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मुहम्मदी बेगम: उर्दू पत्रकारिता की पहली महिला आवाज

गुलरूख जहीन

भारतीय उपमहाद्वीप में महिलाओं की शिक्षा, अधिकार और सामाजिक स्थिति पर आज जितनी चर्चा होती है, उसकी जड़ें काफी पुरानी हैं। करीब सवा सौ साल पहले एक मुस्लिम महिला ने ऐसे दौर में पत्रकारिता का रास्ता चुना, जब महिलाओं का घर से बाहर निकलना भी असामान्य माना जाता था। उनका नाम था सैयदा मुहम्मदी बेगम

मुहम्मदी बेगम को महिला सशक्तिकरण और उर्दू पत्रकारिता के शुरुआती इतिहास की महत्वपूर्ण हस्ती माना जाता है। उन्होंने महिलाओं के लिए लिखने के साथ साथ उनके लिए एक ऐसा मंच तैयार किया, जहां शिक्षा, घरेलू जीवन, सामाजिक सुधार और महिलाओं के अधिकार जैसे विषयों पर खुलकर बात हो सके। वर्ष 1898 में उनके संपादन में ‘तहजीब ए निस्वान’ का प्रकाशन शुरू हुआ। स्रोत के अनुसार यह भारतीय उपमहाद्वीप की पहली महिला संपादक द्वारा संपादित साप्ताहिक पत्रिका थी।

यह कहानी केवल एक पत्रिका शुरू करने की कहानी नहीं है। यह उस दौर में एक महिला के अपने लिए शिक्षा, लेखन और सार्वजनिक भूमिका तलाशने की कहानी भी है।

ऐसे परिवार में हुई परवरिश

मुहम्मदी बेगम का जन्म वर्ष 1878 में पंजाब के शाहपुर में हुआ था। उनके पिता सैयद मुहम्मद शफी वजीराबाद हाई स्कूल के प्रधानाचार्य थे। वे लड़कियों की आधुनिक शिक्षा के समर्थक थे। परिवार का माहौल उस समय के सामान्य सामाजिक माहौल से काफी अलग था। उनकी प्रतिभा को दबाने के बजाय उन्हें पढ़ने और सीखने का अवसर मिला।

मुहम्मदी बेगम ने बचपन से ही पढ़ने लिखने में रुचि दिखाई। उन्हें सिलाई और खाना पकाने जैसे घरेलू काम भी आते थे। साथ ही उनका झुकाव साहित्य और दूसरी गतिविधियों की ओर भी था।

उस समय महिलाओं के लिए घर से बाहर निकलना आसान नहीं था। इसके बावजूद मुहम्मदी बेगम घुड़सवारी करती थीं और क्रिकेट भी खेलती थीं। यह बात अपने आप में उस समय की सामाजिक परिस्थितियों को देखते हुए उल्लेखनीय थी।

मुमताज अली से शादी ने बदली दिशा

मुहम्मदी बेगम की शादी वर्ष 1897 में मुमताज अली से हुई। मुमताज अली खुद महिलाओं की शिक्षा और अधिकारों के समर्थक थे। वे दारुल उलूम देवबंद से शिक्षित थे और लाहौर में प्रिंटिंग प्रेस तथा प्रकाशन का काम करते थे। वे सर सैयद अहमद खान के करीबी सहयोगियों में भी गिने जाते थे।

मुमताज अली ने महिलाओं के अधिकारों को लेकर ‘हुकूक ए निस्वान’ नाम की किताब भी लिखी थी। विवाह के बाद मुहम्मदी बेगम का जुड़ाव उनके प्रकाशन कार्य से बढ़ता गया।

उन्होंने प्रकाशन, संपादन और प्रूफरीडिंग का काम सीखा। कुछ ही समय में वह पत्रिका तैयार करने के लिए जरूरी कई जिम्मेदारियां संभालने लगीं। उन्हें हिंदी, उर्दू, फारसी, अरबी और अंग्रेजी का ज्ञान था।

उनकी शिक्षा को आगे बढ़ाने के लिए अलग अलग शिक्षकों की मदद भी ली गई। एक अंग्रेज महिला ने उन्हें अंग्रेजी सिखाई। एक हिंदू महिला से उन्होंने हिंदी सीखी। गणित के लिए अलग शिक्षक रखा गया। मुमताज अली उन्हें अरबी और फारसी पढ़ाते थे। इस तरह वह धीरे धीरे एक महिला पत्रिका के संपादन के लिए तैयार हुईं।

1 जुलाई 1898 को निकला ‘तहजीब ए निस्वान’

मुहम्मदी बेगम के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव वर्ष 1898 था। इसी साल उनके संपादन में ‘तहजीब ए निस्वान’ का पहला अंक प्रकाशित हुआ। इसका पहला अंक 1 जुलाई 1898 को सामने आया। पत्रिका का उद्देश्य महिलाओं की शिक्षा और सामाजिक उत्थान से जुड़े मुद्दों को सामने लाना था।

उस समय महिलाओं के लिए पत्रिकाएं पूरी तरह नई नहीं थीं। इससे पहले भी उर्दू में महिलाओं से जुड़ी पत्रिकाएं प्रकाशित हो चुकी थीं। स्रोत के अनुसार ‘रफीक ए निस्वान’ 1884 में लखनऊ से शुरू हुई थी। इसके बाद ‘अखबार उन निसा’ भी प्रकाशित हुई। हालांकि इन पत्रिकाओं का सफर लंबा नहीं रहा।

मुहम्मदी बेगम की खासियत यह थी कि उन्होंने महिलाओं के मुद्दों को केवल लेखों तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने शिक्षा, घरेलू जीवन, सामाजिक व्यवहार और महिला अधिकारों को एक व्यापक सुधार आंदोलन से जोड़ने की कोशिश की।

शुरुआत आसान नहीं थी

‘तहजीब ए निस्वान’ को समाज से तत्काल समर्थन नहीं मिला। उस दौर में महिलाओं के अधिकारों की बात करना कई लोगों को स्वीकार नहीं था।

मुहम्मदी बेगम और मुमताज अली कई शिक्षित लोगों को पत्रिका की प्रतियां मुफ्त भेजते थे। लेकिन कई बार इन प्रतियों के साथ आलोचना और आपत्तियों से भरे पत्र वापस आते थे। पाठकों की संख्या भी धीरे धीरे बढ़ी। स्रोत के अनुसार तीन महीने बाद पत्रिका के केवल 70 ग्राहक थे। तीन साल में यह संख्या 345 और पांच साल में करीब 428 तक पहुंची। एक अन्य विवरण में पांच वर्ष बाद प्रसार करीब 450 प्रतियां बताया गया है।

आज के दौर में ये आंकड़े छोटे लग सकते हैं। लेकिन उस समय महिलाओं की शिक्षा और महिला पत्रकारिता को लेकर सामाजिक सोच को देखते हुए यह प्रयास महत्वपूर्ण था।

केवल पत्रकार नहीं थीं, लेखिका भी थीं

मुहम्मदी बेगम ने पत्रकारिता के साथ साहित्य को भी अपनी आवाज बनाया। उन्होंने लड़कियों की शिक्षा, नैतिक विकास और सामाजिक व्यवहार से जुड़े विषयों पर कई किताबें लिखीं।

उनकी प्रमुख रचनाओं में ‘खानादारी’, ‘आदाब ए मुलाकात’, ‘रफीक ए अरूस’, ‘सुघढ़ बेटी’, ‘शरीफ बेटी’, ‘चंदन हार’, ‘आज कल’ और ‘सफिया बेगम’ शामिल हैं। उन्होंने अपने बेटे इम्तियाज अली ताज के लिए भी कविताएं और कहानियां लिखीं।

‘शरीफ बेटी’ जैसी रचनाओं में उन्होंने लड़कियों के जीवन और सामाजिक समस्याओं पर ध्यान खींचा। उनकी लेखनी का उद्देश्य केवल साहित्यिक मनोरंजन नहीं था। उसमें सामाजिक सुधार की स्पष्ट चिंता दिखाई देती थी।

महिलाओं के लिए दुकान और स्कूल का प्रयोग

मुहम्मदी बेगम के सामाजिक प्रयोग केवल पत्रिका और किताबों तक सीमित नहीं थे। स्रोत के अनुसार उन्होंने महिलाओं के लिए स्कूल स्थापित करने की दिशा में भी काम किया। उन्होंने एक ऐसी दुकान का प्रयोग भी किया जिसे महिलाएं चलाती थीं और महिलाओं के लिए ही संचालित किया जाता था। इस दुकान में पुरुषों के प्रवेश की अनुमति नहीं थी।

यह प्रयोग उस समय की सामाजिक परिस्थितियों में काफी अलग था। इसका मकसद महिलाओं को रोजमर्रा के सामाजिक और आर्थिक जीवन में अधिक सक्रिय भूमिका देना था।

वर्ष 1905 में उन्होंने ‘मुशीर ए मदर’ नाम की एक और महिला पत्रिका शुरू की। हालांकि यह भी लंबे समय तक नहीं चल सकी।

सिर्फ 30 साल की उम्र में निधन

मुहम्मदी बेगम का जीवन बहुत लंबा नहीं रहा। उपलब्ध स्रोत के अनुसार उनका निधन वर्ष 1908 में करीब 30 वर्ष की उम्र में हुआ। इतनी कम उम्र में उन्होंने पत्रकारिता, साहित्य और महिला शिक्षा के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण काम किए।

उनके बेटे इम्तियाज अली ताज आगे चलकर उर्दू साहित्य के प्रसिद्ध नाटककार बने। उनकी चर्चित कृति ‘अनारकली’ पर बाद में फिल्म ‘मुगल ए आजम’ बनी।

मुहम्मदी बेगम की सबसे बड़ी उपलब्धि शायद यही थी कि उन्होंने उस समय महिलाओं के लिए लिखने और बोलने की जगह बनाई, जब ऐसी आवाजों को समाज में आसानी से स्वीकार नहीं किया जाता था।

उनकी पत्रिका का प्रसार भले सीमित रहा हो। लेकिन उसके विचार लंबे समय तक चर्चा में रहे। महिला शिक्षा, महिला अधिकार, नारी सशक्तिकरण और उर्दू पत्रकारिता के इतिहास में उनका योगदान इसी वजह से महत्वपूर्ण है।

आज मुहम्मदी बेगम को क्यों याद किया जाता है?

मुहम्मदी बेगम को याद करने की सबसे बड़ी वजह उनका समय है। उन्होंने ऐसे दौर में पत्रकारिता की शुरुआत की, जब महिलाओं की शिक्षा खुद एक बड़ा सामाजिक सवाल थी।

उन्होंने यह साबित किया कि पत्रकारिता केवल समाचार प्रकाशित करने का माध्यम नहीं है। यह समाज में बदलाव की शुरुआत भी कर सकती है।

‘तहजीब ए निस्वान’ इसी सोच का उदाहरण थी। पत्रिका ने महिलाओं की शिक्षा, सामाजिक स्थिति और अधिकारों से जुड़े मुद्दों को जगह दी। मुहम्मदी बेगम ने लेखन और संपादन के जरिए महिलाओं को अपनी बात रखने का मंच दिया।

सवाल और जवाब

मुहम्मदी बेगम कौन थीं?
मुहम्मदी बेगम लेखिका, पत्रकार और महिला शिक्षा की शुरुआती समर्थकों में से एक थीं। उन्हें ‘तहजीब ए निस्वान’ की संपादक के रूप में विशेष पहचान मिली।

‘तहजीब ए निस्वान’ कब शुरू हुई थी?
इसका पहला अंक 1 जुलाई 1898 को प्रकाशित हुआ था।

मुहम्मदी बेगम किस क्षेत्र में काम करती थीं?
उन्होंने महिला पत्रकारिता, उर्दू साहित्य, महिला शिक्षा और सामाजिक सुधार के क्षेत्र में काम किया।

मुहम्मदी बेगम का विवाह किससे हुआ था?
उनका विवाह मुमताज अली से हुआ था। मुमताज अली भी महिलाओं की शिक्षा और अधिकारों के समर्थक थे।

मुहम्मदी बेगम की प्रमुख रचनाएं कौन सी हैं?
‘खानादारी’, ‘आदाब ए मुलाकात’, ‘सुघढ़ बेटी’, ‘शरीफ बेटी’, ‘चंदन हार’, ‘आज कल’ और ‘सफिया बेगम’ उनकी चर्चित रचनाओं में शामिल हैं।

मुहम्मदी बेगम का निधन कब हुआ?
उपलब्ध स्रोत के अनुसार उनका निधन 1908 में करीब 30 वर्ष की उम्र में हुआ।

संपादकीय नोट: उपलब्ध स्रोत में मुहम्मदी बेगम के जीवन से जुड़े कुछ विवरण आपस में मेल नहीं खाते हैं। खास तौर पर 1930 के दशक में ऑक्सफोर्ड जाने से जुड़ा विवरण उनके 1908 में निधन के दावे से मेल नहीं खाता। इसलिए ऊपर की रिपोर्ट में मुख्यतः वे तथ्य इस्तेमाल किए गए हैं जो स्रोत के अन्य हिस्सों में एक समान रूप से दर्ज हैं।

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