नफरत की राजनीति पर चुनावी नतीजों का संदेश, इंसाफ की जीत जरूरी
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मौलाना अरशद मदनी का विचार, धर्म के नाम पर विभाजन और दमन की राजनीति पर सवाल
मौलाना अरशद मदनी

सत्ता हासिल करने और उसे बनाए रखने के लिए धर्म के नाम पर नफरत फैलाने, इंसानों को बांटने तथा अत्याचार और दमन को राजनीति का हथियार बनाने वालों के लिए अमेरिका और इजराइल के हालिया चुनावी नतीजे एक महत्वपूर्ण सबक हैं। दुनिया भर में धार्मिक कट्टरता और नफरत की राजनीति करने वाली ताकतों को इन परिणामों से समझना चाहिए कि जनता को हमेशा भय और पक्षपात के सहारे अपने पक्ष में नहीं किया जा सकता।
अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप द्वारा अब्दुल रहमान अल सैयद के खिलाफ नकारात्मक प्रचार किया गया। कभी उन्हें जिहादी बताया गया, कभी शरीयत कानून लागू करने की मंशा रखने वाला और कभी अमेरिका की सुरक्षा के लिए खतरा बताया गया। इसके बावजूद उनकी ऐतिहासिक कामयाबी ने यह संदेश दिया कि नफरत और डर की राजनीति हमेशा सफल नहीं होती।
यह चुनावी नतीजा इस बात का प्रमाण है कि जनता के बीच इंसानियत, इंसाफ और बराबरी की भावना आज भी मजबूत है। किसी व्यक्ति को उसके धर्म, पहचान या विचारों के आधार पर निशाना बनाना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। चुनाव में जनता का फैसला यह भी बताता है कि राजनीतिक प्रचार के जरिए लोगों को हमेशा गुमराह नहीं किया जा सकता।
गाजा के अत्याचारों ने दुनिया का जमीर झकझोरा
फिलिस्तीन के गाजा में मासूम बच्चों, महिलाओं और निहत्थे नागरिकों के साथ जो कुछ हुआ है, उसने पूरी दुनिया के इंसाफ पसंद लोगों को झकझोर दिया है। घरों और बस्तियों की तबाही, भूख, बेघर होने की मजबूरी और आम नागरिकों की पीड़ा ने मानवता के सामने गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
गाजा में लगातार सामने आने वाले विनाश के दृश्य केवल फिलिस्तीनियों की तकलीफ नहीं हैं। ये पूरी दुनिया के इंसानी जमीर को चुनौती देते हैं। जब निर्दोष लोगों की जिंदगी खतरे में होती है, तब धर्म, भाषा और देश की सीमाओं से ऊपर उठकर इंसाफ की आवाज उठाना जरूरी हो जाता है।
इन अत्याचारों के खिलाफ दुनिया के अलग-अलग देशों में आवाजें उठी हैं। लोगों ने प्रदर्शन किए हैं और युद्ध तथा नागरिकों पर हो रहे हमलों के खिलाफ विरोध जताया है। इन जनआंदोलनों ने यह स्पष्ट किया है कि ताकतवर सरकारों की नीतियों पर सवाल उठाना जनता का अधिकार है।
गाजा के हालात और अमेरिका के चुनावी नतीजों के बीच एक महत्वपूर्ण संदेश दिखाई देता है। जनता केवल सत्ता और ताकत को नहीं देखती। वह यह भी देखती है कि सरकारें इंसानियत, न्याय और समानता के साथ कितना व्यवहार करती हैं।
धर्म को राजनीति का हथियार बनाना खतरनाक
दुनिया का कोई भी देश हो, धर्म के नाम पर नफरत फैलाने और समाज को बांटने की राजनीति अंततः लोगों के बीच दूरी पैदा करती है। धार्मिक पहचान को सत्ता हासिल करने का साधन बनाना समाज की एकता के लिए नुकसानदेह है।
इतिहास गवाह है कि अत्याचार और दमन के सहारे सत्ता को हमेशा कायम नहीं रखा जा सकता। सरकारें आती हैं और जाती हैं, लेकिन इंसाफ और इंसानियत की आवाज को हमेशा के लिए दबाना संभव नहीं है।
राजनीति का उद्देश्य लोगों की जिंदगी बेहतर बनाना होना चाहिए। यदि सत्ता हासिल करने के लिए किसी समुदाय को निशाना बनाया जाता है, उसके खिलाफ भय पैदा किया जाता है और उसे दूसरे नागरिकों से अलग दिखाया जाता है, तो यह लोकतंत्र की मूल भावना को कमजोर करता है।
अमेरिका और इजराइल के चुनावी नतीजों को इसी संदर्भ में समझने की जरूरत है। इन परिणामों ने उन राजनीतिक ताकतों के लिए सवाल खड़े किए हैं, जो धर्म और पहचान के आधार पर लोगों को बांटने की कोशिश करती हैं।
इंसाफ और इंसानियत की आवाज को दबाया नहीं जा सकता
नफरत की राजनीति का सबसे बड़ा नुकसान समाज के कमजोर और अल्पसंख्यक वर्गों को उठाना पड़ता है। जब किसी समुदाय को लगातार शक की नजर से देखा जाता है, तो उसके नागरिक अधिकार और सम्मान प्रभावित होते हैं।
लेकिन जनता हमेशा एक ही तरह से नहीं सोचती। चुनाव, जनआंदोलन और सार्वजनिक विरोध के माध्यम से लोग अपनी राय सामने रखते हैं।
गाजा में हो रहे अत्याचारों के खिलाफ दुनिया भर में उठी आवाजें भी इसी भावना को दर्शाती हैं। इन आवाजों ने यह साबित किया है कि किसी भी सरकार की ताकत इंसानियत और न्याय से बड़ी नहीं हो सकती।
अत्याचार करने वाली ताकतें कुछ समय के लिए प्रभावशाली दिखाई दे सकती हैं। लेकिन इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जहां जनता की आवाज ने अन्याय के खिलाफ बदलाव की राह बनाई है।
इसलिए सत्ता में बैठे लोगों को यह समझना चाहिए कि जनता का विश्वास केवल प्रचार और भय से हासिल नहीं किया जा सकता। उसके लिए न्यायपूर्ण व्यवहार, समान अधिकार और इंसानियत का सम्मान जरूरी है।
चुनावी नतीजों से दुनिया को क्या सीखना चाहिए?
अमेरिका और इजराइल के हालिया चुनावों का संदेश केवल इन देशों तक सीमित नहीं है। दुनिया के हर उस देश के लिए इसमें एक सबक है, जहां धर्म, पहचान और नफरत के आधार पर राजनीति की जाती है।
सत्ता में आने और उसे बनाए रखने के लिए समाज को बांटना लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करता है। इसके विपरीत, लोगों के अधिकारों का सम्मान और सभी नागरिकों के साथ समान व्यवहार लोकतंत्र को मजबूत बनाता है।
गाजा में निर्दोष नागरिकों की पीड़ा और उसके खिलाफ उठने वाली आवाजों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इंसाफ की मांग किसी एक धर्म या समुदाय तक सीमित नहीं है। यह पूरी मानवता की साझा जिम्मेदारी है।
सरकारें बदल सकती हैं। राजनीतिक परिस्थितियां बदल सकती हैं। लेकिन इंसानियत, न्याय और सच्चाई के मूल्यों को हमेशा महत्व दिया जाना चाहिए।
दुनिया की उन सभी ताकतों को इन चुनावी नतीजों से सबक लेना चाहिए, जो धर्म के नाम पर नफरत फैलाती हैं और अत्याचार को राजनीति का साधन बनाती हैं। इतिहास बताता है कि दमन की राजनीति हमेशा कायम नहीं रहती।
इंसाफ, इंसानियत और सच्चाई की आवाज को दबाया नहीं जा सकता। यही लोकतंत्र का असली संदेश है।
लेखक जमिअत उलेमा ए हिंद के सदर मौलाना अरशद मदनी हैं। यह लेख उनके विचारों पर आधारित है।

