिया के सबसे बड़े व्यापारिक और सांस्कृतिक केंद्रों में तब्दील हो गया।
पुरानी दिल्ली की सबसे बड़ी पहचान उसकी ‘गंगा-जमुनी तहज़ीब’ रही है। यह वह शहर है जहाँ मिर्ज़ा ग़ालिब की हवेलियों में शायरी की महफ़िलें सजती थीं, तो उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ाँ की शहनाई का जादू बिखरता था। हवेलियों के ऊँचे झरोखे, नक्काशीदार लकड़ी के दरवाजे, और ‘कटरा’, ‘कड़ा’ व ‘कूचा’ जैसे शब्दों से बुने गए मुहल्ले महज़ पते नहीं थे; वे एक साझे जीवन-दर्शन का हिस्सा थे। यहाँ बोली जाने वाली उर्दू और खड़ी बोली में जो मिठास, लहज़ा और नज़ाकत थी, वह दुनिया में कहीं और देखने को नहीं मिलती।
स्वाद और रोज़मर्रा का जीवन
पुरानी दिल्ली की विरासत को उसके जायके से अलग करके नहीं देखा जा सकता। यहाँ का भोजन केवल पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि एक कला है।
- पराठे वाली गली के देशी घी के पराठे
- मटिया महल और बल्लीमारान के कबाब और नाहरी
- दौलत की चाट और फिरनी
- पुराने उस्तादों के हलवे और गाढ़ी मलाई वाली लस्सी
सुबह की शुरुआत फज्र की अज़ान और मंदिरों की घंटियों की मिली-जुली आवाज़ों के साथ होती थी। कबूतरबाज़ी, पतंगबाज़ी और शाम को नुक्कड़ की दुकानों पर चाय की चुस्कियों के साथ होने वाली सियासी व साहित्यिक बहसें यहाँ के जनजीवन की धड़कन थीं।
1947: आज़ादी का उजाला और विभाजन का दर्द
अगस्त 1947 का दौर पुरानी दिल्ली के इतिहास का सबसे संवेदनशील और भावुक मोड़ था। एक तरफ़ 15 अगस्त 1947 को लाल किले की प्राचीर से आज़ादी का पहला तिरंगा फहराया जा रहा था और पूरे मुल्क में नई सुबह का जश्न था, तो दूसरी तरफ़ विभाजन की आग पुरानी दिल्ली की हवा में भी धुआँ घोल रही थी।
उस दौर में पुरानी दिल्ली के जनजीवन की तस्वीर दो रंगों में बँटी हुई थी:
1. अपनों को खोने का ख़ौफ़ और पलायन बल्लीमारान, दरियागंज, और चावड़ी बाज़ार के कई परिवार, जो सदियों से इस मिट्टी में रचे-बसे थे, अचानक रातों-रात बेगाने हो गए। हवेलियों में ताले लटक गए और जो गलियाँ कभी मुशायरों से गूँजती थीं, वहाँ ख़ामोशी और अनहोनी का डर पसर गया। कई लोग भारी मन से वाघा पार कर गए, लेकिन अपनी मिट्टी का मोह पीछे छोड़ गए।
2. साझे भाईचारे की मिसाल दंगों और अविश्वास के उस तूफ़ान में भी पुरानी दिल्ली का मूल ताना-बाना पूरी तरह नहीं बिखरा। मौलाना जुबैर कुरैशी जैसे अनगिनत परिवारों ने अपने पुरखों की ज़मीन छोड़कर जाने से साफ़ इनकार कर दिया। पुरानी दिल्ली के कई हिंदू और मुस्लिम पड़ोसियों ने एक-दूसरे के घरों पर पहरे दिए और अपने दोस्तों व पड़ोसियों को किसी भी तरह का नुकसान पहुँचने से बचाया।
3. नए चिराग़ और नई ज़िंदगी विभाजन के बाद पश्चिमी पंजाब से आए शरणार्थियों के जत्थे जब दिल्ली पहुँचे, तो पुरानी दिल्ली ने उन्हें भी अपनी गोद में समेटा। लाजपत राय मार्केट और चांदनी चौक के आसपास पंजाबी संस्कृति और व्यापार का नया समागम हुआ। पुरानी दिल्ली ने इस नए दर्द को भी अपने भीतर समोया और फिर से अपनी ज़िंदगी की गाड़ी को पटरी पर ले आई।
एक अमर शहर का अक्स
पुरानी दिल्ली सिर्फ़ इमारतों या ज़मीन का एक टुकड़ा नहीं है, यह एक अहसास है। यहाँ अतीत और वर्तमान एक साथ सांस लेते हैं। मुग़ल काल का वैभव, ब्रिटिश दौर की उथल-पुथल, 1947 का विभाजन और आधुनिक भारत की तेज़ रफ़्तार—सब कुछ इस शहर की आत्मा में रच-बस गया है। यही वजह है कि तमाम बदलावों के बावजूद, आज भी जब कोई बल्लीमारान की गली से गुज़रता है, तो उसे ग़ालिब का कोई शेर हवा में तैरता हुआ सा महसूस होता है।

