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डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम: एक हेलीकॉप्टर हादसा, पांच महान आत्माएं और जीवन बदल देने वाला संकल्प

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नौशाद अख्तर | विशेष लेख

किसी व्यक्ति के जीवन में कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं, जो उसके सोचने का तरीका ही नहीं, बल्कि उसके जीवन का उद्देश्य भी बदल देती हैं। भारत के पूर्व राष्ट्रपति, महान वैज्ञानिक और ‘मिसाइल मैन’ डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के जीवन में 30 सितंबर 2001 की हेलीकॉप्टर दुर्घटना ऐसी ही एक घटना थी। मौत को बेहद करीब से देखने के बाद उन्होंने अपने जीवन, मानवता, नेतृत्व, आध्यात्मिकता और शिक्षा के उद्देश्य पर गहराई से विचार किया। इसी आत्ममंथन ने उन्हें एक ऐसे रास्ते की ओर प्रेरित किया, जहां विज्ञान की उपलब्धियों से भी बड़ा लक्ष्य था—बच्चों के मन में ज्ञान, नैतिकता, करुणा और विकसित भारत का सपना जगाना।

डॉ. कलाम ने अपनी पुस्तक इग्नाइटेड माइंड्स में इस अनुभव का उल्लेख करते हुए न केवल अपनी जिंदगी के एक असाधारण प्रसंग को साझा किया, बल्कि यह भी बताया कि उन्हें बच्चों से इतना गहरा लगाव क्यों था, वे किन महान व्यक्तित्वों से प्रेरणा लेते थे और क्यों अपने वैज्ञानिक करियर के एक महत्वपूर्ण मोड़ पर उन्होंने दोबारा शिक्षण और शोध की दुनिया में लौटने का फैसला किया।

उनका जीवन इस विश्वास का उदाहरण है कि किसी राष्ट्र का भविष्य केवल उसकी वैज्ञानिक शक्ति, आर्थिक समृद्धि या सैन्य क्षमता से नहीं बनता। उसकी असली ताकत उसके नागरिकों के चरित्र, विचारों की उदारता और मानवता के प्रति उनकी प्रतिबद्धता में छिपी होती है।

जब मौत के साये में मिला जीवन का संदेश

30 सितंबर 2001 को डॉ. कलाम झारखंड में रांची से बोकारो जा रहे थे। उन्हें ले जा रहे हेलीकॉप्टर का इंजन लैंडिंग से कुछ देर पहले फेल हो गया। हेलीकॉप्टर जोर से जमीन से टकराया, लेकिन उसमें सवार सभी लोग चमत्कारिक रूप से बच गए।

डॉ. कलाम ने इस घटना का वर्णन करते हुए लिखा कि वह ईश्वर के शुक्रगुजार थे। हादसे के बावजूद वह बोकारो में विद्यार्थियों को संबोधित करने के अपने निर्धारित कार्यक्रम पर आगे बढ़ना चाहते थे। हालांकि, रात में डॉक्टरों के एक पैनल ने उन्हें आराम करने और ट्रैंक्विलाइज़र लेने की सलाह दी।

दवा लेने के बाद भी उनकी नींद बार-बार टूटती रही। इसी बेचैनी के बीच उनके मन में एक बड़ा सवाल उठा—आखिर ईश्वर की सबसे सुंदर रचना माने जाने वाले इंसान आपस में इतनी हिंसा, नफरत और विभाजन के शिकार क्यों हैं?

यह सवाल महज एक वैज्ञानिक की जिज्ञासा नहीं था। यह उस संवेदनशील मनुष्य की चिंता थी, जिसने अपनी पूरी जिंदगी विज्ञान और प्रौद्योगिकी को देश की शक्ति बनाने में लगा दी थी, लेकिन अब वह मानवता के भीतर पल रहे विनाशकारी विरोधाभास को समझना चाहता था।

उसी रात उन्होंने पांच महान व्यक्तित्वों के बीच एक काल्पनिक संवाद की कल्पना की। ये पांच व्यक्तित्व थे—महात्मा गांधी, अल्बर्ट आइंस्टीन, सम्राट अशोक, अब्राहम लिंकन और खलीफा उमर।

डॉ. कलाम के लिए यह अनुभव सामान्य सपना नहीं था। उन्हें इसमें मानवता के सामने खड़े सवालों का उत्तर तलाशने का अवसर दिखाई दिया।

चांदनी रात में पांच महान व्यक्तित्वों का संवाद

डॉ. कलाम ने अपनी कल्पना में खुद को एक विशाल रेगिस्तान में खड़ा पाया। चारों ओर दूर-दूर तक रेत फैली थी और पूर्णिमा का चांद अपनी रोशनी बिखेर रहा था। वहां पांच महान व्यक्तित्व एक घेरे में खड़े थे।

इन पांचों ने अलग-अलग युगों में, अलग-अलग परिस्थितियों में जीवन जिया था। उनके अनुभव भी भिन्न थे, लेकिन मानवता के लिए उनके योगदान में एक साझा सूत्र था—मनुष्य को बेहतर जीवन की दिशा दिखाना।

इस कल्पित संवाद में डॉ. कलाम ने उन विचारों को सामने रखा, जो आज भी दुनिया के लिए उतने ही प्रासंगिक हैं जितने उनके समय में थे।

सम्राट अशोक: जीत का अर्थ दूसरों को हराना नहीं

सम्राट अशोक के जीवन में कलिंग युद्ध निर्णायक मोड़ साबित हुआ। युद्ध में हुई भारी जनहानि और तबाही ने एक विजेता के मन को भीतर तक झकझोर दिया। डॉ. कलाम ने अपने वर्णन में अशोक को उस क्षण की कल्पना में देखा, जब विजय का गौरव मानव पीड़ा के सामने फीका पड़ जाता है।

उन्होंने लिखा कि अशोक ने दो तरह की जिंदगी जी—पहली, एक निर्दयी विजेता की; दूसरी, एक दयालु शासक की।

कलिंग युद्ध की विभीषिका से उपजा पश्चाताप उन्हें हिंसा के रास्ते से दूर ले गया। डॉ. कलाम की कल्पना में अशोक का संदेश बेहद स्पष्ट था।

उन्होंने कहा, “दोस्तों, एक बात मैंने समझी है, दुख देने से कोई जीत नहीं होती। जीत तो एक शांतिपूर्ण राज में होती है।”

यह विचार सत्ता और सफलता की प्रचलित परिभाषाओं को चुनौती देता है। किसी को पराजित कर देना, किसी क्षेत्र पर कब्जा कर लेना या अपनी शक्ति का प्रदर्शन करना वास्तविक विजय नहीं है। असली सफलता तब है, जब लोगों के जीवन में शांति, सुरक्षा और सम्मान हो।

आज जब दुनिया के अनेक हिस्सों में युद्ध, हिंसा और प्रतिशोध की राजनीति दिखाई देती है, अशोक का यह संदेश याद दिलाता है कि विजय का सबसे बड़ा प्रमाण विनाश नहीं, बल्कि शांति है।

खलीफा उमर: सत्ता विशेषाधिकार नहीं, पवित्र जिम्मेदारी है

डॉ. कलाम के कल्पित संवाद में खलीफा उमर का व्यक्तित्व समानता, विनम्रता और न्याय की भावना को सामने लाता है।

यरूशलेम में प्रवेश के संदर्भ में उनके विचारों का सार यह था कि सभी इंसान बराबर हैं और किसी को अपने रास्ते पर चलने के लिए मजबूर करने का कोई औचित्य नहीं है।

इस संवाद में खलीफा उमर का संदेश था, “दूसरों को अपने रास्ते पर चलने के लिए मजबूर करने का कोई मतलब नहीं है। तुम्हें वही मिलेगा जो तुम्हारे लिए तय है। सिर्फ भगवान ही सबसे बड़ा है।”

यह विचार धार्मिक आस्था के साथ-साथ मानवीय स्वतंत्रता और सह-अस्तित्व की महत्ता को रेखांकित करता है। किसी व्यक्ति की आस्था, विचार या जीवन-पद्धति को जबरन बदलने की कोशिश के बजाय उसके सम्मान और अधिकारों की रक्षा करना ही न्यायपूर्ण समाज की पहचान है।

डॉ. कलाम ने खलीफा उमर के शासन संबंधी दृष्टिकोण को भी विशेष महत्व दिया। उनके अनुसार, खलीफा उमर ने अपने पद को उससे मिलने वाले विशेषाधिकारों के रूप में नहीं देखा। उनके लिए शासन एक पवित्र भरोसा था, जिसे किसी भी कीमत पर टूटने नहीं देना चाहिए।

इस विचार में आज के राजनीतिक नेतृत्व के लिए भी एक गहरा सबक है। पद व्यक्ति को दूसरों से बड़ा बनने का अधिकार नहीं देता; वह उसे दूसरों के प्रति अधिक जिम्मेदार बनाता है। सत्ता का मूल्य उसके वैभव में नहीं, बल्कि इस बात में है कि उसका उपयोग कमजोरों, जरूरतमंदों और आम नागरिकों के हित में कितना किया जाता है।

अल्बर्ट आइंस्टीन: विज्ञान को भी चाहिए नैतिक दिशा-सूचक

डॉ. कलाम की कल्पना में अगली आवाज अल्बर्ट आइंस्टीन की थी। इस संवाद में उन्होंने अपने मित्र वर्नर हाइजेनबर्ग के विचारों का उल्लेख किया।

हाइजेनबर्ग ने पश्चिमी सभ्यता की वैज्ञानिक और तकनीकी उपलब्धियों की तुलना एक विशाल, सुंदर जहाज से की, जिसमें यात्रियों के आराम के लिए सब कुछ मौजूद है, लेकिन दिशा बताने वाला कंपास नहीं है।

डॉ. कलाम के पाठ में यह विचार इस प्रकार सामने आता है:

“आप जानते हैं, पश्चिम में हमने एक बड़ा, सुंदर जहाज बनाया है। इसमें सभी आराम हैं, लेकिन एक चीज गायब है: इसमें कोई कंपास नहीं है और यह नहीं जानता कि कहां जाना है। टैगोर और गांधी जैसे लोगों और उनके आध्यात्मिक पूर्वजों को कंपास मिल गया था। यह कंपास इंसानी जहाज में क्यों नहीं लगाया जा सकता ताकि दोनों अपना मकसद पूरा कर सकें?”

यह सवाल आधुनिक सभ्यता की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक को उजागर करता है। विज्ञान हमें अभूतपूर्व क्षमताएं देता है। तकनीक दूरी मिटा सकती है, बीमारियों के उपचार में सहायता कर सकती है, उत्पादन बढ़ा सकती है और जीवन को अधिक सुविधाजनक बना सकती है। लेकिन इन क्षमताओं का इस्तेमाल किस उद्देश्य से किया जाए, यह सवाल विज्ञान अकेले नहीं सुलझा सकता।

परमाणु ऊर्जा का इस्तेमाल मानव कल्याण के लिए भी हो सकता है और विनाश के लिए भी। डिजिटल तकनीक लोगों को जोड़ सकती है, लेकिन नफरत फैलाने का माध्यम भी बन सकती है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता मानव जीवन को आसान बना सकती है, लेकिन उसके उपयोग में नैतिकता की अनदेखी गंभीर समस्याएं भी पैदा कर सकती है।

इसीलिए विज्ञान को नैतिक विवेक और मानवीय मूल्यों की दिशा की आवश्यकता है। कलाम की दृष्टि में ज्ञान और आध्यात्मिकता का मेल इसी संतुलन का रास्ता था।

अब्राहम लिंकन: समृद्धि के साथ नैतिकता भी जरूरी

अमेरिकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने गुलामी के खिलाफ संघर्ष किया और समानता तथा मानवीय गरिमा के विचार को मजबूती दी। डॉ. कलाम के कल्पित संवाद में लिंकन ने खुशी, समृद्धि और नैतिक मूल्यों के बीच संबंध पर विचार किया।

उनके कथन का सार था कि इंसानी जीवन में खुशी और आनंद महत्वपूर्ण हैं, लेकिन जब व्यक्ति और राष्ट्र समृद्धि तथा शक्ति की चाह में नैतिकता को पीछे छोड़ देते हैं, तब संघर्ष और असंतोष बढ़ने लगते हैं।

डॉ. कलाम के पाठ में लिंकन के शब्द हैं:

“शायद लोगों और देशों के बीच इतना झगड़ा इसलिए है क्योंकि खुशहाली और ताकत की चाहत में हमने नैतिक मूल्यों को नजरअंदाज कर दिया है। हमें खुद से पूछना चाहिए कि हमारी भूमिका क्या है?”

लिंकन का यह प्रश्न केवल नेताओं के लिए नहीं, बल्कि समाज के हर व्यक्ति के लिए है। हम जिस परिवार, संस्था, समाज या राष्ट्र का हिस्सा हैं, उसके निर्माण में हमारा योगदान क्या है? क्या हमारी सफलता से दूसरों को भी लाभ मिलता है? क्या हमारी उपलब्धियां न्याय और मानवीय गरिमा को मजबूत करती हैं?

यदि समृद्धि का लाभ कुछ लोगों तक सीमित रह जाए, यदि विकास के साथ असमानता और शोषण बढ़ें, तो प्रगति अधूरी रह जाती है।

इस संवाद में गांधी ने ऋषि अष्टावक्र के विचारों को याद करते हुए कहा:

“हे मेरे बेटे! तुम ही वो चेतना हो जिसके अंदर यह अनोखी दुनिया पैदा होती है, जो तुमसे अलग नहीं है।”

इस विचार के माध्यम से डॉ. कलाम जीवन को एक व्यापक मानवीय चेतना से जोड़ते हैं। मनुष्य और संसार को एक-दूसरे से अलग मानकर शोषण और संघर्ष का रास्ता चुनने के बजाय, उनके बीच के संबंध को समझना जरूरी है।

इस संवाद का निष्कर्ष स्पष्ट है—जीवन का उद्देश्य शांति और खुशहाली होना चाहिए, न कि शोषण और संघर्ष।

महात्मा गांधी: मानवता को जोड़ना ही सबसे बड़ा संदेश

इस कल्पित सभा में महात्मा गांधी की आवाज उन सभी विचारों को एक साझा दिशा देती है।

गांधी कहते हैं:

“दोस्तों, हम जो भगवान का संदेश सुन रहे हैं, वह दुनिया बनाने का संदेश है। क्योंकि हम सब धरती ग्रह के ही हैं, इसलिए हम इंसानियत को यह संदेश दे सकते हैं कि अलग-अलग नस्ल, धर्म और भाषा के लोग एक साथ शांति और खुशहाली से कैसे रह सकते हैं।”

यह कथन डॉ. कलाम की सोच के केंद्र को सामने लाता है। विविधता कोई ऐसी समस्या नहीं है जिसे मिटाकर दुनिया को बेहतर बनाया जा सके। असली चुनौती यह है कि विविधताओं के बावजूद मनुष्य एक-दूसरे के साथ सम्मानपूर्वक रहना सीखें।

गांधी आगे सवाल उठाते हैं कि क्या मनुष्य के कामों और प्रयासों से मानवता को दिया गया योगदान अपना उद्देश्य पूरा कर रहा है? क्या ईश्वर की सुंदरता इंसान की आत्मा में उतर सकती है और उसके शरीर तथा मन में खुशी का संचार कर सकती है?

यहां धर्म का अर्थ केवल किसी धार्मिक पहचान तक सीमित नहीं है। यह मनुष्य के भीतर करुणा, सत्य, अहिंसा और दूसरे के दुख को समझने की क्षमता जगाने का माध्यम बनता है।

डॉ. कलाम इस संवाद के निष्कर्ष को इन शब्दों में रखते हैं:

“हम जो कुछ भी करते हैं, कोई भी सिद्धांत जिसे हम मानते हैं, वह इंसानियत की भलाई के लिए होना चाहिए।”

यही इस पूरे अनुभव का केंद्रीय संदेश है। विचारों, विश्वासों और सिद्धांतों का मूल्य इस बात से तय होना चाहिए कि वे मनुष्य और समाज के जीवन को कितना बेहतर बनाते हैं।

दुर्घटना के बाद उठा सबसे बड़ा सवाल: अब जीवन किसके लिए?

अगली सुबह डॉ. कलाम देर तक चाय पीते हुए रात के अनुभव पर विचार करते रहे। वह सोच रहे थे कि यदि हेलीकॉप्टर का इंजन कुछ और ऊंचाई पर बंद हो जाता, तो क्या परिणाम होता?

उन्होंने एक और दुर्घटना का जिक्र किया, जिसमें एक होनहार नेता और युवा प्रतिभाशाली पत्रकारों की टीम के सदस्य मारे गए थे। अपने बच जाने को उन्होंने एक नए आत्ममंथन का अवसर माना।

उनके मन में सवाल था—अब उन्हें क्या करना चाहिए?

डॉ. कलाम के जीवन में प्रकृति हमेशा प्रेरणा का स्रोत रही थी। रामेश्वरम, थुंबा और चांदीपुर के समुद्र, पोखरण का रेगिस्तान और हैदराबाद की विशाल चट्टानें—जहां भी उन्होंने काम किया, प्रकृति ने उन्हें अपने होने का एहसास कराया।

प्रकृति के प्रति अपने लगाव को व्यक्त करते हुए उन्होंने आम के पेड़ का उदाहरण दिया। लोग उस पर पत्थर फेंकते हैं, उसकी डालियां तोड़ते हैं, फिर भी वह थके हुए यात्री को छाया और भूखे व्यक्ति को फल देता है।

इस उदाहरण में डॉ. कलाम ने निस्वार्थ सेवा की सुंदर तस्वीर देखी। प्रकृति प्रतिदान की शर्त नहीं रखती। वह देती है, पोषण करती है और जीवन को आगे बढ़ाती है।

उनके लिए यह अनुभव उस दिव्य शक्ति की याद दिलाता था, जिसे वह पूरी दुनिया में व्याप्त महसूस करते थे।

लेकिन प्रकृति की सुंदरता के साथ मानवता की विडंबना भी उनके सामने थी। इतिहास में गांधी जैसे संत और शिक्षक लोगों को बेहतर जीवन का रास्ता दिखाते रहे हैं, तो दूसरी ओर विश्व युद्धों, परमाणु बमों और विभिन्न संघर्षों ने असंख्य लोगों की जान ली है।

इंसान के भीतर सृजन और विनाश, दोनों की क्षमता है। प्रश्न यह है कि वह अपनी ऊर्जा किस दिशा में लगाता है।

बच्चों में तलाशा भारत का भविष्य

डॉ. कलाम के लिए इस आत्ममंथन का सबसे महत्वपूर्ण परिणाम बच्चों की ओर लौटने का संकल्प था।

उन्होंने लिखा कि एक बार एक बच्चे ने उनसे पूछा कि क्या उन्होंने महाभारत पढ़ी है और उसमें उनका पसंदीदा पात्र कौन है। डॉ. कलाम ने विदुर का नाम लिया।

विदुर उन्हें इसलिए पसंद थे क्योंकि उनमें सत्ता के गलत कामों के विरुद्ध आवाज उठाने का साहस था। जब दूसरे लोग अधर्म और अन्याय के सामने झुक जाते थे, तब विदुर अपनी असहमति व्यक्त करने से पीछे नहीं हटते थे।

डॉ. कलाम ने सार्वजनिक जीवन की गिरती गुणवत्ता, बातचीत के स्तर में गिरावट और अहंकार, क्रोध, लालच, ईर्ष्या, नफरत तथा भय जैसी प्रवृत्तियों पर चिंता व्यक्त की।

उनकी चिंता केवल राजनीतिक नेतृत्व तक सीमित नहीं थी। वह चाहते थे कि भारत में ऐसे चरित्रवान, विवेकशील और साहसी लोग तैयार हों, जो अपनी अंतरात्मा की आवाज सुन सकें और अन्याय के सामने खड़े हो सकें।

उन्होंने अपने जीवन की प्राथमिकताओं पर पुनर्विचार किया। उनके वैज्ञानिक करियर, उपलब्धियों, पुरस्कारों और टीमों का महत्व अपनी जगह था, लेकिन अब वह भारत की उस सामूहिक बुद्धिमत्ता का हिस्सा बनना चाहते थे, जो आने वाली पीढ़ियों को बेहतर दिशा दे सकती है।

उन्होंने बच्चों के साथ संवाद को आत्म-विकास और राष्ट्र-निर्माण का माध्यम माना। उन्हें उम्मीद थी कि बच्चों से बातचीत करते हुए वह स्वयं भी अपने भीतर के उच्चतर स्वरूप को पहचान सकेंगे।

यहां डॉ. कलाम की महानता का एक विशेष पहलू सामने आता है। उन्होंने बच्चों को केवल पढ़ाए जाने वाले विद्यार्थी नहीं माना, बल्कि उन्हें अपने शिक्षक के रूप में भी देखा। उनके लिए बच्चों के प्रश्न, उनकी जिज्ञासा और उनकी कल्पनाशीलता सीखने की निरंतर प्रक्रिया का हिस्सा थे।

राष्ट्रों के विकास की चार अवस्थाएं

डॉ. कलाम ने मनुष्य के व्यक्तिगत विकास की विभिन्न अवस्थाओं को राष्ट्रों के विकास से जोड़कर देखा। उन्होंने डॉ. वेन डब्ल्यू. डायर की पुस्तक मैनिफेस्ट योर डेस्टिनी में वर्णित जीवन की अवस्थाओं से प्रेरणा लेते हुए राष्ट्रों के लिए भी एक विचार प्रस्तुत किया।

उनके अनुसार, राष्ट्रों की यात्रा को चार व्यापक चरणों में समझा जा सकता है।

पहला चरण—एथलीट अवस्था: इस अवस्था में कोई देश स्वतंत्रता प्राप्त करने या बड़े बदलाव से गुजरने के बाद प्रदर्शन, उपलब्धि और अपनी क्षमता साबित करने पर ध्यान देता है। डॉ. कलाम ने जापान, सिंगापुर और मलेशिया का उदाहरण दिया।

दूसरा चरण—वॉरियर अवस्था: इस चरण में उपलब्धियों पर गर्व कभी-कभी अहंकार और दूसरों से श्रेष्ठ साबित होने की इच्छा में बदल जाता है। प्रतिस्पर्धा, विजय और शक्ति का प्रदर्शन प्रमुख उद्देश्य बन जाते हैं।

तीसरा चरण—बिग ब्रदर अवस्था: इस स्तर पर देश अपनी शक्ति को केवल दूसरों पर प्रभाव जमाने के लिए इस्तेमाल नहीं करता, बल्कि दूसरे देशों और समाजों के विकास में सहायता देने की जिम्मेदारी भी समझता है। डॉ. कलाम ने इसे अधिक परिपक्व दृष्टिकोण के रूप में प्रस्तुत किया।

चौथा चरण—आत्म-साक्षात्कार की अवस्था: यह सबसे ऊंचा चरण है, जहां कोई राष्ट्र समझता है कि पृथ्वी किसी एक देश की संपत्ति नहीं है। सभी मनुष्य एक साझा संसार का हिस्सा हैं और प्रत्येक देश की जिम्मेदारी अपनी सीमाओं से आगे तक जाती है।

डॉ. कलाम का विश्वास था कि भारत में इस अंतिम अवस्था तक पहुंचने की क्षमता है।

यह विचार भारत के लिए एक बड़े उद्देश्य की कल्पना करता है। राष्ट्र की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि उसकी अर्थव्यवस्था कितनी बड़ी है, उसकी सेना कितनी शक्तिशाली है या उसकी तकनीक कितनी उन्नत है। यह भी देखा जाना चाहिए कि वह दुनिया में शांति, सहयोग और मानव कल्याण के लिए क्या योगदान देता है।

वैज्ञानिक से शिक्षक तक: उपलब्धियों से आगे की यात्रा

डॉ. कलाम का जीवन विभिन्न चरणों में विकसित हुआ। उन्होंने भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) में काम करते हुए अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1980 में भारत के उपग्रह प्रक्षेपण यान एसएलवी-3 ने रोहिणी उपग्रह को कक्षा में पहुंचाया। इस मिशन के परियोजना निदेशक के रूप में डॉ. कलाम ने एक ऐसी टीम का नेतृत्व किया, जिसने देश की तकनीकी क्षमता को मजबूत करने में योगदान दिया।

उन्होंने डॉ. विक्रम साराभाई, प्रो. सतीश धवन और डॉ. ब्रह्म प्रकाश जैसे महान वैज्ञानिकों से नेतृत्व और कार्य-संस्कृति की सीख ली।

इसके बाद रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) में उन्होंने मिसाइल प्रौद्योगिकी और स्वदेशी रक्षा प्रणालियों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस दौर में उन्हें सफलताओं के साथ असफलताओं का भी सामना करना पड़ा।

उन्होंने अपनी असफलताओं से सीखने और उनका साहसपूर्वक सामना करने को अपने जीवन का महत्वपूर्ण सबक माना।

इसके बाद परमाणु परीक्षणों और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मिशनों में वैज्ञानिक संस्थानों तथा सशस्त्र बलों के साथ मिलकर काम करने का अवसर मिला। उनके अनुभवों ने यह स्पष्ट किया कि किसी देश की तकनीकी शक्ति केवल एक व्यक्ति की प्रतिभा से नहीं, बल्कि वैज्ञानिकों, संस्थानों, उद्योगों और शैक्षणिक जगत के सहयोग से विकसित होती है।

लेकिन इतने बड़े वैज्ञानिक योगदान के बाद भी डॉ. कलाम की खुशी का सबसे गहरा स्रोत केवल मिसाइलों, प्रक्षेपण यानों या राष्ट्रीय सुरक्षा की उपलब्धियों में नहीं था।

बच्चों से बातचीत के दौरान जब उनसे पूछा गया कि पिछले चालीस वर्षों में उन्हें सबसे अधिक खुशी किस बात से मिली, तो उन्होंने ऐसे उदाहरण दिए जो विज्ञान के मानवीय उद्देश्य को सामने लाते हैं।

उन्होंने लिखा:

“मुझे खुशी तब मिलती है जब दिल के मरीजों की धमनियों में केआर कोरोनरी स्टेंट लगाया जाता है और जब शारीरिक रूप से विकलांग बच्चों को हल्के वजन वाले ‘फ्लोर रिएक्शन ऑर्थोसिस’ (एफआरओ) कैलिपर्स लगाए जाते हैं, जिससे उनकी मुश्किलें कुछ कम हो जाती हैं। ये दोनों ही चीजें मिसाइल टेक्नोलॉजी से निकलीं।”

इन उदाहरणों में डॉ. कलाम की वैज्ञानिक दृष्टि का सार छिपा है। जिस तकनीक का विकास राष्ट्रीय रक्षा के लिए हुआ, उसी से प्रेरित तकनीकी क्षमताएं चिकित्सा और दिव्यांग बच्चों के जीवन में भी उपयोगी साबित हुईं।

विज्ञान की असली सफलता केवल प्रयोगशाला में किसी लक्ष्य को प्राप्त करना नहीं है। वह तब और सार्थक हो जाता है, जब उसका लाभ आम इंसान तक पहुंचे, किसी मरीज की पीड़ा कम हो या किसी बच्चे के लिए चलना-फिरना आसान हो जाए।

‘टेक्नोलॉजी विजन 2020’ और विकसित भारत का सपना

डॉ. कलाम ने विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के अंतर्गत टेक्नोलॉजी इंफॉर्मेशन, फोरकास्टिंग एंड असेसमेंट काउंसिल (टाइफैक) के अध्यक्ष के रूप में भी काम किया। इस दौरान ‘टेक्नोलॉजी विजन 2020’ तैयार करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया गया।

इस पहल में सैकड़ों विशेषज्ञों की भागीदारी थी। उद्देश्य था भारत की क्षमताओं, संसाधनों और विकास की संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए देश को एक विकसित राष्ट्र बनाने की दिशा तय करना।

डॉ. कलाम की सोच में विकास का अर्थ केवल बड़े उद्योगों, आधुनिक शहरों और उन्नत तकनीक तक सीमित नहीं था। शिक्षा, कृषि, ग्रामीण विकास और सामाजिक जरूरतों के अनुरूप तकनीकी क्षमताओं का निर्माण भी उनके मिशन के महत्वपूर्ण हिस्से थे।

उनका विश्वास था कि राष्ट्र-निर्माण के लिए संस्थानों के बीच साझेदारी, ज्ञान का आदान-प्रदान और विज्ञान का व्यावहारिक इस्तेमाल जरूरी है।

हेलीकॉप्टर दुर्घटना के बाद उन्हें महसूस हुआ कि अब उनके जीवन का अगला चरण बच्चों, शिक्षा और आध्यात्मिक मूल्यों के बीच संबंध मजबूत करने का होना चाहिए।

2 अक्टूबर 2001 को महात्मा गांधी की जयंती पर केरल के एक आश्रम की यात्रा के दौरान यह विचार और दृढ़ हुआ। वहां शिक्षा के साथ आध्यात्मिकता जोड़ने और नई पीढ़ी के नेताओं तथा उद्यमियों को तैयार करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया।

12 अक्टूबर 2001 को, अपने सत्तरवें जन्मदिन से कुछ दिन पहले, डॉ. कलाम ने औपचारिक रूप से प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को पत्र लिखकर अपने पद से मुक्त किए जाने का अनुरोध किया। इस बार उनकी इच्छा स्वीकार कर ली गई।

यह निर्णय उनके जीवन की प्राथमिकताओं में एक बड़े बदलाव का प्रतीक था। वह अपनी उपलब्धियों के शिखर से पीछे हटकर उस काम में अधिक समय देना चाहते थे, जिसे वह भारत के भविष्य के लिए सबसे महत्वपूर्ण मानते थे—बच्चों को प्रेरित करना और उन्हें ज्ञान तथा चरित्र की दिशा देना।

चालीस हजार विद्यार्थियों से संवाद: ज्ञान के साथ सपनों की लौ

डॉ. कलाम ने स्कूलों और शैक्षणिक संस्थानों के दौरे जारी रखे। असम, त्रिपुरा, झारखंड और तमिलनाडु सहित विभिन्न क्षेत्रों में उन्होंने हजारों विद्यार्थियों को संबोधित किया। अपनी पुस्तक में उन्होंने ऐसे संवादों में भाग लेने वाले विद्यार्थियों की संख्या लगभग 40,000 बताई।

उन्होंने महसूस किया कि बच्चों के साथ उनका स्वाभाविक जुड़ाव बन जाता है। वह उनकी कल्पनाओं को समझ सकते थे और उनसे बातचीत के जरिए विज्ञान के प्रति प्रेम जगाने की कोशिश कर सकते थे।

उनके लिए यह सिर्फ विज्ञान पढ़ाने का काम नहीं था। वह चाहते थे कि वैज्ञानिक जिज्ञासा बच्चों के भीतर बड़े सपने देखने और देश के विकास में योगदान देने की इच्छा भी पैदा करे।

उनका मानना था कि भारत के बच्चों के मन में ऊर्जा और रचनात्मकता की कोई कमी नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि उन्हें उचित अवसर, प्रेरणा, मार्गदर्शन और नैतिक आधार मिले।

उन्होंने अपने अगले चरण की सफलता को लेकर कोई बड़ा दावा नहीं किया। इसके बजाय उन्होंने ईमानदारी से स्वीकार किया कि उन्हें नहीं पता कि वह सफल हो पाएंगे या नहीं। लेकिन सपनों के प्रति समर्पण की शक्ति में उनका विश्वास अटूट था।

उन्होंने लिखा:

“सच कहूं तो मुझे नहीं पता। लेकिन मैं इतना जरूर जानता हूं कि किसी सपने के प्रति समर्पण से बड़ी कोई शक्ति स्वर्ग या पृथ्वी पर नहीं है।”

यह कथन डॉ. कलाम के पूरे जीवन को समझने की कुंजी है। उनके लिए सपना केवल कल्पना नहीं था। वह ऐसा लक्ष्य था, जिसके लिए व्यक्ति को अपनी ऊर्जा, समय और प्रतिभा समर्पित करनी पड़ती है।

राष्ट्रपति पद से आगे: शिक्षण में मिली जीवन की सार्थकता

डॉ. कलाम के मन में कई वर्षों से शोध और शिक्षण के क्षेत्र में लौटने की इच्छा थी। इसी उद्देश्य से वह अन्ना विश्वविद्यालय पहुंचे, ताकि युवाओं के बीच रह सकें और स्कूली बच्चों से मिलने के लिए समय निकाल सकें।

युवाओं के बीच रहने के अपने अनुभव को उन्होंने उत्साहपूर्ण बताया। उनके अनुसार, रचनात्मकता और ऊर्जा से भरे युवाओं के बीच रहना एक शानदार एहसास था।

लेकिन इस ऊर्जा के साथ एक जिम्मेदारी भी जुड़ी थी। देश के वरिष्ठ नागरिकों, शिक्षकों और संस्थानों को यह सुनिश्चित करना था कि युवाओं की प्रतिभा देश-निर्माण की दिशा में इस्तेमाल हो।

डॉ. कलाम का यह विचार विशेष महत्व रखता है कि शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा में अच्छे अंक लाना, नौकरी पाना या आर्थिक रूप से सफल होना नहीं है। शिक्षा को व्यक्ति के चरित्र, विवेक और सामाजिक जिम्मेदारी का भी निर्माण करना चाहिए।

उनकी दृष्टि में शिक्षा और आध्यात्मिकता का संबंध इसी व्यापक उद्देश्य से जुड़ा था। आध्यात्मिकता का आशय यहां आत्म-पहचान, नैतिकता, करुणा और जीवन के गहरे उद्देश्य को समझने से है।

उनका अंतिम संदेश इसी विचार को संक्षेप में व्यक्त करता है:

“शिक्षा में आध्यात्मिकता को शामिल किया जाना चाहिए। आत्म-साक्षात्कार ही मुख्य बात है। हममें से हर किसी को अपने उच्च स्वरूप के बारे में जागरूक होना चाहिए।”

वह आगे लिखते हैं कि हम एक शानदार अतीत और भव्य भविष्य के बीच की कड़ी हैं। इसलिए हमें अपनी सोई हुई आंतरिक ऊर्जा को जगाना चाहिए और उसे अपने जीवन का मार्गदर्शन करने देना चाहिए।

उनके अनुसार, रचनात्मक कार्यों में लगे लोगों की ऊर्जा और प्रतिभा ही देश में शांति, समृद्धि और खुशी लाने में मदद कर सकती है।

आज के भारत के लिए डॉ. कलाम के विचारों का महत्व

डॉ. कलाम की पुस्तक में वर्णित यह अनुभव केवल उनके व्यक्तिगत जीवन की कहानी नहीं है। यह आधुनिक समाज, राजनीतिक नेतृत्व, वैज्ञानिक समुदाय, शिक्षकों और युवाओं के लिए अनेक सवाल छोड़ता है।

क्या विकास का अर्थ केवल अधिक उत्पादन, अधिक संपत्ति और अधिक शक्ति है? क्या विज्ञान की प्रगति के साथ नैतिकता भी आगे बढ़ रही है? क्या राजनीतिक मतभेदों के बावजूद समाज में संवाद और सहिष्णुता बची हुई है? क्या शिक्षा बच्चों को केवल सफल पेशेवर बना रही है, या उन्हें जिम्मेदार नागरिक बनने में भी मदद कर रही है?

इन सवालों के उत्तर किसी एक व्यक्ति या संस्था के पास नहीं हैं। लेकिन डॉ. कलाम का जीवन बताता है कि इनका सामना करने से बचा नहीं जा सकता।

उनके विचार हमें यह समझने में मदद करते हैं कि राष्ट्रीय शक्ति और मानवीय संवेदना एक-दूसरे की विरोधी नहीं हैं। विज्ञान और आध्यात्मिकता के बीच भी अनिवार्य टकराव नहीं है। तकनीकी क्षमता, नैतिक विवेक और सामाजिक जिम्मेदारी साथ-साथ आगे बढ़ सकते हैं।

इसी तरह, बच्चों को भविष्य का नागरिक मानना पर्याप्त नहीं है। उन्हें वर्तमान में भी गंभीरता से सुनना, उनके प्रश्नों का सम्मान करना और उनकी रचनात्मकता को अवसर देना जरूरी है।

डॉ. कलाम की सबसे बड़ी प्रेरणा शायद यही है कि जीवन की उपलब्धियां कितनी भी बड़ी क्यों न हों, मनुष्य को अपने उद्देश्य पर पुनर्विचार करते रहना चाहिए। कभी-कभी एक अप्रत्याशित घटना हमें यह समझा देती है कि हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी क्या है।

निष्कर्षतः, डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम की कहानी विज्ञान से आध्यात्मिकता की ओर पलायन की नहीं, बल्कि विज्ञान को मानवता की सेवा से और गहराई से जोड़ने की कहानी है। उन्होंने मिसाइलों और अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के माध्यम से भारत की क्षमताओं को मजबूत करने में योगदान दिया, लेकिन जीवन के एक महत्वपूर्ण मोड़ पर उन्होंने बच्चों के मन में सपनों की लौ जलाने को अपना मिशन बनाया।

उनकी दृष्टि में विकसित भारत वह देश नहीं था, जो केवल आर्थिक और तकनीकी रूप से शक्तिशाली हो। वह ऐसा भारत था, जहां ज्ञान के साथ नैतिकता हो, विज्ञान के साथ विवेक हो, नेतृत्व के साथ सेवा हो और विविधता के बीच मानवता का साझा सूत्र बना रहे।

उनकी कल्पना के पांच महान व्यक्तित्वों का संदेश भी इसी दिशा में जाता है—अशोक की शांति, खलीफा उमर का न्याय, आइंस्टीन का नैतिक दिशा-सूचक, लिंकन की समानता और गांधी का मानवतावाद।

इन सभी विचारों को जोड़ने वाला सूत्र डॉ. कलाम का अपना जीवन है। एक ऐसा जीवन, जिसने हमें सिखाया कि सबसे बड़ी उपलब्धि केवल ऊंचाइयों तक पहुंचना नहीं, बल्कि अपनी ऊंचाई का उपयोग दूसरों को ऊपर उठाने के लिए करना है।

और शायद इसी में उस हेलीकॉप्टर दुर्घटना के बाद मिले संदेश का सबसे गहरा अर्थ छिपा है: मनुष्य का जीवन तभी सार्थक बनता है, जब उसकी प्रतिभा, उसका ज्ञान और उसके सपने पूरी मानवता के बेहतर भविष्य के लिए समर्पित हों।

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