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यादें: सृजन पाल सिंह ने बताया,डॉ. कलाम चाहते थे कि दुनिया उन्हें किस रूप में याद रखे ?

दुनिया में बहुत कम लोग ऐसे होते हैं, जिनकी जिंदगी दूसरों के लिए प्रेरणा बन जाती है। और उससे भी कम ऐसे होते हैं, जिनकी आखिरी इच्छा उनके पूरे जीवन के मकसद का आईना बन जाए। भारत के मिसाइल मैन और पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम उन्हीं विरले लोगों में शामिल थे।

जरा सोचिए, अगर किसी से पूछा जाए कि डॉ. कलाम चाहते होंगे कि दुनिया उन्हें किस रूप में याद रखे—एक महान वैज्ञानिक के तौर पर, मिसाइल मैन के रूप में, देश के राष्ट्रपति के रूप में या फिर भारत को विकसित राष्ट्र बनाने का सपना देखने वाले विजनरी के तौर पर?

शायद ज्यादातर लोग इनमें से कोई एक जवाब चुनेंगे।

लेकिन डॉ. कलाम का जवाब इन सब से अलग था।

उनकी इच्छा थी कि दुनिया उन्हें एक शिक्षक के रूप में याद रखे।

यह बात जितनी साधारण सुनाई देती है, उसके पीछे डॉ. कलाम की सोच उतनी ही असाधारण थी। उनकी इस आखिरी ख्वाहिश का खुलासा उनके करीबी सहकर्मी और सहयोगी रहे सृजन पाल सिंह ने एक वीडियो में किया है।

सृजन पाल सिंह वर्ष 2009 से 2015 तक डॉ. कलाम के साथ काम करते रहे। वह डॉ. कलाम की कई चर्चित पुस्तकों के सह-लेखक भी रहे, जिनमें Target 3 Billion: Innovative Solutions Towards Sustainable Development (2011), Reignited: Scientific Pathways to a Brighter Future (2015) और Advantage India: From Challenge to Opportunity जैसी पुस्तकें शामिल हैं।

सृजन पाल सिंह स्वयं लेखक, शिक्षा-प्रवर्तक और सामाजिक उद्यमी हैं तथा आईआईएम अहमदाबाद के स्वर्ण पदक विजेता रहे हैं। डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम और सृजन पाल सिंह ने मिलकर कलाम फाउंडेशन की स्थापना की थी, जिसके वह प्रबंध निदेशक हैं।

लेकिन सृजन पाल सिंह के लिए डॉ. कलाम सिर्फ उनके वरिष्ठ या सहकर्मी नहीं थे। वह उनके लिए ऐसे गुरु थे, जो सवालों के जरिए सोचने का रास्ता दिखाते थे।

कलाम का सवाल, जो युवाओं को भीतर तक झकझोर देता था

सृजन पाल सिंह बताते हैं कि डॉ. कलाम जब भी अपने युवा सहकर्मियों से मिलते, तो अक्सर उनसे एक सवाल जरूर पूछा करते थे—

“भविष्य में तुम्हें क्यों याद किया जाए, इसके बारे में तुम क्या सोचते हो?”

लेकिन कलाम साहब केवल सवाल पूछकर चुप नहीं हो जाते थे। वह युवाओं से कहते थे कि इस सवाल का अपना सबसे बेहतर जवाब खोजो।

दरअसल, डॉ. कलाम किसी युवा को उसके लक्ष्य का तैयार जवाब नहीं देना चाहते थे। वह चाहते थे कि युवा खुद अपने भविष्य के बारे में सोचे, अपना लक्ष्य तय करे और उस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए एक मजबूत रोडमैप तैयार करे।

यही उनकी सबसे बड़ी खूबी थी।

वह युवाओं को सिर्फ सपने देखने के लिए नहीं कहते थे, बल्कि उन्हें यह सोचने के लिए प्रेरित करते थे कि उनकी जिंदगी का ऐसा कौन-सा काम होगा, जिसके कारण लोग उन्हें आने वाले वर्षों में याद रखेंगे।

हर दिन जब यही सवाल दोहराया जाता, तो युवा वैज्ञानिक भी अलग-अलग जवाब देते।

कोई कहता—“मैं आगे चलकर बड़ा वैज्ञानिक बनना चाहता हूं।”

कोई कहता—“मैं एक बेहतरीन वक्ता बनना चाहता हूं।”

किसी का सपना देश के लिए नई तकनीक विकसित करना था।

तो कोई ऐसा भी था, जो भविष्य में राजनीति में आना चाहता था, क्योंकि उसे लगता था कि देश को दूरदर्शी और विजनरी नेताओं की जरूरत है।

हर जवाब अपने आप में अलग था।

लेकिन सृजन पाल सिंह के सामने एक दिन मुश्किल खड़ी हो गई।

डॉ. कलाम का सवाल तो वही था, लेकिन अब उनके पास नया जवाब नहीं था।

उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि आखिर इस सवाल का क्या उत्तर दें?

जब शिष्य ने गुरु से ही पूछ लिया सवाल

एक दिन डॉ. कलाम फिर वही सवाल पूछने वाले थे। लेकिन इससे पहले कि वह अपना सवाल दोहराते, सृजन पाल सिंह ने साहस जुटाकर उनसे ही पूछ लिया—

“सर, आप बताइए… भविष्य में आपको कैसे याद किया जाए?”

सवाल पूछते ही सृजन पाल सिंह को लगा कि कहीं उन्होंने कुछ गलत तो नहीं कह दिया।

इसलिए उन्होंने तुरंत अपनी बात को संभालते हुए डॉ. कलाम के सामने कुछ विकल्प रख दिए।

उन्होंने कहा—क्या आपको लोग स्पेस मैन ऑफ इंडिया के रूप में याद करें, क्योंकि आपने भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई?

या फिर मिसाइल मैन ऑफ इंडिया के रूप में, क्योंकि देश आपको इसी नाम से जानता है?

या आपको न्यूक्लियर मैन ऑफ इंडिया के तौर पर याद किया जाए, क्योंकि भारत की परमाणु शक्ति को मजबूत करने में आपकी महत्वपूर्ण भूमिका रही?

या फिर आपको पीपुल्स प्रेसिडेंट के रूप में याद किया जाए, क्योंकि देश के राष्ट्रपति के रूप में आपने आम लोगों, खासकर युवाओं के दिल में खास जगह बनाई?

सृजन पाल सिंह ने कहा—“सर, आपके लिए ये चार विकल्प हैं—ए, बी, सी और डी।”

डॉ. कलाम यह सुनकर मुस्कराए।

फिर कुछ देर शांत रहे।

इसके बाद उन्होंने अंग्रेजी में कहा कि इस सवाल का सही जवाब इन चारों विकल्पों में से कोई भी नहीं है।

सृजन पाल सिंह चौंक गए।

उन्होंने सोचा—आखिर ऐसा क्या विकल्प छूट गया, जिसे वह डॉ. कलाम के सामने नहीं रख पाए?

उन्होंने पूछा—“सर, क्या मुझसे कोई विकल्प छूट गया है?”

डॉ. कलाम ने कहा—

“हां, एक और विकल्प है—ऑप्शन ई।”

सृजन पाल सिंह उत्सुक हो गए।

अब डॉ. कलाम ने जो कहा, वह सिर्फ उनके लिए नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक बड़ा संदेश बन गया।

उन्होंने कहा—

“ई का मतलब है एजुकेशन। मैं चाहता हूं कि मुझे एक शिक्षक के रूप में याद रखा जाए।”

क्यों शिक्षक बनकर याद किया जाना चाहते थे कलाम?

यह सुनकर शायद कोई भी सोच सकता है कि देश के राष्ट्रपति रह चुके व्यक्ति के लिए शिक्षक कहलाना इतना महत्वपूर्ण क्यों था?

लेकिन डॉ. कलाम के लिए शिक्षक होना किसी पद से छोटा नहीं था।

उन्होंने अपनी बात समझाते हुए कहा कि शिक्षक दूसरों की जिंदगी में रोशनी फैलाता है।

शिक्षक ही राष्ट्र का निर्माण करते हैं।

एक शिक्षक ही किसी बच्चे को डॉक्टर बनने का सपना देता है। वही उसे वैज्ञानिक बनने की राह दिखाता है। वही किसी विद्यार्थी को इंजीनियर, आईएएस अधिकारी, राजनेता या समाज के लिए उपयोगी इंसान बनने की प्रेरणा देता है।

अर्थात डॉक्टर, वैज्ञानिक, इंजीनियर, अधिकारी और नेता भले ही अलग-अलग क्षेत्रों में देश की सेवा करते हैं, लेकिन उनके निर्माण के पीछे कहीं न कहीं एक शिक्षक जरूर होता है।

डॉ. कलाम ने इसी विचार को महाभारत के उदाहरण से समझाया।

उन्होंने कहा कि द्रोणाचार्य ने ही अर्जुन को बनाया था।

इसलिए उनकी इच्छा थी कि राष्ट्र उन्हें एक शिक्षक के रूप में याद करे।

सोचिए, जिस व्यक्ति ने भारत के अंतरिक्ष और रक्षा कार्यक्रम में महत्वपूर्ण योगदान दिया, जो देश का राष्ट्रपति बना, जिसे दुनिया मिसाइल मैन के नाम से जानती थी, वह अपनी सबसे बड़ी पहचान किसे मानता था?

शिक्षक को।

यही डॉ. कलाम की महानता थी।

राष्ट्रपति भवन से सीधे कक्षा तक

डॉ. कलाम की बात सिर्फ शब्दों तक सीमित नहीं थी। उन्होंने इसे अपने जीवन में भी उतारा।

2007 में भारत के 11वें राष्ट्रपति के रूप में अपना कार्यकाल पूरा करने के बाद वह अगले ही दिन अपने उस काम की ओर लौट गए, जिसे वह अपने दिल के सबसे करीब मानते थे—पढ़ाने की ओर।

उन्होंने विभिन्न संस्थानों में छात्रों के साथ काम किया। वह आईआईएम शिलांग, आईआईएम अहमदाबाद और आईआईएम इंदौर जैसे संस्थानों में विजिटिंग प्रोफेसर रहे। चेन्नई की अन्ना यूनिवर्सिटी में उन्होंने एयरोस्पेस इंजीनियरिंग पढ़ाई। वह तिरुवनंतपुरम स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ स्पेस साइंस एंड टेक्नोलॉजी के चांसलर भी रहे और छात्रों का मार्गदर्शन करते रहे।

राष्ट्रपति पद से मुक्त होने के बाद भी उन्होंने खुद को किसी पद की सीमाओं में कैद नहीं किया।

वह पूरे देश में घूमते रहे।

कभी स्कूल के बच्चों के बीच, कभी कॉलेज के छात्रों के बीच और कभी युवा वैज्ञानिकों के बीच।

उनकी असली ऊर्जा युवाओं से मिलकर आती थी।

और शायद इसीलिए उनके जीवन का आखिरी अध्याय भी एक कक्षा में ही लिखा गया।

आखिरी सांस तक शिक्षक

27 जुलाई 2015 को डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम आईआईएम शिलांग में छात्रों को संबोधित कर रहे थे।

वह वहां भी वही कर रहे थे, जिसे वह अपनी जिंदगी का सबसे महत्वपूर्ण काम मानते थे—युवाओं को शिक्षित करना, उनसे संवाद करना और उन्हें बड़े सपने देखने के लिए प्रेरित करना।

लेक्चर के दौरान उन्हें कार्डियक अरेस्ट हुआ और उनका निधन हो गया।

लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि जिस व्यक्ति ने अपनी जिंदगी में देश के सर्वोच्च पदों में से एक हासिल किया, उसकी आखिरी यात्रा भी किसी राजकीय समारोह या सत्ता के गलियारे से नहीं, बल्कि छात्रों के बीच एक शिक्षक के रूप में हुई।

शायद यही उनकी जिंदगी का सबसे खूबसूरत संयोग था।

जिस रूप में वह याद किया जाना चाहते थे, आखिरी समय तक उसी रूप में जीते रहे।

युवाओं के लिए डॉ. कलाम की आखिरी सीख

डॉ. कलाम की कहानी हमें सिर्फ यह नहीं सिखाती कि बड़ा आदमी कैसे बना जाता है।

यह उससे कहीं बड़ी बात सिखाती है—

बड़ा बनने से ज्यादा जरूरी है कि आपकी जिंदगी किसी और की जिंदगी को बड़ा बनाने के काम आए।

आप वैज्ञानिक बनें, डॉक्टर बनें, इंजीनियर बनें, अधिकारी बनें, कारोबारी बनें या किसी और पेशे में जाएं—लेकिन कोशिश यह हो कि आपके ज्ञान से किसी दूसरे का रास्ता रोशन हो।

क्योंकि पद खत्म हो जाते हैं।

उपाधियां छूट जाती हैं।

कुर्सियां बदल जाती हैं।

लेकिन किसी युवा की जिंदगी में जगाई गई उम्मीद, दिया गया ज्ञान और दिखाया गया सही रास्ता बहुत दूर तक जाता है।

डॉ. कलाम ने अपने जीवन से यही साबित किया।

वह राष्ट्रपति बने, लेकिन राष्ट्रपति पद से बड़ा उनका शिक्षक होना था।

वह वैज्ञानिक बने, लेकिन विज्ञान से बड़ी उनकी सोच थी।

वह मिसाइल मैन कहलाए, लेकिन उनका सबसे बड़ा हथियार मिसाइल नहीं, बल्कि युवाओं के भीतर सपने जगाने की क्षमता थी।

और शायद इसीलिए उनकी आखिरी ख्वाहिश आज भी हर युवा के लिए एक सवाल बनकर खड़ी है—

“जब तुम इस दुनिया में नहीं रहोगे, तब लोग तुम्हें किस काम के लिए याद करेंगे?”

इस सवाल का जवाब आज ही तलाशना होगा।

क्योंकि जिंदगी सिर्फ यह तय करने का नाम नहीं है कि हमें क्या बनना है।

जिंदगी का असली सवाल यह है कि—

हम दुनिया को अपने जाने के बाद क्या देकर जाना चाहते हैं?

डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने इसका जवाब अपने जीवन से दिया—

ज्ञान बांटो, युवाओं को प्रेरित करो, दूसरों की जिंदगी में रोशनी भरो और राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान दो।

शायद यही वजह है कि डॉ. कलाम आज हमारे बीच नहीं हैं, फिर भी करोड़ों युवाओं के सपनों में जिंदा हैं।

और यही किसी इंसान की सबसे बड़ी कामयाबी है—
वह चला जाए, लेकिन उसकी सोच लोगों को आगे बढ़ाती रहे।

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