दुबई में भारतीय परिवार के 50 साल, एयरपोर्ट से फिर शुरू किया पुराना सफर
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दुबई में 50 साल पूरे होने पर मोहिउद्दीन परिवार ने दो पुराने घरों का दौरा किया। 7 अक्टूबर 1976 की यादें, संघर्ष, सफलता और शहर से जुड़ाव की कहानी आज भी उनके साथ है।
दुबई।
किसी शहर में पांच दशक बिताना केवल समय का गुजरना नहीं होता। इस दौरान पीढ़ियां बड़ी होती हैं, घर बदलते हैं और जिंदगी के मायने भी बदल जाते हैं। कुछ शहर धीरे धीरे आपकी पहचान का हिस्सा बन जाते हैं। दुबई में रहने वाले भारतीय प्रवासी मोहिउद्दीन परिवार की कहानी भी कुछ ऐसी ही है।
7 अक्टूबर 2026 को मोहिउद्दीन परिवार ने दुबई में अपने 50 साल पूरे होने का एक खास अंदाज में जश्न मनाया। परिवार के सदस्य दुबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट के टर्मिनल 1 पहुंचे। यही वह जगह थी, जहां 7 अक्टूबर 1976 को तमिलनाडु से आया पांच सदस्यीय परिवार पहली बार दुबई की जमीन पर उतरा था। परिवार के पुराने पासपोर्ट में आज भी उस दिन की आगमन मुहर मौजूद है।
एमएम मोहिउद्दीन, उनकी पत्नी शमीम और उनके बच्चों डॉ. तसनीम जमील, मीर आरिफ और तबस्सुम ने इस मौके पर अपने पुराने दिनों को फिर से जीने का फैसला किया। एयरपोर्ट से निकलकर परिवार उसी रास्ते पर आगे बढ़ा, जिस रास्ते से वह पांच दशक पहले अपने पहले घर पहुंचा था। इसके बाद उन्होंने दुबई में अपने दूसरे घर का भी दौरा किया।
यह केवल पुराने मकानों को देखने की यात्रा नहीं थी। यह उस जिंदगी को याद करने का अवसर था, जिसकी शुरुआत कुछ उम्मीदों और सीमित साधनों के साथ हुई थी। उस समय किसी ने नहीं सोचा था कि कुछ वर्षों के लिए दुबई आने वाला यह परिवार आधी सदी बाद भी इसी शहर को अपना घर कहेगा।

1976 का दुबई और एक भारतीय परिवार की शुरुआत
मोहिउद्दीन की दुबई यात्रा की शुरुआत 1975 में हुई थी। उस समय शहर आज की तरह ऊंची इमारतों, विशाल शॉपिंग मॉल और आधुनिक सड़कों से भरा नहीं था। दुबई क्रीक के आसपास के कुछ इलाके व्यापार और गतिविधियों के प्रमुख केंद्र थे। शहर तेजी से आगे बढ़ने की तैयारी कर रहा था।
मोहिउद्दीन ने स्थानीय कारोबारियों से मुलाकात की। उनकी बातचीत और भविष्य को लेकर उत्साह ने उन्हें यहां अवसर दिखाई दिए। इसके बाद उन्होंने ईटीए आसकॉन में काम शुरू किया।
अगले साल उनकी पत्नी शमीम और दो बच्चे भी दुबई आ गए। परिवार की तीसरी संतान तबस्सुम का जन्म 1977 में रशीद अस्पताल में हुआ। इस तरह दुबई धीरे धीरे परिवार की जिंदगी का स्थायी हिस्सा बन गया।
मोहिउद्दीन ने शुरुआत में सोचा था कि कुछ वर्षों तक काम करने के बाद परिवार भारत लौट जाएगा। लेकिन समय के साथ परिस्थितियां बदलती गईं। बच्चों की पढ़ाई, कामकाज, दोस्तियां और सामाजिक रिश्ते दुबई से जुड़ते चले गए। देखते ही देखते पांच साल, दस साल और फिर पांच दशक बीत गए।

फिश राउंडअबाउट के पास था पहला घर
अपने पुराने सफर को दोहराते हुए परिवार सबसे पहले उस इमारत के सामने पहुंचा, जो फिश राउंडअबाउट के पास पानी की टंकी के सामने स्थित है। यही दुबई में उनका पहला घर था।
डॉ. तसनीम जमील, जो प्राइम हेल्थकेयर ग्रुप की डिप्टी मैनेजिंग डायरेक्टर हैं, ने गल्फ न्यूज से बातचीत में उस दौर को याद किया। उन्होंने बताया कि उस इमारत के आसपास बहुत कम निर्माण था। परिवार की जिंदगी का बड़ा हिस्सा उसी मकान के इर्द गिर्द गुजरता था।
आज उस इमारत के आसपास कई ऊंची इमारतें खड़ी हो चुकी हैं। इलाके की तस्वीर काफी बदल गई है। इसके बावजूद परिवार का पहला घर अब भी मौजूद है। मोहिउद्दीन परिवार जब वहां पहुंचा तो मौजूदा निवासियों ने उनका गर्मजोशी से स्वागत किया।
पुराने घर को देखकर परिवार के सदस्यों के लिए उन दिनों को याद करना स्वाभाविक था, जब दुबई उनके लिए एक नया शहर था और हर दिन कुछ नया सीखने का अवसर लेकर आता था।

अल घुरैर सेंटर में दूसरा घर
परिवार का दूसरा घर अल घुरैर सेंटर के रिहायशी टावर में था। यह इमारत उस समय की याद दिलाती है, जब दुबई में आधुनिक शॉपिंग संस्कृति आकार ले रही थी। अल घुरैर सेंटर 1981 में खुला था और इसे शहर के शुरुआती बड़े शॉपिंग मॉल में गिना जाता है।
डॉ. तसनीम के मुताबिक, इस घर में आने के बाद परिवार के लिए जिंदगी का एक नया अनुभव शुरू हुआ। उनके पिता को आज भी किराये के समझौते का नंबर याद है। वह नंबर 003 था। परिवार इस इमारत के शुरुआती किरायेदारों में तीसरा था।
शुरुआती छह महीनों में इमारत लगभग खाली रहती थी। परिवार के साथ रहने वाली तसनीम की दादी पड़ोसियों की तलाश में नाश्ते के बाद गलियारों में घूमती थीं। वह एक एक दरवाजे की घंटी बजाती थीं। भारत से आई दादी के लिए पड़ोसियों और सामाजिक रिश्तों का खास महत्व था।
आखिरकार उन्हें गलियारे के दूसरे छोर पर पड़ोसी मिले। समय के साथ इमारत में रौनक बढ़ी और लोगों के बीच संपर्क बनने लगे।
मोहिउद्दीन परिवार ने इस मकान में 2002 तक समय बिताया। पांच दशक बाद लौटने पर उन्हें कई चीजें पहले जैसी लगीं, जबकि बहुत कुछ बदल चुका था।

रेत, साइकिल और साधारण जिंदगी का दुबई
आज का दुबई दुनिया के सबसे चर्चित आधुनिक शहरों में शामिल है। लेकिन 1970 और 1980 के दशक में शहर का स्वरूप काफी अलग था। मोहिउद्दीन परिवार के बच्चों को वह समय याद है, जब इमारतों की तुलना में रेत के खुले मैदान अधिक दिखाई देते थे।
बच्चे सड़कों पर साइकिल चलाते थे और फुटबॉल खेलते थे। अबू धाबी की ओर जाते समय दुबई वर्ल्ड ट्रेड सेंटर दूर से दिखाई देता था। उसके आसपास दूर तक खाली जगह नजर आती थी।
उस दौर की घरेलू जिंदगी भी आज से काफी अलग थी। घर पर सामान पहुंचाने के लिए शमीम बालकनी में आकर किराने की दुकान के मालिक को आवाज देती थीं। दुकानदार सड़क पार करके सामान पहुंचा देता था।
जब उनके इलाके में अल रावी सुपरमार्केट आया तो बच्चों के लिए यह किसी नए अनुभव से कम नहीं था। वे पहली बार अपनी पसंद का दूध, चॉकलेट और दूसरी चीजें खुद चुन सकते थे।
बुर दुबई की ओर स्थित अल फज्र डिपार्टमेंट स्टोर भी बच्चों के पसंदीदा स्थानों में था। वहां शहर की शुरुआती एस्केलेटर में से एक थी। बच्चे केवल ऊपर नीचे जाने के लिए भी उसका इस्तेमाल करते थे। जुमेराह में डेयरी क्वीन के यहां परिवार ने पहली बार फास्ट फूड का स्वाद चखा।
शमीम को खाना बनाने का शौक था। चोइथराम्स जैसे स्टोर से उन्हें भारतीय मसाले और दूसरी जरूरी सामग्री आसानी से मिल जाती थी। डॉ. तसनीम के अनुसार, परिवार को दुबई में शुरुआत से ही रोजमर्रा की जरूरतों के लिए सुविधाएं मिलती रहीं।

मशरिफ पार्क की पिकनिक और पुरानी दोस्तियां
परिवार के लिए सप्ताहांत का मतलब अक्सर मशरिफ पार्क जाना होता था। बच्चे वहां तैरना सीखते थे। परिवार बार बार बारबेक्यू और पिकनिक का आयोजन करता था। इन मुलाकातों में दोस्तों और परिचितों के परिवार भी शामिल होते थे।
उस समय टेलीविजन पर केवल दो चैनल उपलब्ध थे। शाम को बच्चे अरबी भाषा में प्रसारित होने वाला बच्चों का कार्यक्रम बाबा यासीन देखने के लिए बैठ जाते थे। भाषा समझ में न आने के बावजूद कार्यक्रम उनके बचपन की यादों का हिस्सा बन गया।
हालांकि शुरुआती दिन हमेशा आसान नहीं थे। परिवार को अपनी कार खरीदने में कई महीने लगे। टैक्सी आसानी से नहीं मिलती थी। तीन बच्चों को स्कूल पहुंचाना भी चुनौती था। दोस्तों ने बारी बारी से बच्चों को स्कूल छोड़ने की जिम्मेदारी बांटकर मदद की।
बच्चों की पढ़ाई को लेकर भी माता पिता चिंतित रहते थे। उनके बेटे की कक्षा एक पोर्टेबल अस्थायी ढांचे में लगती थी। हालांकि समय के साथ स्कूलों का विस्तार हुआ और शिक्षा से जुड़ी सुविधाएं बेहतर होती गईं।
डॉ. तसनीम और आरिफ उस समय क्रमशः सात और पांच साल के थे। उन्हें माता पिता की चिंताओं का अधिक अंदाजा नहीं था। उन्हें अपना घर और स्कूल के पहले दिन मिले दोस्त याद हैं। इनमें से कुछ दोस्तियां आज भी कायम हैं।
मेहनत, नेतृत्व और सफलता का सबक
मोहिउद्दीन पेशे से इंजीनियर थे। ईटीए में उन्होंने एयर कंडीशनिंग से लेकर बिजली परियोजनाओं तक कई नए विभाग स्थापित करने में भूमिका निभाई। अपने करियर के अंतिम दौर तक उनके अधीन 8,000 से अधिक कर्मचारी काम कर रहे थे।
डॉ. तसनीम को अपने पिता का व्यस्त कार्यक्रम आज भी याद है। वह दुबई और अबू धाबी के बीच लगातार यात्रा करते थे। भीषण गर्मी में निर्माण स्थलों का दौरा करते थे। इसके बावजूद वह बच्चों को सांस्कृतिक और सामुदायिक कार्यक्रमों में साथ ले जाने के लिए समय निकालते थे।
उनकी सबसे बड़ी सीख थी कि सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता। मेहनत, धैर्य और लोगों के साथ अच्छे संबंध बनाना जरूरी है। परिवार का मानना है कि दुबई ने उन लोगों को आगे बढ़ने के अवसर दिए, जिन्होंने लगातार मेहनत की और मुश्किलों के सामने हार नहीं मानी।
सेवानिवृत्ति के बाद मोहिउद्दीन ने दो किताबें लिखीं। इनमें ‘ट्रायम्फ ऑफ ह्यूमिलिटी: द मेकिंग ऑफ ईटीए’ और ‘सेंस एंड नॉनसेंस’ शामिल हैं। शमीम ने भी अपनी पाक कला को किताब का रूप दिया। उनकी पुस्तक ‘शमीम मोहिउद्दीन्स दखनी डिलाइट्स’ में दक्षिण भारतीय मुस्लिम खानपान की पारंपरिक और कम प्रचलित रेसिपी संकलित हैं।

दुबई ही बना परिवार की पहचान
मोहिउद्दीन परिवार के तीनों बच्चों ने दुबई में स्कूली शिक्षा पूरी की और आगे की पढ़ाई के लिए विदेश गए। डॉ. तसनीम ने भारत में चिकित्सा की पढ़ाई की और फिर दुबई में अपना पेशेवर जीवन बनाया। तबस्सुम भी वापस दुबई लौट आईं। आरिफ ने न्यूयॉर्क में वित्तीय क्षेत्र में करियर बनाया, लेकिन दुबई से अपना रिश्ता बनाए रखा।
परिवार हर साल मद्रास, जिसे आज चेन्नई कहा जाता है, जाता था। लेकिन छुट्टियां खत्म होने पर बच्चों को दुबई लौटने का इंतजार रहता था। उनके माता पिता ने कभी भारत लौटने की स्थायी योजना पर जोर नहीं दिया। इससे बच्चों को धीरे धीरे समझ आ गया कि उनका घर कहां है।
डॉ. तसनीम के पति डॉ. जमील अहमद, जो प्राइम हेल्थकेयर ग्रुप के संस्थापक और मैनेजिंग डायरेक्टर हैं, शादी के दो या तीन साल बाद दुबई आए थे। शुरुआत में वह केवल शहर को देखने आए थे। लेकिन दुबई की व्यवस्था और संभावनाओं को देखने के बाद उनका नजरिया बदल गया।
ईरान इराक संघर्ष, पहला खाड़ी युद्ध, वैश्विक आर्थिक संकट, कोविड महामारी और हाल के क्षेत्रीय तनावों के बावजूद परिवार का दुबई पर भरोसा बना रहा।
डॉ. तसनीम के अनुसार, उनके परिवार का भविष्य हमेशा दुबई के भविष्य से जुड़ा रहा है। वह इस शहर को अपना देश मानती हैं। उनके मुताबिक, यहां बुनियादी सुविधाओं, बेहतर जीवन स्तर और कामकाज को व्यवस्थित रखने पर लगातार ध्यान दिया जाता है।
वह दुबई के शासक शेख मोहम्मद बिन राशिद अल मकतूम के इस विचार से भी प्रेरित हैं कि उत्कृष्टता की दौड़ कभी समाप्त नहीं होती। उनका मानना है कि बेहतर काम करने की कोशिश हमेशा जारी रहनी चाहिए।
अलग अलग देशों, धर्मों और संस्कृतियों के लोगों के बीच पले बढ़े परिवार के सदस्यों के मित्र भी अनेक समुदायों से हैं। डॉ. तसनीम के बच्चे चिकित्सा के क्षेत्र में हैं और विदेश में उच्च प्रशिक्षण पूरा करने के बाद दुबई में बसने की उम्मीद रखते हैं।
इस लंबी यात्रा के बीच कुछ चीजें अब भी वैसी ही हैं। परिवार आज भी नियमित रूप से चिकन टिक्का इन में इकट्ठा होता है। यह पाकिस्तानी ग्रिल्ड चिकन रेस्तरां है, जहां परिवार 1976 से जाता रहा है।
दुबई में मोहिउद्दीन परिवार के 50 साल की कहानी केवल एक भारतीय प्रवासी परिवार की सफलता की कहानी नहीं है। यह उस रिश्ते की कहानी है, जिसमें एक शहर के विकास के साथ लोगों की जिंदगी भी आगे बढ़ती है। पांच दशक पहले एक नए भविष्य की तलाश में आया परिवार आज दुबई को अपनी पहचान, अपनी यादों और अपनी अगली पीढ़ी का घर मानता है।
सवाल और जवाब
सवाल: मोहिउद्दीन परिवार ने दुबई में 50 साल कब पूरे किए?
जवाब: मोहिउद्दीन परिवार ने 7 अक्टूबर 2026 को दुबई में अपने 50 साल पूरे किए। परिवार पहली बार 7 अक्टूबर 1976 को दुबई पहुंचा था।
सवाल: मोहिउद्दीन परिवार मूल रूप से कहां का रहने वाला है?
जवाब: यह भारतीय प्रवासी परिवार तमिलनाडु से दुबई आया था।
सवाल: दुबई में मोहिउद्दीन परिवार के पहले दो घर कहां थे?
जवाब: परिवार का पहला घर फिश राउंडअबाउट के पास था। दूसरा घर अल घुरैर सेंटर के रिहायशी टावर में था।
सवाल: एमएम मोहिउद्दीन ने दुबई में किस क्षेत्र में काम किया?
जवाब: एमएम मोहिउद्दीन इंजीनियर थे। उन्होंने ईटीए में एयर कंडीशनिंग और बिजली परियोजनाओं सहित कई विभागों के विकास में भूमिका निभाई।

