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ट्रंप को ईरान के अचानक हमले का डर? पिकएक्स माउंटेन पर नजर

नौशाद अख्तर, वॉशिंगटन, नई दिल्ली, तेहरान

अमेरिका और ईरान के बीच तनाव एक बार फिर खतरनाक मोड़ पर पहुंचता दिख रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के एक बेहद सुरक्षित भूमिगत ठिकाने पर संभावित हमले का संकेत दिया है। इसके बाद सवाल उठने लगा है कि क्या अमेरिका को ईरान की तरफ से किसी अचानक सैन्य कार्रवाई का डर सता रहा है।

यह सवाल इसलिए भी अहम है क्योंकि ट्यूनीशिया में अमेरिका के पूर्व राजदूत जॉय हूड ने चेतावनी दी है कि ईरान अगले छह हफ्तों में कोई बड़ा कदम उठा सकता है। उनके मुताबिक नवंबर में होने वाले अमेरिकी मध्यावधि चुनावों के आसपास ईरान अचानक हमला कर सकता है।

जॉय हूड ने शुक्रवार 4 सितंबर को अल जज़ीरा से बातचीत में कहा कि ईरान के पास अमेरिकी राष्ट्रपतियों को मुश्किल में डालने का पुराना इतिहास है। उनका कहना है कि ईरान ने चुनावी दौर में अमेरिकी राष्ट्रपतियों पर दबाव बनाने के मौके तलाशे हैं।

हूड ने जिमी कार्टर के दौर का उदाहरण देते हुए कहा कि ईरान का यह रुझान नया नहीं है। उनका आकलन है कि आने वाले हफ्तों में अमेरिकी प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती सैन्य टकराव के साथ घरेलू राजनीतिक दबाव भी हो सकती है।

क्या चुनाव के दौरान हमला कर सकता है ईरान?

जॉय हूड का सबसे महत्वपूर्ण दावा अमेरिकी मध्यावधि चुनावों से जुड़ा है। उन्होंने कहा कि अमेरिका और इजरायल में नवंबर के आसपास चुनावी गतिविधियां महत्वपूर्ण होंगी। ऐसे समय में ईरान के पास अमेरिका पर आर्थिक और राजनीतिक दबाव बनाने का अवसर हो सकता है।

हूड ने खास तौर पर पेट्रोल की कीमत का जिक्र किया। उनका कहना है कि अमेरिकी मतदाता ईंधन की कीमतों को लेकर बेहद संवेदनशील होते हैं। अगर ईरान और अमेरिका के बीच सैन्य तनाव बढ़ता है, तो इसका सीधा असर तेल बाजार पर पड़ सकता है।

खाड़ी क्षेत्र में किसी भी सैन्य संकट का असर कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ सकता है। होर्मुज जलडमरूमध्य इस लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है। दुनिया के ऊर्जा कारोबार के लिए यह समुद्री मार्ग लंबे समय से रणनीतिक महत्व रखता है।

यही वजह है कि ईरान अमेरिका तनाव केवल सैन्य मामला नहीं है। इसका असर अमेरिकी राजनीति, वैश्विक तेल बाजार और मध्य पूर्व की सुरक्षा पर भी पड़ सकता है।

ट्रंप ने पिकएक्स माउंटेन पर क्या कहा?

इसी बीच डोनाल्ड ट्रंप ने शुक्रवार को पत्रकारों से बातचीत में कहा कि अमेरिका ईरान के तथाकथित पिकएक्स माउंटेन पर हमला कर सकता है।

पिकएक्स माउंटेन ईरान के नतांज परमाणु परिसर के आसपास स्थित एक बेहद सुरक्षित इलाका बताया जाता है। यहां जमीन के काफी नीचे सुरंगों और भूमिगत परिसरों का नेटवर्क मौजूद है।

ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़े ठिकानों को लेकर अमेरिका और इजरायल पहले भी चिंता जाहिर करते रहे हैं। नतांज ईरान के यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम का प्रमुख केंद्र रहा है।

ऐसे में ट्रंप का पिकएक्स माउंटेन का नाम लेना केवल एक सामान्य सैन्य बयान नहीं माना जा रहा। इससे यह संकेत जरूर मिलता है कि अमेरिकी प्रशासन ईरान के गहरे भूमिगत ठिकानों को लेकर रणनीतिक विकल्पों पर विचार कर रहा है।

हालांकि यह साफ नहीं है कि अमेरिका वास्तव में इस स्थान पर हमला करने की तैयारी कर रहा है या ट्रंप का बयान ईरान पर दबाव बढ़ाने की रणनीति का हिस्सा है।

ट्रंप इसे युद्ध क्यों नहीं कह रहे?

ईरान के साथ जारी टकराव को लेकर अमेरिकी प्रशासन की भाषा भी ध्यान खींच रही है।

अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने इससे एक दिन पहले कहा था कि वह मौजूदा स्थिति को युद्ध नहीं कहेंगे। इसके बाद जब ट्रंप से इस बारे में सवाल किया गया तो उन्होंने भी इसे सैन्य संघर्ष बताया।

ट्रंप ने कहा कि अमेरिका के लिए यह कोई बहुत बड़ी बात नहीं है। उन्होंने वेनेजुएला में अमेरिकी कार्रवाई का भी संदर्भ दिया।

इस बयान के पीछे राजनीतिक संदेश भी देखा जा रहा है। अमेरिकी प्रशासन शायद यह दिखाना चाहता है कि ईरान के साथ सैन्य टकराव नियंत्रण से बाहर नहीं हुआ है। दूसरी तरफ ईरान के लिए अमेरिकी सैन्य क्षमता और संभावित कार्रवाई की चेतावनी भी बनी हुई है।

अमेरिकी रणनीति में दबाव और सैन्य विकल्प दोनों

ईरान के साथ टकराव में ट्रंप प्रशासन की रणनीति दो स्तरों पर चलती दिखाई दे रही है।

पहला रास्ता आर्थिक दबाव का है। दूसरा रास्ता सैन्य शक्ति के इस्तेमाल की धमकी का है।

ट्रंप कई मौकों पर बातचीत की संभावना का संकेत देते रहे हैं। लेकिन जब भी वार्ता में कोई ठोस प्रगति नहीं होती, सैन्य कार्रवाई की संभावना फिर सामने आ जाती है।

यही स्थिति मौजूदा संकट को जटिल बनाती है। अमेरिका एक तरफ ईरान को पीछे हटने के लिए मजबूर करना चाहता है। दूसरी तरफ वह बड़े और लंबे युद्ध में फंसने से भी बचना चाहता है।

कार्नेगी एंडोमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस के आरोन डेविड मिलर के मुताबिक अमेरिकी प्रशासन दोनों चरम स्थितियों से बचना चाहता है।

मिलर का आकलन है कि व्हाइट हाउस न तो ईरान पर ऐसा बड़ा हमला चाहता है जिससे पूर्ण युद्ध शुरू हो जाए और न ही वह तेहरान के सामने ऐसी स्थिति में जाना चाहता है जहां अमेरिका को बड़ी रियायतें देनी पड़ें।

यही वजह है कि अमेरिका दबाव, धमकी और बातचीत के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है।

ईरान अमेरिका के बीच बातचीत क्यों रुकी है?

फिलहाल अमेरिका और ईरान के बीच सीधी बातचीत नहीं चल रही है। दोनों देशों के बीच राजनयिक गतिरोध बना हुआ है।

जॉय हूड का कहना है कि इस स्थिति को बदलने के लिए किसी तीसरे देश की मध्यस्थता जरूरी हो सकती है। उनका मानना है कि केवल बातचीत की अपील पर्याप्त नहीं होगी। मध्यस्थ देश को कोई ठोस पहल करनी होगी।

उन्होंने मक्का संधि से जुड़े देशों की संभावित भूमिका का उदाहरण दिया। हूड के मुताबिक अगर खाड़ी और उत्तरी अरब सागर में संबंधित देश अपनी नौसेना की मौजूदगी बढ़ाएं और होर्मुज जलडमरूमध्य की निगरानी की जिम्मेदारी लें तो तनाव कम करने का रास्ता खुल सकता है।

उनके प्रस्ताव का उद्देश्य यह होगा कि जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित हो और अमेरिका को समुद्री नाकाबंदी की जरूरत न पड़े।

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यूरोप और खाड़ी देशों की भूमिका भी अहम

ईरान अमेरिका संघर्ष में अमेरिका अकेले फैसले नहीं ले सकता। यूरोप और खाड़ी देशों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है।

अमेरिका के पारंपरिक सहयोगियों के बीच भी ईरान के खिलाफ बड़े सैन्य अभियान को लेकर अलग अलग राय रही है। यूरोपीय देश क्षेत्र में व्यापक युद्ध से बचने की बात करते रहे हैं।

खाड़ी देश भी लंबे संघर्ष को लेकर सतर्क हैं। उनके लिए ईरान के साथ सीधा सैन्य टकराव आर्थिक और सुरक्षा दोनों लिहाज से जोखिम पैदा कर सकता है।

तेल प्रतिष्ठानों, समुद्री व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति पर किसी भी हमले का असर पूरे क्षेत्र पर पड़ सकता है।

क्या अमेरिका और ईरान फिर बातचीत की मेज पर आएंगे?

यह इस समय सबसे बड़ा सवाल है।

एक तरफ ट्रंप ईरान पर सैन्य दबाव बनाए हुए हैं। दूसरी तरफ बातचीत का रास्ता पूरी तरह बंद भी नहीं दिख रहा।

जॉय हूड का मानना है कि मध्यस्थ देश सक्रिय भूमिका निभाएं तो गतिरोध टूट सकता है। लेकिन इसके लिए दोनों पक्षों को कुछ भरोसा कायम करना होगा।

ईरान के लिए अमेरिकी सैन्य दबाव स्वीकार करना आसान नहीं है। अमेरिका के लिए भी बिना किसी ठोस समझौते के पीछे हटना राजनीतिक रूप से कठिन हो सकता है।

इसी बीच पिकएक्स माउंटेन को लेकर ट्रंप का बयान नई चिंता पैदा करता है। अगर अमेरिका ने वास्तव में ईरान के भूमिगत ठिकानों को निशाना बनाने का फैसला किया तो संघर्ष का अगला चरण और ज्यादा गंभीर हो सकता है।

फिलहाल स्थिति साफ नहीं है। लेकिन एक बात स्पष्ट है। अमेरिका और ईरान के बीच तनाव अब केवल दो देशों का विवाद नहीं रह गया है। इसका असर मध्य पूर्व की सुरक्षा, होर्मुज जलडमरूमध्य, कच्चे तेल की कीमत, वैश्विक बाजार और अमेरिकी मध्यावधि चुनाव तक पहुंच सकता है।

आने वाले छह हफ्ते इसलिए बेहद महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। क्या ईरान कोई अचानक सैन्य कदम उठाएगा? क्या ट्रंप पिकएक्स माउंटेन पर हमला करेंगे? या फिर किसी तीसरे देश की मध्यस्थता से अमेरिका और ईरान दोबारा बातचीत की मेज पर लौटेंगे?

इन सवालों के जवाब ही तय करेंगे कि मौजूदा ईरान अमेरिका संघर्ष आगे किस दिशा में जाता है।

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