मलेशिया और इस्तांबुल में एएमयू के दो शोधार्थियों ने लहराया परचम
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मुस्लिम नाउ ब्यूरो, अलीगढ़
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) के दो विद्यार्थियों ने अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक सम्मेलनों में पुरस्कार जीतकर विश्वविद्यालय का नाम रोशन किया है। एएमयू के कृषि सूक्ष्मजीव विज्ञान विभाग की रिसर्च स्कॉलर दिव्या वार्ष्णेय को मलेशिया में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में ‘बेस्ट ओरल प्रेजेंटेशन अवार्ड’ मिला। वहीं, कंप्यूटर साइंस विभाग के छात्र हामिद हुसैन खान ने तुर्की के इस्तांबुल में आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में ‘बेस्ट प्रेजेंटेशन अवार्ड’ हासिल किया।
दोनों विद्यार्थियों की शोध परियोजनाएं अलग-अलग विषयों पर केंद्रित हैं। दिव्या वार्ष्णेय का शोध मुंह में संक्रमण पैदा करने वाले सूक्ष्मजीवों और उनसे बनने वाली बायोफिल्म की समस्या से जुड़ा है। दूसरी ओर, हामिद हुसैन खान ने कम संसाधनों वाली उर्दू भाषा के लिए ऑटोमैटिक स्पीच रिकग्निशन सिस्टम की जांच और मूल्यांकन पर काम किया है।
इन उपलब्धियों से एएमयू के शोध कार्यों में कृषि सूक्ष्मजीव विज्ञान, नैनोटेक्नोलॉजी, साइबर सुरक्षा, डिजिटल फोरेंसिक और भाषा प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में विद्यार्थियों की भागीदारी सामने आई है। दोनों शोधार्थियों को उनके विषयों पर किए गए काम और अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक मंचों पर प्रस्तुतियों के लिए सम्मानित किया गया।
मलेशिया में दिव्या वार्ष्णेय को मिला बेस्ट ओरल प्रेजेंटेशन अवार्ड

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के एग्रीकल्चरल माइक्रोबायोलॉजी विभाग की रिसर्च स्कॉलर दिव्या वार्ष्णेय ने मलेशिया में आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में ‘बेस्ट ओरल प्रेजेंटेशन अवार्ड’ जीता। यह सम्मेलन मणिपाल यूनिवर्सिटी कॉलेज में क्लिनिकल, हेल्थ, इंजीनियरिंग एंड मेडिकल साइंसेज विषयों पर आयोजित किया गया था।
दिव्या को यह सम्मान उनके शोध पत्र की प्रस्तुति के लिए दिया गया। उनके शोध का शीर्षक था, “स्टैफिलोकोकस ऑरियस और कैंडिडा एल्बिकन्स के सिंगल और मिक्स्ड स्पीशीज ओरल बायोफिल्म के खिलाफ मोनार्डा एसेंशियल ऑयल वाले काइटोसन नैनोपार्टिकल्स की एंटीमाइक्रोबियल और एंटीबायोफिल्म क्षमता।”
यह शोध मुंह में संक्रमण पैदा करने वाले सूक्ष्मजीवों और उनसे बनने वाली बायोफिल्म से निपटने के संभावित तरीकों पर केंद्रित है। इसमें एसेंशियल ऑयल से युक्त काइटोसन नैनोपार्टिकल्स की भूमिका का अध्ययन किया गया है। शोधकर्ताओं ने यह समझने की कोशिश की कि ये नैनोपार्टिकल्स अलग-अलग प्रकार के सूक्ष्मजीवों से बनने वाली बायोफिल्म और एक से अधिक सूक्ष्मजीवों के संयुक्त समूह से बनी बायोफिल्म के खिलाफ कितने प्रभावी हो सकते हैं।
क्या है दिव्या वार्ष्णेय के शोध का महत्व?
बायोफिल्म सूक्ष्मजीवों का ऐसा समूह होता है, जो किसी सतह पर एक साथ जमा होकर अपने चारों ओर एक सुरक्षात्मक परत बना सकता है। इस वजह से कुछ परिस्थितियों में सूक्ष्मजीवों को नियंत्रित करना मुश्किल हो जाता है। मुंह में मौजूद कुछ बैक्टीरिया और फंगस भी बायोफिल्म बना सकते हैं। इनका संबंध दांतों और मुंह के संक्रमण से जुड़ी समस्याओं से हो सकता है।
दिव्या वार्ष्णेय के शोध में दो सूक्ष्मजीवों, स्टैफिलोकोकस ऑरियस और कैंडिडा एल्बिकन्स, पर विशेष ध्यान दिया गया है। पहला एक प्रकार का बैक्टीरिया है, जबकि दूसरा फंगस है। अध्ययन में इनसे बनने वाली अलग-अलग और संयुक्त बायोफिल्म के खिलाफ मोनार्डा एसेंशियल ऑयल वाले काइटोसन नैनोपार्टिकल्स की संभावित प्रभावशीलता की पड़ताल की गई।
काइटोसन एक ऐसा पदार्थ है, जिसका इस्तेमाल विभिन्न वैज्ञानिक और जैव चिकित्सा संबंधी शोधों में किया जाता है। नैनोटेक्नोलॉजी की मदद से तैयार किए गए कणों के जरिए सक्रिय पदार्थों के इस्तेमाल की संभावनाओं का भी अध्ययन किया जाता है। दिव्या का शोध इसी दिशा में किया गया प्रयास है।
इस अध्ययन का एक महत्वपूर्ण पहलू एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस यानी रोगाणुरोधी दवाओं के प्रति सूक्ष्मजीवों में विकसित होने वाली प्रतिरोधक क्षमता की समस्या भी है। हालांकि, शोध के नतीजों के आधार पर किसी उपचार की प्रभावशीलता या मरीजों के लिए इसकी उपयोगिता तय करने के लिए आगे वैज्ञानिक परीक्षण जरूरी होंगे।
दिव्या वार्ष्णेय ने यह शोध एएमयू के एग्रीकल्चरल माइक्रोबायोलॉजी विभाग के प्रोफेसर इकबाल अहमद की देखरेख में किया। उनकी इस उपलब्धि पर कृषि विज्ञान संकाय के डीन प्रोफेसर आर.यू. खान और विभागाध्यक्ष प्रोफेसर शम्स तबरेज खान ने भी खुशी जताई। उन्होंने दिव्या के काम की सराहना की और उन्हें भविष्य में भी अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक सम्मेलनों में हिस्सा लेने के लिए प्रोत्साहित किया।
इस्तांबुल में हामिद हुसैन खान को मिला बेस्ट प्रेजेंटेशन अवार्ड

एएमयू के कंप्यूटर साइंस विभाग के छात्र हामिद हुसैन खान ने भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी शोध क्षमता का परिचय दिया है। वह एमएससी साइबर सिक्योरिटी एंड डिजिटल फोरेंसिक के वर्ष 2026 बैच के विद्यार्थी हैं। उन्हें तुर्की के इस्तांबुल में आयोजित चौथे अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन ‘इनोवेटिव कंप्यूटिंग एंड कटिंग एज टेक्नोलॉजीज’ यानी आईसीआईसीसीटी 2026 में ‘बेस्ट प्रेजेंटेशन अवार्ड’ से सम्मानित किया गया।
यह सम्मेलन हाइब्रिड मोड में आयोजित हुआ था। इसमें ऑनलाइन और प्रत्यक्ष भागीदारी के माध्यम से शोध प्रस्तुत करने का अवसर उपलब्ध था। हामिद को यह पुरस्कार उनके शोध पत्र की प्रस्तुति के लिए दिया गया।
उनके शोध का शीर्षक था, “ऑडिटिंग ऑटोमैटिक स्पीच रिकग्निशन सिस्टम्स फॉर लो रिसोर्स उर्दू लैंग्वेज।” इस शोध को उन्होंने एएमयू के कंप्यूटर साइंस विभाग के प्रोफेसर आसिम जफर के साथ मिलकर तैयार किया।
हामिद का शोध उर्दू भाषा के लिए विकसित ऑटोमैटिक स्पीच रिकग्निशन सिस्टम की जांच और मूल्यांकन से संबंधित है। ऐसी तकनीक का उद्देश्य इंसानी आवाज को पहचानकर उसे लिखित शब्दों में बदलना होता है। इसका इस्तेमाल वॉइस टाइपिंग, वॉयस असिस्टेंट, भाषण के ट्रांसक्रिप्शन और भाषा आधारित डिजिटल सेवाओं में किया जा सकता है।
उर्दू भाषा और स्पीच रिकग्निशन तकनीक पर शोध
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और भाषा प्रौद्योगिकी के विकास के साथ स्पीच रिकग्निशन सिस्टम का इस्तेमाल बढ़ रहा है। लेकिन सभी भाषाओं को इस तकनीक में समान स्तर पर प्रतिनिधित्व नहीं मिलता। जिन भाषाओं के लिए पर्याप्त डिजिटल डेटा, रिकॉर्ड किए गए भाषण और दूसरे संसाधन उपलब्ध नहीं हैं, उनके लिए सटीक सिस्टम तैयार करना अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
उर्दू भी ऐसी भाषाओं में शामिल है, जिनके लिए डिजिटल भाषा संसाधनों की उपलब्धता और गुणवत्ता महत्वपूर्ण विषय हैं। हामिद हुसैन खान का शोध ऐसे सिस्टम के मूल्यांकन पर केंद्रित है। इसमें ऑटोमैटिक स्पीच रिकग्निशन तकनीक की जांच के महत्व को सामने रखा गया है, ताकि यह समझा जा सके कि सिस्टम उर्दू भाषा में बोले गए शब्दों को कितनी सही तरह पहचानता है।
इस तरह का शोध भाषा तकनीक में मौजूद कमियों की पहचान करने और भविष्य में बेहतर सिस्टम विकसित करने की दिशा में उपयोगी हो सकता है। इससे उर्दू में डिजिटल सामग्री तैयार करने, आवाज के जरिए कंप्यूटर से संवाद करने और भाषा आधारित सेवाओं को बेहतर बनाने के प्रयासों को दिशा मिल सकती है।
हामिद ने सम्मेलन में केवल शोध पत्र प्रस्तुत ही नहीं किया, बल्कि मॉडरेटर के रूप में भी योगदान दिया। उन्होंने कई शैक्षणिक सत्रों में हिस्सा लिया। इससे उन्हें विभिन्न शोधकर्ताओं और अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक समुदाय के साथ संवाद करने का अवसर मिला।
एएमयू के शोधार्थियों की अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भागीदारी
दिव्या वार्ष्णेय और हामिद हुसैन खान की उपलब्धियां विज्ञान और तकनीक के दो अलग-अलग क्षेत्रों में किए जा रहे शोध को सामने लाती हैं। दिव्या का काम माइक्रोबायोलॉजी, नैनोटेक्नोलॉजी और संक्रमण से जुड़े वैज्ञानिक सवालों पर केंद्रित है। वहीं, हामिद का शोध कंप्यूटर साइंस, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और उर्दू भाषा की स्पीच रिकग्निशन तकनीक से संबंधित है।
दोनों विद्यार्थियों को अपने शोध की प्रस्तुति के लिए अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में पुरस्कार मिला। इन सम्मेलनों में शोध पत्र प्रस्तुत करना विद्यार्थियों को अपने काम पर विशेषज्ञों की प्रतिक्रिया प्राप्त करने, नए विचारों से परिचित होने और दूसरे शोधकर्ताओं के साथ अकादमिक संपर्क बनाने का अवसर देता है।
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी लंबे समय से उच्च शिक्षा और शोध के क्षेत्र में अपनी पहचान रखती है। विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों में विद्यार्थी और शोधार्थी विज्ञान, तकनीक, भाषा, चिकित्सा से जुड़े विषयों और सामाजिक विज्ञान सहित कई क्षेत्रों में काम करते हैं। ऐसे में दिव्या वार्ष्णेय और हामिद हुसैन खान की उपलब्धियां विश्वविद्यालय के शोध समुदाय के लिए महत्वपूर्ण हैं।
मलेशिया और इस्तांबुल में मिले इन पुरस्कारों ने एएमयू के दो शोधार्थियों के काम को अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक मंच पर पहचान दिलाई है। साथ ही, इन उपलब्धियों ने यह भी दिखाया है कि विश्वविद्यालय के विद्यार्थी स्थानीय और राष्ट्रीय स्तर से आगे बढ़कर अंतरराष्ट्रीय शोध चर्चाओं में भाग ले रहे हैं।
दिव्या का शोध संक्रमण से जुड़े सूक्ष्मजीवों और बायोफिल्म की समस्या को समझने की दिशा में काम करता है, जबकि हामिद का अध्ययन उर्दू भाषा के लिए डिजिटल तकनीक की जांच से संबंधित है। दोनों विषय अपने अपने क्षेत्र में आगे शोध की संभावनाएं रखते हैं।
इन पुरस्कारों के साथ एएमयू के दोनों विद्यार्थियों ने अपनी शैक्षणिक यात्रा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि दर्ज की है। उनके शोध कार्य भविष्य में किस तरह आगे बढ़ते हैं, इस पर भी अकादमिक जगत की नजर रहेगी।

