जामिया में भारत उज़्बेकिस्तान संबंधों पर चर्चा
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मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नई दिल्ली
भारत और उज़्बेकिस्तान के बीच बदलते संबंधों, मध्य एशिया में भारत की भूमिका और दोनों देशों के बीच बढ़ते सहयोग पर जामिया मिल्लिया इस्लामिया में विशेषज्ञों ने चर्चा की। इंडिया अरब कल्चरल सेंटर, जामिया मिल्लिया इस्लामिया ने 22 सितंबर 2026 को ‘ए न्यू एरा ऑफ इंडिया उज़्बेकिस्तान रिलेशंस’ विषय पर पैनल चर्चा आयोजित की। कार्यक्रम इंडिया अरब कल्चरल सेंटर के कॉन्फ्रेंस हॉल में हुआ।
कार्यक्रम में भारत और मध्य एशिया के ऐतिहासिक संबंधों से लेकर भारत उज़्बेकिस्तान व्यापक रणनीतिक साझेदारी तक कई पहलुओं पर बातचीत हुई। विशेषज्ञों ने फार्मास्यूटिकल्स, डिजिटल सहयोग, मेडिकल टूरिज्म और लोगों के बीच संपर्क को भी दोनों देशों के संबंधों के उभरते क्षेत्र के रूप में रेखांकित किया।
पैनल चर्चा के संयोजक प्रोफेसर नासिर रज़ा खान ने कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए विषय की पृष्ठभूमि रखी। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ताशकंद यात्रा को मध्य एशिया की कूटनीति के संदर्भ में महत्वपूर्ण बताया। उनके अनुसार, यात्रा के दौरान हुए समझौतों ने क्षेत्र की साझा विरासत और इतिहास से जुड़े विषयों को भी महत्व दिया।
प्रोफेसर नासिर रज़ा खान ने जामिया मिल्लिया इस्लामिया के वाइस चांसलर प्रोफेसर मज़हर आसिफ और रजिस्ट्रार प्रोफेसर एम. महताब आलम रिज़वी के सहयोग के लिए आभार व्यक्त किया। उन्होंने इंडिया अरब कल्चरल सेंटर के निदेशक डॉ. आफताब अहमद को भी कार्यक्रम के आयोजन में सहयोग के लिए धन्यवाद दिया।

भारत अरब संबंधों पर पुस्तक का विमोचन
पैनल चर्चा से पहले एक नई पुस्तक का विमोचन भी किया गया। ‘इंडिया अरब रिलेशंस: फ्रॉम हिस्टोरिकल पर्सपेक्टिव्स टू कंटेम्परेरी डायनेमिक्स’ नामक इस संपादित पुस्तक का संपादन प्रोफेसर नासिर रज़ा खान ने किया है। पुस्तक का प्रकाशन नई दिल्ली स्थित प्राइमस बुक्स ने किया है।
पुस्तक भारत और अरब दुनिया के बीच ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंधों को सामने रखती है। इसमें भारतीय उपमहाद्वीप और अरब क्षेत्र के बीच लंबे समय से मौजूद संपर्क और संबंधों को देखा गया है। साथ ही आधुनिक दौर में इन संबंधों में आए बदलावों को भी समझने की कोशिश की गई है।
पुस्तक विमोचन के दौरान प्राइमस बुक्स के डिप्टी हेड डॉ. प्रसून चटर्जी भी मौजूद रहे।
मध्य एशिया से भारत के पुराने रिश्तों पर चर्चा
इंडिया अरब कल्चरल सेंटर के निदेशक डॉ. आफताब अहमद ने स्वागत भाषण दिया। उन्होंने भारत और मध्य एशिया के बीच लंबे समय से चले आ रहे सांस्कृतिक संबंधों को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने प्रोफेसर नासिर रज़ा खान को पैनल चर्चा के आयोजन और भारत अरब संबंधों पर पुस्तक के प्रकाशन के लिए बधाई दी।
कार्यक्रम में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज से प्रोफेसर संजय कुमार पांडेय ने भारत और मध्य एशिया के पुराने सभ्यतागत संबंधों पर बात रखी। उन्होंने क्षेत्र को लेकर अपने अकादमिक अध्ययन के आधार पर भारत और मध्य एशिया के बीच ऐतिहासिक संपर्क की चर्चा की।
उनके संबोधन में यह बात सामने आई कि भारत और मध्य एशिया के रिश्ते केवल आधुनिक कूटनीतिक संपर्क तक सीमित नहीं हैं। इनके पीछे लंबे समय से चले आ रहे सांस्कृतिक और सभ्यतागत संबंध भी हैं।
उज़्बेकिस्तान ने रणनीतिक साझेदारी पर रखी बात
भारत में उज़्बेकिस्तान दूतावास के काउंसलर उलुबेक रिज़ाएव ने भी पैनल चर्चा में हिस्सा लिया। उन्होंने भारत और उज़्बेकिस्तान के बीच बढ़ते संबंधों के महत्व पर बात की।
उन्होंने दोनों देशों के बीच संबंधों को व्यापक रणनीतिक साझेदारी तक पहुंचने के संदर्भ में चर्चा की। उनके संबोधन में हालिया उच्चस्तरीय संपर्कों और भारत उज़्बेकिस्तान संबंधों के विस्तार को महत्वपूर्ण बताया गया।
भारत और उज़्बेकिस्तान के संबंधों में राजनीतिक और कूटनीतिक संपर्क के साथ आर्थिक, स्वास्थ्य, शिक्षा और तकनीक से जुड़े क्षेत्रों का महत्व भी बढ़ रहा है। कार्यक्रम में इसी बदलते रिश्ते को अलग अलग दृष्टिकोण से समझने की कोशिश की गई।
फार्मा से डिजिटल साझेदारी तक
इंडियन काउंसिल ऑफ वर्ल्ड अफेयर्स से जुड़े वरिष्ठ रिसर्च फेलो डॉ. अथर ज़फ़र ने भारत उज़्बेकिस्तान संबंधों को कई आयामों से समझाया। उन्होंने दोनों देशों की साझेदारी के क्रमिक विकास पर चर्चा की।
उन्होंने रणनीतिक साझेदारी से व्यापक रणनीतिक साझेदारी तक पहुंची द्विपक्षीय प्रक्रिया का उल्लेख किया। इसके साथ ही उन्होंने फार्मास्यूटिकल्स और डिजिटल सहयोग को संबंधों के महत्वपूर्ण क्षेत्रों में गिनाया।
डॉ. अथर ज़फ़र ने मेडिकल टूरिज्म और दोनों देशों के लोगों के बीच बढ़ते संपर्क पर भी चर्चा की। उनके मुताबिक, भारत उज़्बेकिस्तान संबंध अब केवल पारंपरिक कूटनीतिक संवाद तक सीमित नहीं हैं। इनके दायरे में स्वास्थ्य, डिजिटल क्षेत्र और लोगों के बीच संपर्क जैसे नए विषय भी शामिल हो रहे हैं।
वसुधैव कुटुंबकम का भी उल्लेख
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की डॉ. वैशाली कृष्णा ने भारत उज़्बेकिस्तान संबंधों की स्थिरता और भविष्य से जुड़े विचारों पर अपनी बात रखी। उन्होंने दोनों देशों के रिश्तों को आगे बढ़ाने वाले विचारों और सिद्धांतों पर चर्चा की।
इस दौरान उन्होंने भारत की दार्शनिक परंपरा के संदर्भ में वसुधैव कुटुंबकम का उल्लेख किया। उन्होंने इसे भारत की वैश्विक सोच के एक महत्वपूर्ण आधार के रूप में सामने रखा।
कार्यक्रम में वक्ताओं ने भारत और मध्य एशिया के बीच ऐतिहासिक संपर्क को वर्तमान कूटनीतिक संबंधों से जोड़कर देखने की कोशिश की। इससे चर्चा केवल मौजूदा राजनीतिक रिश्तों तक सीमित नहीं रही, बल्कि इतिहास, संस्कृति और लोगों के बीच संपर्क जैसे विषय भी इसमें शामिल रहे।

छात्रों की बड़ी भागीदारी
पैनल चर्चा में जामिया मिल्लिया इस्लामिया के इंडिया अरब कल्चरल सेंटर, विदेशी भाषा विभाग और इतिहास विभाग के बड़ी संख्या में छात्रों ने हिस्सा लिया।
छात्रों के लिए कार्यक्रम भारत उज़्बेकिस्तान संबंधों को अकादमिक और कूटनीतिक नजरिए से समझने का अवसर रहा। पैनल में विश्वविद्यालय के शिक्षकों और विदेशी राजनयिक के साथ अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विशेषज्ञों की मौजूदगी ने चर्चा को अलग अलग दृष्टिकोण दिए।
कार्यक्रम में विदेशी भाषा विभाग और फारसी विभाग के वरिष्ठ शिक्षक भी मौजूद रहे।
जामिया में आयोजित यह चर्चा ऐसे समय हुई, जब भारत और मध्य एशिया के संबंधों में ऐतिहासिक संपर्क के साथ नए सहयोग क्षेत्रों पर भी ध्यान दिया जा रहा है। कार्यक्रम में हुई चर्चा ने भारत उज़्बेकिस्तान संबंधों के कई पहलुओं को एक साथ सामने रखा। इसमें साझा इतिहास, सांस्कृतिक संपर्क, रणनीतिक साझेदारी, फार्मास्यूटिकल्स, डिजिटल सहयोग, मेडिकल टूरिज्म और जन संपर्क जैसे विषय प्रमुख रहे।
इस तरह जामिया मिल्लिया इस्लामिया में हुई पैनल चर्चा ने भारत और उज़्बेकिस्तान के संबंधों को इतिहास और वर्तमान कूटनीति के बीच जोड़कर देखने का अवसर दिया। साथ ही छात्रों और शोधार्थियों के लिए मध्य एशिया, भारत की विदेश नीति और उज़्बेकिस्तान के साथ बढ़ते द्विपक्षीय संबंधों पर संवाद का एक मंच भी उपलब्ध कराया।

