यादें: अरशद वारसी की जिंदगी का वह ज़ख्म, जो कभी नहीं भरा
नौशाद अख्तर
कुछ यादें उम्र के साथ पुरानी नहीं पड़तीं। वक्त उन्हें मिटाने के बजाय और गहरा करता जाता है। वे जिंदगी के किसी कोने में चुपचाप बैठी रहती हैं और फिर कभी किसी सवाल, किसी आवाज़ या किसी खामोश रात के बहाने अचानक सामने आ खड़ी होती हैं। आदमी कितना भी आगे निकल जाए, कितनी भी शोहरत हासिल कर ले, कुछ पल ऐसे होते हैं जिनसे वह कभी आगे नहीं निकल पाता। अभिनेता अरशद वारसी की जिंदगी में भी एक ऐसा ही पल है, जो बरसों गुजर जाने के बाद भी उनके भीतर कहीं जिंदा है।

पर्दे पर अरशद वारसी को देखकर शायद ही कोई यह अंदाजा लगा पाए कि उनकी हंसी के पीछे कितनी गहरी उदासी छिपी है। उनकी कॉमिक टाइमिंग पर दर्शक ठहाके लगाते हैं, उनकी अदाकारी लोगों के चेहरों पर मुस्कान ले आती है, लेकिन इस मुस्कुराते चेहरे के पीछे एक ऐसा बेटा भी है, जो अपनी मां की एक अधूरी इच्छा को आज तक अपने दिल से नहीं निकाल पाया। यह एक ऐसा मलाल है, जिसे उन्होंने वक्त के हवाले करने की बहुत कोशिश की, लेकिन वक्त भी उसे उनसे छीन नहीं सका।
जब कभी उनकी मां का जिक्र आता है, तो अरशद की आवाज में एकाएक ठहराव उतर आता है। आंखों की चमक धीमी पड़ जाती है और चेहरे पर ऐसी उदासी उतरती है, जिसे शब्दों में बयान करना मुश्किल है। उस क्षण वे किसी मशहूर अभिनेता की तरह नहीं लगते। वे बस एक बेटे की तरह दिखाई देते हैं—एक ऐसा बेटा, जो बरसों बाद भी अपने अतीत के एक छोटे-से कमरे में कैद है और जिसकी आंखों के सामने उसकी मां आखिरी बार पानी मांग रही है।
वह दौर अरशद की जिंदगी का बेहद मुश्किल दौर था। घर में खुशहाली नहीं थी। पैसे की तंगी ने परिवार को बुरी तरह घेर रखा था। जिंदगी की छोटी-छोटी जरूरतें भी कभी-कभी बड़ी चुनौती बन जाती थीं। इसी बीच उनकी मां गंभीर रूप से बीमार पड़ गईं। बीमारी बढ़ती गई और आखिरकार वह वक्त आया, जब उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। अस्पताल की सफेद दीवारों, दवाइयों की गंध और मशीनों की आवाजों के बीच अरशद अपनी मां के पास बैठे रहते थे। उम्र छोटी थी, लेकिन हालात ने उन्हें वक्त से पहले बड़ा कर दिया था।
फिर वह रात आई, जिसे अरशद शायद अपनी पूरी जिंदगी भूलना चाहें और फिर भी भूल नहीं सकते।
अस्पताल के कमरे में उनकी मां बिस्तर पर थीं। बीमारी ने उन्हें बेहद कमजोर कर दिया था। इलाज चल रहा था और डॉक्टरों ने साफ हिदायत दी थी कि उन्हें पानी नहीं दिया जाना चाहिए। अरशद के लिए डॉक्टर की बात ही उस वक्त सबसे बड़ी हकीकत थी। उन्हें लगता था कि डॉक्टर जो कह रहे हैं, वही उनकी मां की जिंदगी बचाने का रास्ता है। वह मां के सिरहाने बैठे रहे। रात गहराती गई और अस्पताल की खामोशी और भारी होती चली गई।

इसी खामोशी के बीच मां ने अपने सूखे होंठों को हिलाया और बेटे से पानी मांगा।
एक मां ने अपने बेटे से शायद जिंदगी की सबसे मामूली चीज मांगी थी—एक घूंट पानी।
लेकिन उस रात वह एक घूंट पानी अरशद के लिए जिंदगी भर का सवाल बन गया।
उन्होंने मां की ओर देखा। दिल ने कहा कि पानी दे दो। लेकिन दिमाग में डॉक्टर की हिदायत गूंज रही थी। उन्होंने खुद को रोक लिया। मां ने फिर पानी मांगा। शायद प्यास बढ़ती जा रही थी। शायद शरीर साथ छोड़ रहा था। शायद वह अपने बेटे की ओर आखिरी उम्मीद से देख रही थीं। लेकिन अरशद ने डॉक्टरों की सलाह को मां की पुकार से ऊपर रख दिया। वह क्या जानते थे कि जिंदगी उन्हें कुछ ही पलों बाद ऐसा सबक देने वाली है, जिसे कोई किताब नहीं सिखा सकती।
मां पानी मांगती रहीं और बेटा बेबस बैठा रहा।
फिर अचानक वह आवाज बंद हो गई।
कमरे में एक ऐसा सन्नाटा उतर आया, जिसमें किसी सवाल का जवाब नहीं था। मां चली गईं।
अरशद के लिए वह सिर्फ मां की मौत नहीं थी। उनके भीतर उस रात एक ऐसा अपराधबोध जन्मा, जिसने वर्षों बाद भी उनका पीछा नहीं छोड़ा। उनके मन में बार-बार यही सवाल उठता रहा कि क्या होता अगर उस रात उन्होंने डॉक्टर की हिदायत को एक तरफ रखकर मां को पानी पिला दिया होता? क्या उनकी मां कुछ और देर जी पातीं? क्या वह उन्हें बचा सकते थे? क्या वह उनकी आखिरी इच्छा पूरी कर सकते थे?

इन सवालों का कोई जवाब उनके पास कभी नहीं आया।
शायद यही वजह है कि वह एक घूंट पानी उनकी स्मृतियों में आज भी समंदर से कहीं बड़ा है।
किसी बातचीत या इंटरव्यू में जब अरशद उस रात को याद करते हैं, तो उनकी आवाज में वह पुराना दर्द लौट आता है। वह कहते हैं कि मां बार-बार पानी मांग रही थीं और वह डॉक्टर की सलाह मानते रहे। फिर उनके भीतर से एक ऐसा ‘काश’ निकलता है, जो शायद जिंदगी भर उनका पीछा करता रहेगा—काश, उस रात उन्होंने मां को पानी पिला दिया होता।
लेकिन जिंदगी ‘काश’ से नहीं बदलती।
मां के जाने का दुख अभी अरशद के भीतर ठहरा ही हुआ था कि कुछ समय बाद पिता का साया भी उनके सिर से उठ गया। जिस उम्र में किसी बच्चे को मां-बाप का हाथ थामकर दुनिया समझनी चाहिए, उस उम्र में अरशद ने अकेलेपन को समझना शुरू कर दिया। घर का सहारा खत्म हो चुका था। पढ़ाई छूट गई। पेट की जरूरतों ने किताबों की जगह ले ली। जिंदगी अब सपनों से नहीं, जरूरतों से चलने लगी थी।
अरशद ने घर-घर जाकर सामान बेचा। छोटी-मोटी नौकरियां कीं। जो काम मिला, किया। भूख, तन्हाई और मजबूरी के बीच उन्होंने जिंदगी को करीब से देखा। वह दौर शायद किसी भी इंसान को तोड़ सकता था, लेकिन अरशद टूटे नहीं। उनके भीतर कहीं एक जिद थी—जिंदगी ने उनसे बहुत कुछ छीन लिया है, लेकिन वह जिंदगी को खुद से हारने नहीं देंगे।
उन्होंने अपने दर्द को अपनी ताकत बना लिया।
डांस की दुनिया में कदम रखा। मेहनत की। संघर्ष किया। गिरते-संभलते आगे बढ़ते रहे। धीरे-धीरे उनके हुनर ने उन्हें पहचान दिलानी शुरू की। फिर फिल्मों का रास्ता खुला और एक दिन वही अरशद वारसी करोड़ों लोगों के चेहरे पर मुस्कान लाने वाले अभिनेता बन गए। उनकी अदाकारी ने उन्हें शोहरत दी, कामयाबी दी और वह मुकाम दिया, जिसका सपना शायद कभी उन्होंने अपनी मुश्किल भरी जिंदगी के दिनों में भी पूरी तरह नहीं देखा होगा।

लेकिन कुछ कामयाबियां अतीत को मिटा नहीं पातीं।
आज अरशद वारसी के पास नाम है, शोहरत है और लाखों लोगों का प्यार है। उनके किरदारों पर लोग हंसते हैं, तालियां बजाते हैं और उनकी कॉमिक टाइमिंग के कायल हैं। मगर उस हंसी के पीछे एक ऐसी खामोशी है, जिसे शायद सिर्फ अरशद ही सुन सकते हैं।
कभी-कभी कामयाबी इंसान को वहां पहुंचा देती है, जहां से वह अपने अतीत को बहुत दूर खड़ा देख सकता है। लेकिन कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं, जिनकी दूरी कम नहीं होती। मां उनमें सबसे ऊपर होती है।
शायद इसलिए आज भी अरशद के भीतर वह छोटा-सा बच्चा जिंदा है, जो अस्पताल के उस कमरे में अपनी मां के सिरहाने बैठा है। मां के होंठ सूखे हैं। आंखों में प्यास है। वह बेटे से पानी मांग रही है और बेटा डॉक्टर की हिदायत के सामने असमंजस में खड़ा है।
फिर सब कुछ शांत हो जाता है।
अरशद की जिंदगी आगे बढ़ जाती है, लेकिन वह रात वहीं ठहर जाती है।
कितनी अजीब बात है—एक अभिनेता जिसने पूरी दुनिया को हंसाया, उसके अपने जीवन की सबसे गहरी कहानी एक ऐसी रात से जुड़ी है, जिसमें हंसी का कोई नामोनिशान नहीं था। एक रात, एक मां, एक बेटा और पानी की एक घूंट।
वक्त गुजर गया। जिंदगी बदल गई। अरशद वारसी सितारा बन गए। मगर मां की वह प्यास उनकी यादों में आज भी बुझी नहीं है।
शायद कुछ जख्म भरने के लिए नहीं होते।
वे बस इंसान के साथ जीते हैं, उसकी खामोशियों में सांस लेते हैं और कभी-कभी किसी सवाल के जवाब में आंखों से बाहर आ जाते हैं।

अरशद की जिंदगी में भी वह जख्म आज तक मौजूद है—एक मां की आखिरी पुकार की तरह।
“बेटा, थोड़ा पानी पिला दे…”
और शायद उस आवाज का जवाब अरशद के पास आज भी नहीं है।

