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ईरानी सुप्रीम लीडर और लंदन पेंटहाउस विवाद: जानिए, पश्चिमी मीडिया के दावों और गल्फ न्यूज की रिपोर्ट का सच

नौशाद अख्तर

लंदन के सबसे महंगे इलाकों में शुमार ‘केंसिंग्टन पैलेस’ के पास स्थित दो आलीशान पेंटहाउस इन दिनों अंतरराष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियों में हैं। इन प्रॉपर्टीज़ की कीमत लगभग 36 मिलियन पाउंड (करीब 450-460 करोड़ रुपये) बताई जा रही है। पश्चिमी मीडिया आउटलेट्स जैसे ‘द संडे टाइम्स’, ‘डेली मेल’ और बाद में ‘गल्फ न्यूज’ ने इन संपत्तियों का सीधा संबंध ईरान के नए सुप्रीम लीडर मुज्तबा खामेनेई से जोड़ा है। हालांकि, कागजी सबूतों और कानूनी तथ्यों को खंगालने पर इस पूरे मामले में पत्रकारिता के मापदंडों और राजनीतिक बयानबाजी के बीच एक बड़ा अंतर नजर आता है।

प्रॉपर्टी विवाद का मुख्य बैकग्राउंड

लंदन स्थित 3a पैलेस ग्रीन में मौजूद ये दो डुप्लेक्स पेंटहाउस 2014 और 2016 में खरीदे गए थे। सरकारी लैंड रजिस्ट्री रिकॉर्ड के अनुसार, इन दोनों प्रॉपर्टीज़ के असली पंजीकृत मालिक ईरानी व्यवसायी और बैंकर अली अंसारी हैं। हाल ही में अली अंसारी द्वारा मॉर्गेज (कर्ज) की किस्तों का भुगतान न कर पाने के कारण लोन देने वाले निजी बैंकों ने कानूनी प्रक्रिया शुरू की है। संपत्ति अब ‘रिसीवरशिप’ के तहत है और बकाया वसूलने के लिए इसे बाजार में बेचने के लिए लिस्ट किया गया है।

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इजरायली दूतावास से दूरी और सुरक्षा के दावे

पश्चिम के प्रमुख मीडिया घरानों ने इस रिपोर्ट में सबसे ज्यादा जोर इस बात पर दिया है कि ये पेंटहाउस लंदन स्थित इजरायली दूतावास से महज 50 मीटर से भी कम दूरी पर हैं।

  • सुरक्षा खतरे का तर्क: रिपोर्टों में आतंकवाद-रोधी विशेषज्ञों और ईरान विरोधी आउटलेट ‘ईरान इंटरनेशनल’ के हवाले से कहा गया कि इतने पास होने के कारण दूतावास की जासूसी या फोटोग्राफी हो सकती है।
  • सबूतों का अभाव: हालांकि, इसी रिपोर्ट में यह भी साफ तौर पर स्वीकार किया गया है कि इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि इन अपार्टमेंट्स का इस्तेमाल कभी किसी तरह की निगरानी या जासूसी के लिए हुआ है।
  • स्थानीय निवासियों का अनुभव: पैलेस ग्रीन में काम करने वाले कर्मचारियों ने पुष्टि की है कि खरीद के बाद से न तो अली अंसारी और न ही मुज्तबा खामेनेई कभी वहां देखे गए हैं।

गल्फ न्यूज और पश्चिमी मीडिया की रिपोर्टिंग पर सवाल

गल्फ न्यूज के सीनियर एसोसिएट एडिटर स्टीफन एन आर द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट पर कई विश्लेषक सवाल उठा रहे हैं। आरोप है कि बिना किसी ठोस स्वतंत्र जांच के केवल पश्चिमी मीडिया की अटकलों को प्रमुखता से छापा गया है।

रिपोर्ट में बार-बार ‘कथित संबंध’, ‘माना जा रहा है’ और ‘अगर-मगर’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया है। यह स्पष्ट करता है कि किसी भी मीडिया संस्थान के पास खामेनेई के सीधे मालिकाना हक का कोई कानूनी दस्तावेज नहीं है। केवल यह दावा किया गया है कि अमेरिकी ट्रेजरी द्वारा जुलाई में अली अंसारी पर लगाए गए प्रतिबंधों में उन्हें खामेनेई का सहयोगी माना गया था।

अली अंसारी का पक्ष

बैंकर अली अंसारी के कानूनी प्रतिनिधियों ने इन तमाम आरोपों को सिरे से खारिज किया है। उनके वकीलों का कहना है कि:

  • अली अंसारी का मुज्तबा खामेनेई या ईरान की सेना (IRGC) के साथ कोई सीधा या indirect वित्तीय संबंध नहीं है।
  • वे अपनी व्यावसायिक संपत्तियों को निजी क्षमता में संचालित करते हैं।
  • ब्रिटेन और अमेरिका द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों को अदालत में कानूनी चुनौती दी जा रही है।

विश्लेषण: प्रोपगंडा या वित्तीय विवाद?

पश्चिम और मध्य पूर्व के मौजूदा भू-राजनीतिक तनाव को देखते हुए इस रिपोर्टिंग का समय बेहद महत्वपूर्ण है। जब ईरान और पश्चिमी देशों के बीच कूटनीतिक और सैन्य गतिरोध जारी है, ऐसे समय में मीडिया रिपोर्टों के जरिए संपत्ति विवाद को जासूसी और निजी विलासिता से जोड़ना एक रणनीतिक नैरेटिव का हिस्सा दिखता है।

कानूनी तौर पर यह मामला पूरी तरह से एक बैंक डिफॉल्ट और मॉर्गेज रिकवरी का है। बिक्री से मिलने वाला पैसा भी पहले बैंक के कर्ज को चुकाने में जाएगा और बाकी रकम प्रतिबंधों के हटने तक फ्रीज रहेगी। ठोस सबूतों के बिना इसे सर्वोच्च धार्मिक या राजनीतिक नेतृत्व की संपत्ति घोषित करना पत्रकारिता के बुनियादी सिद्धांतों पर सवाल खड़े करता है।

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