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‘मुनाफिक’ बेनकाब! वक्फ बिल के समर्थन में खड़े मुस्लिम नेताओं के खिलाफ खुली मोर्चाबंदी

मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नई दिल्ली

बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान कट्टर हिंदू संगठनों का एक प्रसिद्ध नारा था—’एक धक्का और दो, बाबरी मस्जिद तोड़ दो।’ अब वैसा ही एक नारा मुसलमानों के लिए भी प्रासंगिक हो गया है, लेकिन यह नारा उनके खिलाफ है, जो वक्फ संशोधन बिल को लेकर सरकार के समर्थन में खड़े हैं या मुस्लिम विरोधी सरकारी फैसलों पर चुप्पी साधे रहते हैं। लोकसभा में बिल पास होने से पहले तक आम मुसलमान ऐसे नेताओं के खिलाफ खुलकर बोलने से कतराते थे, यहाँ तक कि उनके नाम लेने से भी बचते थे।

लेकिन वक्फ बिल के समर्थन में खुद को ख्वाजा गरीब नवाज़ का वंशज कहने वाले एक तथाकथित सूफी नेता के बयान के बाद, असदुद्दीन ओवैसी ने भी उनके खिलाफ इशारों में प्रतिक्रिया दी थी। अब, सोशल मीडिया पर ऐसे लोगों को बेनकाब किया जा रहा है। उनके चेहरे दिखाकर सार्वजनिक बहिष्कार का आह्वान किया जा रहा है। हालाँकि, आम मुसलमानों के बीच इनका कोई विशेष प्रभाव नहीं है, लेकिन जब ये सरकार के पक्ष में खड़े होते हैं, तो भ्रम की स्थिति पैदा हो जाती है और आम मुसलमान चाहकर भी विरोध नहीं कर पाता।

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लोकसभा में वक्फ संशोधन बिल पास होने के बाद अब मुसलमानों की झिझक समाप्त हो रही है। इस बिल के खिलाफ आम मुसलमान खुलकर अपनी नाराजगी जता रहे हैं। जहाँ नीतिश कुमार, जीतन राम मांझी, जयंत चौधरी, चिराग पासवान, और चंद्रबाबू नायडू जैसे तथाकथित सेक्युलर नेताओं के खिलाफ मोर्चा खोल दिया गया है और उनके राजनीतिक बहिष्कार की माँग उठ रही है, वहीं सरकार समर्थक मौलानाओं की पोल भी खोली जा रही है।

सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें पाँच मुस्लिम नेताओं को ‘भाजपा के पाँच बहरूपिये मौलाना’ करार दिया गया है। इस सूची में पहला नाम उमर अहमद इलियासी का है, जिनके बारे में कहा गया है कि वे आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत को ‘राष्ट्रपिता’ कह चुके हैं और राम मंदिर के प्राण-प्रतिष्ठा समारोह में भी शामिल हुए थे। यह तथ्य महत्वपूर्ण है क्योंकि मुसलमान आज भी बाबरी मस्जिद से भावनात्मक रूप से जुड़े हुए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी स्पष्ट किया था कि बाबरी मस्जिद किसी मंदिर को तोड़कर नहीं बनाई गई थी, लेकिन फैसला हिंदुओं की भावनाओं को देखते हुए दिया गया था।

इस वीडियो में दूसरा नाम मुफ्ती वजाहत कासमी का है, जो मुस्लिम राष्ट्र मंच से जुड़े हुए हैं और आरएसएस के एजेंडे को मुसलमानों में फैलाने का कार्य कर रहे हैं। तीसरा नाम सुहैब कासमी का है, जो भाजपा के नेता हैं और मुसलमानों को भाजपा से जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। चौथे नाम के रूप में शहाबुद्दीन रिज़वी का जिक्र किया गया है, जो भाजपा के मुस्लिम विरोधी फैसलों पर अक्सर भाजपा का समर्थन करते हैं। पाँचवें व्यक्ति कारी जमाल हैं, जिनके बारे में कहा गया है कि वे आरएसएस के कार्यकर्ता हैं और मुसलमानों के खिलाफ लगातार बयानबाज़ी करते रहते हैं।

इसके अलावा, अजमेर शरीफ दरगाह से जुड़े दो तथाकथित सूफियों की सूची भी सामने आई है। इनमें से एक विदेशी मंचों पर ‘सर्वधर्म समभाव’ के नाम पर सक्रिय रहता है, जबकि दूसरा खानकाही मुसलमानों में फूट डालने के लिए शहर-दर-शहर घूमता रहता है।

इसी क्रम में, पसमांदा मुसलमानों के नाम पर भाजपा के पक्ष में खड़े होने वाले कुछ नेताओं के खिलाफ भी मोर्चाबंदी शुरू हो गई है। इनमें से अधिकतर नेता उत्तर प्रदेश से हैं, जहाँ वक्फ की संपत्तियाँ सर्वाधिक हैं और सरकार की इन पर विशेष नजर है। इन्हीं में से एक तथाकथित पसमांदा नेता मीडिया में लेख लिखकर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, सर सैयद अहमद खान, वक्फ, मदरसा और यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) को लेकर भ्रम फैलाने का कार्य कर रहे हैं। ये नेता समय-समय पर भाजपा और आरएसएस के कार्यक्रमों में भी देखे जाते हैं।

दिलचस्प बात यह है कि ये तथाकथित पसमांदा नेता कभी मुस्लिम मुद्दों पर आवाज़ नहीं उठाते। हाल ही में नागपुर में हुए दंगों में गरीब पसमांदा मुसलमानों को निशाना बनाया गया। उनके लोग गिरफ्तार हुए, यातनाएँ झेलनी पड़ीं, लेकिन ये नेता पूरी तरह से खामोश रहे।

अब जबकि वक्फ संशोधन बिल को लेकर मुसलमानों में जागरूकता बढ़ी है, वे खुलकर ऐसे नेताओं का विरोध कर रहे हैं और उनकी सच्चाई उजागर कर रहे हैं। यह बदलाव दर्शाता है कि मुस्लिम समाज अब भ्रम की राजनीति को नकारते हुए अपने अधिकारों के लिए मुखर हो रहा है।

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