इजरायल और फिलिस्तीन संघर्ष के बीच इंसानियत की अनूठी मिसाल, जानिए क्या है मायरॉन जोशुआ की सच्चाई
नौशाद अख्तर
दुनिया भर में जब भी इजरायल और फिलिस्तीन के बीच जंग की तस्वीरें सामने आती हैं, तो चारों तरफ सिर्फ नफरत, बारूद और मौत का मंजर दिखाई देता है। आम धारणा यह बन चुकी है कि युद्ध की आग में सुलग रहे इन दोनों इलाकों में रहने वाले लोग एक-दूसरे के खून के प्यासे हैं। लेकिन, इस नफरत के काले बादलों के बीच कुछ ऐसी मानवीय कहानियां भी निकलकर सामने आती हैं जो दिलों को छू लेती हैं। सोशल मीडिया पर इन दिनों एक इजरायली कार्यकर्ता मायरॉन जोशुआ की कहानी काफी चर्चा में है, जो युद्ध के बीच फिलिस्तीनी नागरिकों की मदद के लिए मसीहा बनकर उभरे हैं।
मायरॉन जोशुआ और ‘रूट्स’ संस्था का मानवीय कार्य


सोशल मीडिया पर वायरल दावों के मुताबिक, 78 वर्षीय इजरायली कार्यकर्ता मायरॉन जोशुआ ने गाजा युद्ध के दौरान अब तक लगभग 50,000 फिलिस्तीनी मरीजों को अस्पताल पहुंचाने और उनके इलाज में मदद की है। हालांकि, इन आंकड़ों की सत्यता को लेकर बहस जारी है और स्वतंत्र रूप से पचास हजार के इस आंकड़े की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हो सकी है। लेकिन, इससे इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि मायरॉन जोशुआ ज़मीनी स्तर पर इंसानियत की मिसाल पेश कर रहे हैं।
मायरॉन जोशुआ साल 1971 से किबुत्ज़ कफ़र एत्ज़ियोन में रह रहे हैं। जब उन्हें गुश एत्ज़ियोन इलाके में अपने फिलिस्तीनी पड़ोसियों पर लगाई गई पाबंदियों और उनकी परेशानियों के बारे में गहराई से पता चला, तो उन्होंने चुप बैठने के बजाय कुछ अलग करने की ठानी। उन्होंने अन्य इजरायली साथियों के साथ मिलकर फिलिस्तीनी और इजरायली नागरिकों के बीच की दूरियां कम करने का बीड़ा उठाया। इस नेक काम में ‘रूट्स’ (Roots) नामक संस्था ने मुख्य भूमिका निभाई।
नफरत की दीवारों को गिराती कोशिशें
‘रूट्स’ संस्था इजरायली और फिलिस्तीनी समुदायों को करीब लाने का काम करती है। इस संगठन की खासियत यह है कि इसके हर स्तर पर इजरायली और फिलिस्तीनी दोनों मिलकर काम करते हैं। इसके सह-निदेशकों में खालिद अबू अव्वाद और रब्बी शाऊल जुडेलमैन जैसे नाम शामिल हैं। मायरॉन जोशुआ इस संस्था के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं और वे बाहर से आने वाले समूहों के दौरों की योजना बनाने के साथ-साथ सिविल एडमिनिस्ट्रेशन के बीच संपर्क अधिकारी के रूप में भी सक्रिय हैं।
मायरॉन व्यक्तिगत तौर पर भी बेत ज़कारिया के स्थानीय निवासियों की मदद के लिए हमेशा आगे रहते हैं। उनका मानना है कि इजरायली पड़ोसियों के बीच लगातार नियंत्रण और संघर्ष के जो गंभीर सामाजिक व नैतिक नतीजे सामने आ रहे हैं, उनके प्रति लोगों को जागरूक करना बेहद जरूरी है। मीडिया रिपोर्ट्स और पॉडकास्ट में भी इस बात के प्रमाण मिलते हैं कि जोशुआ ने कई गंभीर रूप से बीमार फिलिस्तीनी बच्चों और मरीजों को समय पर अस्पताल पहुंचाने में व्यक्तिगत रूप से मदद की है।
आंकड़ों की सच्चाई और सोशल मीडिया का प्रचार
भले ही मायरॉन जोशुआ द्वारा 50 हजार मरीजों की मदद किए जाने वाले आंकड़े को लेकर संशय जताया जा रहा हो और जानकारों का मानना हो कि यह संख्या किसी बड़े संगठन के सामूहिक कार्यों से जुड़ी हो सकती है, लेकिन जोशुआ का व्यक्तिगत योगदान किसी से छिपा नहीं है। इसके अलावा, ‘रोड टू रिकवरी’ जैसे अन्य वॉलंटियर संगठन भी हैं जो साल 2006 से लगातार फिलिस्तीनी मरीजों को मेडिकल ट्रीटमेंट के लिए अस्पतालों तक पहुंचाने का सराहनीय काम कर रहे हैं।
अंत में यह कहा जा सकता है कि राजनीति और जंग के मैदान चाहे जितने भी कठोर हों, लेकिन इंसानियत की डोर इतनी कमजोर नहीं होती। मायरॉन जोशुआ जैसे लोग यह साबित करते हैं कि सरहदों और मजहब की दीवारों से ऊपर उठकर दर्द को बांटना ही असली मानवता है।

